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सितंबर, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्लासिक फिल्म : 'श्री 420'

राजकपूर की चार फिल्म मेरी क्लासिक फिल्म की सूची में हैं, श्री 420, जागते रहो, जिस देश में गंगा बहती है और मेरा नाम जोकर. इनमें से तीन फिल्म तो निर्विवाद हैं, 'जिस देश में गंगा बहती है' को छोड़कर. 'जिस देश में गंगा बहती है' क्यों क्लासिक है? इस पर भी चर्चा होगी, सबसे पहले 'श्री 420' पर. हिन्दी सिनेमा ने विगत सौ वर्षों में अपने सीमित साधनों के बावज़ूद विश्व सिनेमा में अपनी अलग साख बनाई है, संख्या के साथ-साथ गुणवत्ता में भी। इस अवधि की फ़िल्मों का अवलोकन किया जाए तो अनेक ऐसी फ़िल्में बनी जो मानवीय मूल्यों की गहरी समझ लिए हुए थी। सन १९५५ में प्रदर्शित फ़िल्म ‘श्री ४२०’में मनुष्य के छ्द्म सपनों का अभूतपूर्व चित्रण था.  फिल्म समीक्षक प्रह्लाद अग्रवाल लिखते हैं, 'उन दिनों भारतवर्ष आजादी की ताज़ी सांस ले रहा था, भारतवासियों की उमंगें लहरा रही थी, आशाओं के दीप जगमगा रहे थे; उसी समय `श्री ४२०' आई जिसने सभ्यता और प्रगति के मुखौटे पहने समाज को पहचानने का प्रयास किया और उसके संभावित खतरों से अवाम को परिचित कराया। उस फिल्म में संकट से जूझती गरीबी, अभावों की कसक, धनवान ...

क्लासिक फिल्म : 'मदर इण्डिया'

बात 'मदर इण्डिया ' की : हिन्दी सिने-जगत ने विगत सौ वर्षों में अनेक फिल्म दी लेकिन अविस्मरणीय रचना तो संयोग से बनती है। ऐसी ही एक कृति थी- 'मदर इंडिया।' महबूब खान ने सन 1940 में एक आने थी, फिल्म 'औरत' जो उस समय विशेष सफल नहीं हुई। काफी समय बाद उनके दिमाग में फिल्म 'औरत' का 'रीमेक' बनाने का विचार आया। संगी-साथियों ने बहुत समझाया, मना किया लेकिन महबूब खान पर तो जैसे धुन सवार हो गई थी। फ़िल्म का शीर्षक अमरीकी लेखिका कैथरीन मायो द्वारा 1927 में लिखित पुस्तक मदर इण्डिया से लिया गया जिसमे उन्होंने भारतीय समाज, धर्म और संस्कृति पर हमला किया था। पुस्तक में भारतीय स्वतंत्रता की मांग के विरोध में मायो ने भारतीय महिलाओं की दुर्दशा, अछूतों के प्रति भेद-भाव, जानवरों, धूल-मिट्टी और राजनेताओं पर हमला किया था। मायो ने पूरे भारत में गुस्से का माहौल उत्पन्न कर दिया और विरोधस्वरूप उनकी पुस्तकों को जलाया गया।  महबूब खान को इस फ़िल्म के शीर्षक का ख्याल सन 1952 में आया। महबूब खान ने बताया- 'हमारी फ़िल्म 'मदर इंडिया' और मायो की 'Mother Indi...

क्लासिक फिल्म : 'मुग़ल-ए-आज़म'

बात 'मुग़ल-ए-आज़म' की : यह हिन्दुस्तान में अब तक बनी फिल्म का नगीना है जिसे कमरुद्दीन आसिफ ने 5 अगस्त 1960 को बम्बई के मराठा मंदिर और देश के अनेक सिनेमागृहों में प्रदर्शित किया था. सन 1922 में इम्तियाज़ अली ताज की लिखी प्रेमकथा पर आधारित इस फिल्म को जब पहली बार बनाना शुरू किया था तो इसके कलाकार थे, चन्द्रमोहन (अकबर), सप्रू (सलीम) और नर्गिस (अनारकली). सन 1947 के भारत विभाजन में निर्माता शिराज़ अली पाकिस्तान चले गए, फिल्म रुक कर डिब्बे में बंद हो गयी.  सन 1950 में नए सिरे से शुरू हुई और अकबर के रोल के लिए पृथ्वीराज कपूर को लिया गया जिन्होंने अकबर का मेक-अप करवाने के बाद दहाड़ कर कहा था, 'पृथ्वीराज कपूर जा रहा है, अकबर अब आ रहा है.' और, सच में जीता-जागता अकबर अवतरित हो गया. अकबर महान ने यदि यह फिल्म देखी होती तो निश्चयतः पृथ्वीराज कपूर के 'मैनरिज्म' अपना लेता. अनारकली की भूमिका के लिए सुरैया को लिया जाना था लेकिन अन्तः मधुबाला को लिया गया, संभवतः दिलीपकुमार की सिफारिश पर. यद्यपि इस फिल्म के दौरान ही दिलीप कुमार और मधुबाला के बीच बोलचाल बंद हो गयी लेकिन फिल्म के प्...