बात 'मुग़ल-ए-आज़म' की :
यह हिन्दुस्तान में अब तक बनी फिल्म का नगीना है जिसे कमरुद्दीन आसिफ ने 5 अगस्त 1960 को बम्बई के मराठा मंदिर और देश के अनेक सिनेमागृहों में प्रदर्शित किया था. सन 1922 में इम्तियाज़ अली ताज की लिखी प्रेमकथा पर आधारित इस फिल्म को जब पहली बार बनाना शुरू किया था तो इसके कलाकार थे, चन्द्रमोहन (अकबर), सप्रू (सलीम) और नर्गिस (अनारकली). सन 1947 के भारत विभाजन में निर्माता शिराज़ अली पाकिस्तान चले गए, फिल्म रुक कर डिब्बे में बंद हो गयी. सन 1950 में नए सिरे से शुरू हुई और अकबर के रोल के लिए पृथ्वीराज कपूर को लिया गया जिन्होंने अकबर का मेक-अप करवाने के बाद दहाड़ कर कहा था, 'पृथ्वीराज कपूर जा रहा है, अकबर अब आ रहा है.' और, सच में जीता-जागता अकबर अवतरित हो गया. अकबर महान ने यदि यह फिल्म देखी होती तो निश्चयतः पृथ्वीराज कपूर के 'मैनरिज्म' अपना लेता. अनारकली की भूमिका के लिए सुरैया को लिया जाना था लेकिन अन्तः मधुबाला को लिया गया, संभवतः दिलीपकुमार की सिफारिश पर. यद्यपि इस फिल्म के दौरान ही दिलीप कुमार और मधुबाला के बीच बोलचाल बंद हो गयी लेकिन फिल्म के प्रेम दृश्यों को देखकर दर्शक अनुमान नहीं लगा सकता कि 'एक-दूसरे का मुंह न देखने' की कसम खाकर भी कलाकार किस तरह अपनी भूमिका को निभाते हैं ! दिलीपकुमार किसी ऐतिहासिक फिल्म के किरदार को नहीं करना चाहते थे लेकिन मधुबाला की नजदीकी की चाहत में 'हाँ' कर बैठे और वह नजदीकी अनायास एक अदालती मुकदमे में दूरी की वज़ह बन गयी.
अमानुल्लाह खान, वजाहत मिर्ज़ा, कमाल अमरोही और अहसान रिज्वी को पटकथा और संवाद लिखने की ज़िम्मेदारी दी गयी. इस टीम ने फारसी-उर्दू में ऐसे संवाद लिखे कि वे सम्पूर्ण फिल्म पर भारी पड़े. फिल्म के संवाद मुगलिया आन-बान-शान के बहुत नज़दीक लगते हैं और दर्शकों पर गज़ब का असर पैदा करते हैं.
संगीत तैयार करने के लिए के.आसिफ ने नौशाद के पास गए, नोटों से भरा एक बैग उन्हें दिया और कहा, 'मुग़ल-ए-आज़म' के लिए यादगार संगीत तैयार करो.' नौशाद ने नाराज़ होकर उस बैग को खिड़की के बाहर फेंक दिया और कहा, 'पैसे की ताकत से संगीत नहीं बनता.' नौशाद की पत्नी इस घटना को देखती रह गयी. उन्होंने उन दोनों के बीच समझौता करवाया. के.आसिफ को अपनी गलती का अहसास हुआ, नौशाद से माफ़ी मांगी, तब 'मुग़ल-ए-आज़म' के गीतों का कालजयी संगीत बना और अत्यंत असरदार पार्श्वसंगीत.
फिल्म में कुल मिलाकर 12 गीत थे जिनके फिल्मांकन में फिल्म का एक तिहाई भाग खप गया, शेष दो तिहाई में कथानक था. फिल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत 'प्यार किया तो डरना क्या, प्यार किया कोई चोरी नहीं की, छुप-छुप आहें भरना क्या...' को तैयार करने की भी एक कहानी है. शकील बदायूँनी ने इस सिचुएशन पर दो गीत लिखे लेकिन वे सिचुएशन के अनुरूप फिट नहीं बैठ रहे थे. एक दिन आसिफ, शकील और नौशाद छत पर दिन भर बैठे रहे, बहस करते रहे, अपनी राय देते और बदलते रहे तब ही नौशाद को पूर्वी उत्तरप्रदेश का एक लोकगीत याद आया, 'प्रेम किया, का चोरी करी है?', इसे शकील ने ग़ज़ल के रूप में परिवर्तित किया तब गीत बना और उसकी धुन तैयार हुई. उसी प्रकार 'मोहे पनघट में नन्दलाल छेड़ गयो रे' गीत की क्रेडिट शकील बदायूंनी को दी गयी है जबकि यह उत्तरप्रदेश में शास्त्रीय गायकों के बीच पहले से ही प्रचलित था, इसके रचयिता को लेकर आज भी भ्रान्ति है. इस गीत के फिल्म में होने पर भी फिल्मकार प्रकाश भट्ट ने आपत्ति की थी, 'मुगलकाल में हिन्दुओं के त्यौहार कृष्णजन्माष्टमी का आयोजन उचित नहीं लगेगा, फिल्म बर्बाद हो जाएगी.' तब इस गीत के लिए कहानी में पृष्ठभूमि तैयार की गई, संवाद लिखे गए, उनका फिल्मांकन किया गया और इस गीत को कहानी में 'जस्टिफाई' किया गया.
कई बार ऐसा लगा कि यह फिल्म नहीं बन पाएगी, तब पटकथा लेखक कमाल अमरोही ने इस कहानी पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया. के आसिफ ने उन्हें समझाकर रोका लेकिन फिल्मिस्तान के नन्दलाल जसवंतलाल ने 'मुग़ल-ए-आज़म' के सेट पर अपने जासूसों को भेजकर जो जानकारियाँ हासिल की उसके आधार पर सन 1953 में फिल्म 'अनारकली' दर्शकों के सामने प्रस्तुत कर दी जो बेहद सफल हुई और 'मुग़ल-ए-आज़म' की संभावित सफलता पर प्रश्नचिन्ह लग गया.
कुल बारह में से दस गीतों के साथ और बहुत काट-छांट के बाद कुल 197 मिनट की इस आंशिक रंगीन फिल्म को परदे पर उतारा गया. फिल्म की टिकट विशेष रूप से पोस्टल-लिफाफे की साइज और चिकने कागज़ में बनाकर पूरे भारत के सभी सिनेमा गृहों में भेजी गयी थी. फिल्म के प्रमोशन के लिए शानदार पोस्टर तैयार किये गए थे. फिल्म धीरे-धीरे 'हिट' हो गयी.
'मुग़ल-ए-आज़म' अपने प्रदर्शन के पहले ही बहुचर्चित हो गयी थी, खास तौर से शीशमहल के निर्माण और उसकी शूटिंग के चर्चे हर सिनेमाप्रेमी की जुबान में थे. लिहाज़ा, टिकट खरीद कर पहले देखने के लिए लम्बी लाइन लग गयी, सबकी उत्सुकता चरम पर थी. फिल्म प्रभावशाली थी लेकिन दर्शकों को दो बातें पसंद नहीं आयी, एक, संवादों की कठिन भाषा और दो, कहानी का दुखद अंत. फिर भी हर सिनेमाप्रेमी ने उसे देखा और फिल्म की भव्यता पर मोहित हुआ. दर्शक कम होने लगे तब के.आसिफ़ ने फिल्म में दो गीत और जोड़े, 'ऐ इश्क ये सब दुनिया वाले, बेकार की बातें करते हैं, पायल के ग़मों का इल्म नहीं, झंकार की बातें करते हैं.' और 'हमें काश तुमसे मोहब्बत न होती, कहानी हमारी हकीकत न होती.' इन गीतों के लिए बहुत से दर्शकों ने फिल्म को दुबारा देखा.
फिल्म चली, शुरू में चली, बाद में चली, नहीं चली, ये कोई खास बात नहीं है; खास बात है कि 'मुग़ल-ए-आज़म' में कौन सी खासियत थी कि वह सर्वकालिक और सर्वप्रिय फिल्म बनी और प्रदर्शन के अर्ध-शतक बीत जाने के बाद भी क्लासिक फिल्मों की सिरमौर है? इस फ़िल्म में दो पीढ़ियों के संघर्ष को आधार बनाकर बाजुओं और मोहब्बत की ताकत के फ़र्क का बखूबी चित्रण किया गया. यह फिल्म पृथ्वीराज कपूर के प्रभावोत्पादक अभिनय और संवाद-प्रेषण, मधुबाला की कमनीयता, नौशाद-शकील की युति का कर्णप्रिय गीत-संगीत, भव्य सेट, युद्ध का सजीव चित्रण, असरदार संवाद और उत्कृष्ट फोटोग्राफी का अद्भुत सम्मिश्रण थी.
सलीम-अनारकली की काल्पनिक कहानी को के.आसिफ़ ने बड़ी खूबसूरती और तन्मयता से बनाया था. मेरी दृष्टि में, हिन्दुस्तान में बनी एक उत्कृष्ट फिल्म है, 'मुग़ल-ए-आज़म'.
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