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क्लासिक फिल्म : 'श्री 420'

राजकपूर की चार फिल्म मेरी क्लासिक फिल्म की सूची में हैं, श्री 420, जागते रहो, जिस देश में गंगा बहती है और मेरा नाम जोकर. इनमें से तीन फिल्म तो निर्विवाद हैं, 'जिस देश में गंगा बहती है' को छोड़कर. 'जिस देश में गंगा बहती है' क्यों क्लासिक है? इस पर भी चर्चा होगी, सबसे पहले 'श्री 420' पर.

हिन्दी सिनेमा ने विगत सौ वर्षों में अपने सीमित साधनों के बावज़ूद विश्व सिनेमा में अपनी अलग साख बनाई है, संख्या के साथ-साथ गुणवत्ता में भी। इस अवधि की फ़िल्मों का अवलोकन किया जाए तो अनेक ऐसी फ़िल्में बनी जो मानवीय मूल्यों की गहरी समझ लिए हुए थी। सन १९५५ में प्रदर्शित फ़िल्म ‘श्री ४२०’में मनुष्य के छ्द्म सपनों का अभूतपूर्व चित्रण था. 

फिल्म समीक्षक प्रह्लाद अग्रवाल लिखते हैं, 'उन दिनों भारतवर्ष आजादी की ताज़ी सांस ले रहा था, भारतवासियों की उमंगें लहरा रही थी, आशाओं के दीप जगमगा रहे थे; उसी समय `श्री ४२०' आई जिसने सभ्यता और प्रगति के मुखौटे पहने समाज को पहचानने का प्रयास किया और उसके संभावित खतरों से अवाम को परिचित कराया। उस फिल्म में संकट से जूझती गरीबी, अभावों की कसक, धनवान बनने की चाहत और उसके टेढ़े-मेढ़े रास्तों का मानवीय चित्रण किया गया था। फिल्म के एक दृश्य में दिन-रात भीख मांगकर गुजर-बसर करने वाला भिखारी 'अपने राजू' को विश्वास के कारण संतान्वे रूपए, नौ आने और दो खोटे पैसे दे जाता है, अपनी ज़िन्दगी के सबसे दिलकश सपने- ‘अपने घर’ की खातिर ! वह कहता है- "दो-ढाई रूपए कम हैं, चाहे एक खिड़की कम लगाना पर घर दे देना भाई !"
सभ्यता का मतलब मनुष्य के भीतर कोमलता का विस्तार है, पाशविकता का नहीं। देव और दानव मनुष्य के ह्रदय में एक साथ मौजूद होते हैं और दानवी प्रवृतियों से मुक्त होने की लगातार संघर्ष यात्रा ही सभ्यता के उत्थान की महागाथा है।'

फिल्म `श्री ४२०' में मनुष्य के संकट और स्वप्न का ह्रदयस्पर्शी चित्रण था। इस फ़िल्म को मैंने जितनी बार देखा, हर बार इसने मुझे कुछ नए अर्थ समझाए. फ़िल्मकार राजकपूर ने जैसे दर्शक को खुली छूट दे रखी हो कि फ़िल्म के हर फ़्रेम में दर्शक अपने जीवन को फ़िट करके देखे और उसके चाहे जितने अर्थ निकाले. यह सच है कि मनुष्य के दुख और सुख उसकी व्यक्तिगत अनुभूति होती है लेकिन जब हम उसे अपनों के बीच साझा करके व्यापक अभिव्यक्ति देते हैं तब वे सबके हो जाते हैं.


ख्वाज़ा अहमद अब्बास की पटकथा और संवाद से सजी इस फिल्म में राजकपूर, नर्गिस और नादिरा ने शानदार अभिनय किया. ललितापवार, रशीद खान, एम. कुमार, नाना पलसीकर और सेठ सोनाचंद धर्माचंद के रोल में निमो का अभिनय हृदयस्पर्शी है. छोटी-छोटी रोचक घटनाओं के माध्यम से समाज की पीड़ा और कसक को व्यक्त करने अद्भुत कारनामा राजकपूर ने इस फिल्म में संभव कर दिखाया.

वह शंकर जयकिशन के मधुर संगीत का उषाकाल था. उनकी ताजगी भरी धुनों ने हिंदी फिल्म जगत के संगीत को नई दिशा दी जिसमें हिन्दुस्तानी और पश्चिमी संगीत का मनमोहक मिश्रण था. लता, मुकेश, मन्ना डे, आशा भोसले और रफ़ी की मधुर आवाज़ से सजी फिल्म श्री 420 के गीत-संगीत ने संगीत प्रेमियों को झूमने के लिए मजबूर कर दिया. 'मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंगलिश्तानी, सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी', मुकेश का गाया यह गीत स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय भावना के अनुकूल था इसलिए पूरे देश में बेहद लोकप्रिय हुआ. पाश्चात्य धुन पर आधारित गीत 'मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के' में आशा भोंसले और मन्ना डे ने अपनी आवाज़ में वह असर पैदा किया कि सुनने वाले के पैर अनायास थिरकने लगते हैं.

एक ऐसा गीत भी था जो फिल्म के अन्य लोकप्रिय गीतों की वृष्टिछाया में उपेक्षित रह गया, लता मंगेशकर का गाया हुआ, 'ओ जाने वाले मुड़ के ज़रा देखते जाना, दिल तोड़ के तो चल दिये मुझको न भुलाना', इस गीत में किसी के बिछुड़ जाने के बाद सीने में जो सन्नाटा पसरता है, वह अतुलनीय है. मन्ना डे के गाए गीत 'दिल का हाल सुने दिल वाला, थोड़ी सी बात में मिर्ची मसाला, कह के रहेगा कहने वाला' भारत के संविधान के द्वारा नागरिकों को प्रदत्त अभिव्यक्ति के अधिकार और उसकी दुर्दशा को सरलतम शब्दों में समझा जाता है.
'ईचक दाना, बीचक दाना, दाने ऊपर दाना' हर युग में बच्चों का पसंदीदा गीत रहेगा.

सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ, 'रमैया वस्ता वैया (राम, तुम आओगे), मैंने दिल तुझको दिया.' इस मधुर गीत को लता, रफ़ी और मुकेश ने गाया, फिल्म श्री 420 का सबसे 'टची' गीत था. समूह नृत्य का कुशल संयोजन, अचानक गीत में नायक की 'एंट्री' और फिर गीत का मानवीय श्रृंखला के माध्यम से नायिका तक पहुंचना, राजकपूर के सृजनशील निर्देशन का कमाल था. सदाबहार युगल गीत 'प्यार हुआ, इकरार हुआ है, प्यार से फिर क्यों डरता है दिल', को लता और मन्ना डे ने गया है, जो हिंदी सिनेमा का सर्वश्रेष्ठ 'रोमांटिक पिक्चराइजेशन' है. इस गीत के पीछे की एक घटना ऋषि कपूर बताते हैं :
'इस गाने की शूटिंग के दौरान अपने बड़े भाई रणधीर के साथ मुझे बरसते पानी में रेनकोट पहन कर फुटपाथ से चुपचाप निकलना था. उस वक्त मैं महज़ दो वर्ष का था, मैंने 'शाट' देने से इनकार कर दिया तब नर्गिस मेरे पास आयी और उन्होंने मुझे 'शाट' होने के बाद टाफी देने का वादा किया, मैंने तुरंत 'शाट' दे दिया. इस प्रकार मैं दो साल की उम्र से ही रिश्वत लेकर काम करने का आदी हो गया था.'

भारतीय दंड संहिता की धारा 420 ऐसे अपराध को इंगित करती है जो किसी को धोखा देने से संबधित है. भारत में किसी धोखेबाज भी को सहज ही चार सौ बीस कहा जाता है, जैसे यह संबोधन धोखेबाजी का मानक हो गया हो. इस फिल्म में इलाहबाद से रोजगार की तलाश में आया नायक प्यार करने वालों की बस्ती में आता है और विद्या से मिलता है, 'विद्या' का अर्थ है ज्ञान. अचानक वह ऐसे लोगों के चंगुल में आ जाता है जो अनैतिक कार्यों से धन कमाकर अपनी तिजोरी भरने में दक्ष हैं. यहाँ उसकी मुलाकात माया से होती है, 'माया' का अर्थ है भ्रम. नायक भरपूर पैसे के लालच में उनके समूह में शामिल हो जाता है और अपनी उन ज़रूरतों को हासिल कर लेता है जो कभी उसके लिए सपना थी लेकिन सच्चा प्यार उसके हाथों से फिसल जाता है. एक दिन वह धोखेबाजों की दुनिया को धोखा देकर अपने अपराध का पश्चाताप करता है और प्यार की दुनिया में वापस आ जाता है, इसीलिए फिल्म के नामकरण में उसके नाम के आगे 'श्री' शब्द को जोड़ा गया.

श्री 420 हिंदी फिल्म जगत की उन फिल्मों में से है जो कभी पुरानी नहीं होती, सदा तर-ओ-ताज़ा. सामाजिक सरोकार, सामाजिक सोच, सामाजिक पाखण्ड और सामाजिक चक्रव्यूह का मर्मान्तक चित्रण है, इस फिल्म में. शुरू से आखिर तक दर्शक को बाँध कर रखने वाली कहानी, उत्कृष्ट अभिनय, मधुर संगीत, अर्थपूर्ण संवाद और चुटीले अंदाज़ में ज़िन्दगी का फलसफा सिखाने वाली फिल्म, श्री 420, निःसंदेह सर्वकालिक क्लासिक फिल्म है.

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