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क्लासिक फिल्म : गंगा जमना

जब कोई कलाकार अपनी अभिनय प्रतिभा से दर्शक के दिल में स्थायी जगह बना ले तो वह यादगार कहानी बन जाती है. दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला को बी.आर.चोपड़ा की फिल्म 'नया दौर' में देखा था लेकिन यह जोड़ी फिल्म 'गंगा जमना' में गज़ब कर गयी. भोले-भाले ग्रामीण गंगा की भूमिका में दिलीपकुमार और उसकी प्रेमिका धन्नो धोबन के रूप में वैजयंतीमाला को भुला पाना असंभव है. गाँव में होने वाली हंसी-ठिठोली से लेकर प्रेम के उच्चतम शिखर तक ले जाने वाली इस रोमांचक कथा को स्वयं दिलीपकुमार ने रचा था.

गरीब और अमीरी का जीवन, गरीबी का निबाह और अमीरी का आतंक, कर्तव्य और अपराध के द्वंद्व को फिल्म 'गंगा जमना' में ईस्टमेनकलर में फिल्माया गया था. इसके फिल्मांकन के लिए गाढ़े रंगों को चुना गया जिसने अत्याचार और उसके विरुद्ध संघर्ष को अधिक असरदार बना दिया.

एक समय था जब मध्यप्रदेश के चम्बल का इलाका डाकुओं के आतंक से त्रस्त था. इनमें डाकू मानसिंह, तहसीलदार सिंह, सूबेदार सिंह, लुक्का, पन्ना बाई, तुलसी बाई, पानसिंह तोमर, पंचम सिंह, मोहर-माधो, माखन-चिड्डा, बाबा-मुस्तकिल, फूलन-विक्रम, श्रीराम-लालाराम, ददुआ आदि डाकुओं ने मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश को डकैती के आगोश में समेट लिया था. उनको समाप्त करने की पुलिस की कोशिशें निष्फल हो जाती थी क्योंकि वहां के स्थानीय नागरिक डाकुओं का साथ देते थे. यदि कोई गिरफ्तार हो जाता तो उसे जेल में बंद करके रखना भी मुश्किल था. आचार्य बिनोबा भावे की पहल पर 19 मई, 1960 को डाकू-गिरोहों के 11 मुखियाओं ने लुक्का के नेतृत्व में विनोबा के चरणों में अपने हथियार रख दिए. इन डाकुओं ने आत्मसमर्पण किया और सामान्य नागरिकों की तरह जीवनयापन का वादा किया. लुक्का ने अश्रुपूरित आंखों से कहा था- ‘अब तक हमने बहुत से बुरे काम किए हैं. उन पर हमें दुःख हो रहा है.’ उनके लिए देश में पहली बार खुली जेल बनायी गयी, उन पर भरोसा किया गया जिसे उन डाकुओं ने निभाया.

जब यह घटना चर्चा में थी तब इस फिल्म को बनाया गया. यह जमींदारों के अत्याचार और शोषण के विरुद्ध गरीबों की संघर्ष कथा है जो महबूब खान की फिल्म 'मदर इण्डिया' के वातावरण की याद दिलाती है. वही ग्रामीण परिवेश, वही चुहल, वही शोषण, वही प्रतिकार, वही अपने सम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष. फिल्म में गाँव वालों के परिवार हैं, उनकी झोपड़ियाँ हैं, जमींदार का भव्य मकान है, नर्तकी का कोठा है, स्कूल है, कबड्डी खेलने का मैदान है, कच्ची सड़क है, दूकाने हैं, झील है, नदी है, पहाड़ है; अर्थात् वह सब कुछ ऐसे जतन से जोड़ा गया है जो किसी गाँव को आपके समक्ष जीवंत कर दे.

उस काल में इस विषय पर कई रोचक फिल्में बनी; राजकपूर ने बनायी 'जिस देश में गंगा बहती है' (१९६०), दिलीपकुमार ने 'गंगा जमना' (१९६१), सुनील दत्त ने 'मुझे जीने दो' (१९६३), ये तीनों फ़िल्में दर्शकों में बेहद लोकप्रिय हुई. 'जिस देश में गंगा बहती है' और 'गंगा जमना' ने तो सिनेमाहाल की टिकट खिड़कियों को हिलाकर रख दिया. 'जिस देश में गंगा बहती है' में डाकुओं के आत्मसमर्पण की उहापोह का भावुक चित्रण था तो 'गंगा जमना' में अत्याचार के विरोध में डकैत बनने और इंसाफ की डगर में दो भाइयों के मध्य विचारों के संघर्ष का.

हरिपुर नामक एक गाँव में गोविन्दी गरीबी में जीवनयापन करती है. वह जमींदार के घर का काम करती है और उसका बड़ा बेटा गंगा उसकी सहायता करता है. जमींदार की पत्नी कर्कशा है, गोविंदी का बात-बात पर अपमान करती है. गोविन्दी का छोटा बेटा जमना स्कूल जाता है, पढ़ने में तेज है जबकि गंगा की पढाई में रूचि नहीं है. ज़मींदार गोविंदी पर चोरी का झूठा आरोप लगाता है, उसे पुलिस गिरफ्तार कर लेती है. गोविंदी इस घटना से विचलित हो जाती है और उस सदमे में उसके प्राण चले जाते हैं.

वयस्क होने पर गंगा निर्णय लेता है कि वह अपने छोटे भाई को खूब पढ़ा-लिखा कर अच्छा आदमी बनाएगा. इसके लिए वह दिन-रात मजदूरी करता है, गाड़ी में माल की ढुलाई करता है और पैसे कमाकर भाई की पढ़ाई में भरपूर मदद करता है. गंगा स्वभाव का शोख है जबकि जमना शांत और सौम्य. गाँव की एक लड़की धन्नो की गंगा से छेड़-छाड़ चलती रहती है, अघोषित प्यार भी था दोनों के बीच.

एक दिन सूनेपन का फायदा उठाकर जमींदार धन्नो की इज्ज़त लूटने की कोशिश करता है, गंगा उसकी कोशिश असफल कर देता है. इस बात से कुंठित जमींदार गंगा पर डकैती का झूठा आरोप लगाता है और उसे जेल हो जाती है.
 
जेल से रिहा होने पर जब उसे मालूम पड़ता है कि उसका छोटा भाई निस्सहाय हो गया है तो वह बदला लेने के लिए ज़मींदार पर हमला करता है और उसे लूट लेता है. गाँव वाले उसे मारने के लिए दौड़ाते हैं, उनसे बचने के लिए वह भागता है. किसी प्रकार वह बच जाता है और जंगल की ओर निकल जाता है, धन्नो भी उसके साथ हो लेती है. गंगा डाकुओं के गिरोह में शामिल हो जाता है. डाकुओं के अड्डे में गंगा और धन्नो विवाह कर लेते हैं.

इस बीच गंगा का छोटा भाई जमना पढ़ाई पूरी करने के बाद पुलिस निरीक्षक बन जाता है. धन्नो गर्भवती हो जाती है. गंगा चाहता है कि वह गाँव की ज़िन्दगी में वापस लौट जाए और उसके अपराधों को माफ़ कर दिया जाए लेकिन उसका छोटा भाई जमना, उसे पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण करने की सलाह देता है लेकिन गंगा  इन्कार कर देता है. भागते समय उसकी पुलिस से मुठभेड़ हो जाती है और वह अपने ही भाई की गोली से मारा जाता है. संबंधों पर कर्तव्य की विजय होती है. इस कहानी को दिलीपकुमार ने खुद लिखा था और सिटिज़न्स फिल्म के बैनर तले निर्माता की हैसियत से बनाया था. संयोग से, यह सफल फिल्म उनकी पहली और अंतिम फिल्म रही, इसके बाद उन्होंने किसी फिल्म का निर्माण नहीं किया, हाँ, बतौर नायक वे उसके बाद अनेक फिल्म में आए.

'गंगा जमना' के निर्देशन के लिए नितिन बोस को चुना गया जिन्होंने दिलीपकुमार को फिल्म 'अंदाज़' (१९५१) में निर्देशित किया था. संवाद लिखे थे, वज़ाहत मिर्ज़ा ने, जिन्होंने 'मदर इण्डिया' (१९५७) और 'मुगल-ए-आज़म' (१९६०) के भी संवाद लिखे थे. इस फिल्म के संवाद आम हिन्दुस्तानी भाषा में लिखे गए थे लेकिन ग्रामीण परिवेश को उभारने के लिए इसके संवाद पूरबी (अवधी और भोजपुरी) भाषा में रखने की बात दिलीपकुमार के दिमाग में आई. इस परिवर्तन की वज़ह से बहुत सी मुश्किलें सामने थी, क्या इस भाषा को हिंदी फिल्म के दर्शक स्वीकार करेंगे? क्या दिलीपकुमार, जो पेशावरी हैं और वैजयंतीमाला, जो मद्रासी हैं; संवाद कहते समय अवधी भाषा की लय पकड़ पाएंगे? तय यह हुआ कि कुछ दृश्यों के संवाद अवधी में लिखे जाएं, उन दृश्यों को शूट किया जाए और किसी विशेषज्ञ की राय ली जाए. फिल्म शूट हुई और वरिष्ठ फिल्मकार शशधर मुखर्जी को हिन्दी और अवधी, दोनों भाषा की रील को दिखाया गया. शशधर मुखर्जी ने अवधी भाषा को तुलनात्मक रूप से अधिक असरदार बताया और उनकी बात मानकर पूरी फिल्म के संवाद अवधी में लिखे गए. दिलीपकुमार और वैजयंतीमाला सहित सभी कलाकारों ने अवधी भाषा में संवाद बोलने का कठिन अभ्यास किया और उन संवादों को बिना किसी डबिंग के रिकार्डिस्ट एम.आई. धरमसे ने रेकार्ड किया. 'गंगा जमना' अवधी भाषा में बनी भारत की सर्वप्रथम फिल्म थी.

फोटोग्राफी के लिए दिलीप ने वी.बाबासाहेब को बुलाया जिन्होंने उनके साथ फिल्म 'दाग' (१९५२) में काम किया था. वी.बाबासाहेब ने तब तक श्वेत-श्याम फिल्म का छायांकन किया था, 'गंगा जमना' उनकी पहली रंगीन फिल्म थी. इस फिल्म में उनके चटख रंगों वाले छायांकन ने कथा को उभारने में भरपूर सहयोग दिया, खास तौर से ट्रेन में डकैती के दृश्य के फिल्मांकन की उस समय बहुत चर्चा थी. फिल्म की सफलता में ट्रेन-डकैती के दृश्यांकन का भी 'गिलहरी' योगदान था.

संगीत के लिए नौशाद और गीत के लिए शकील बदायूँनी की जोड़ी दिलीपकुमार की विगत सभी फिल्म की जाँची-परखी थी. लता मंगेशकर, आशा भोसले, मोहम्मद रफ़ी और हेमंतकुमार के स्वरों की सुरीली आवाज की मदद से इस जोड़ी ने आठ कालजयी गाने तैयार किए जो आज भी गुनगुनाए जा रहे हैं. 'न मानूं न मानूं  न मानूं रे, दगाबाज तोरी बतियाँ न मानूं रे, पिया दिल मा तोरे का है, न जानूं रे', 'दो हंसों का जोड़ा बिछुड़ गयो रे, गज़ब भयो रामा, जुलुम भयो रे', 'ढूँढो ढूँढो रे साजना, मोरे कान का बाला', 'नैन लड़ जैहैं तो मनवा माँ खटक होइवै करी',  'झनन घुँघर बाजे', 'इंसाफ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के, ये देश है तुम्हारा, नेता तुम ही हो कल के', 'तोरा मन बड़ा पापी संवरिया रे', 'ओ छलिया रे छलिया मन में हमार, नज़र तोरी गड़ गयी'. ऐसे मधुर गीतों का समुच्चय दर्शकों को भा गया और एक गंभीर किस्म के कथानक को मिठास दे गया.

दिलीपकुमार के मन में बहुत दिनों अपने छोटे भाई नासिर को फिल्म जगत में पुनर्स्थापित करने की बात थी क्योंकि उसकी कई फ़िल्में असफल हो चुकी थी. वे अपना प्रोडक्शन-हाउस भी बनाना चाहते थे. फिल्म 'गंगा जमना' की कल्पना को साकार करने के लिए दिलीप को ढेर सारा धन चाहिए था जिसे मुहैया कराने के लिए शापुनजी और पालोनजी मिस्त्री फिल्म की कहानी सुनकर राजी हो गए क्योंकि उन्हें उसमें कामयाबी की खुशबू महसूस हुई, वैसे भी उन दिनों दिलीपकुमार फ़िल्मी दुनिया के सबसे कामयाब एक्टर थे, उन पर दांव लगाना फायदे की गारंटी थी.

दिलीप ने खुद के लिए गंगा का पात्र चुना और नासिर के लिए गंगा के छोटे भाई जमना का. नासिर ने दिलीप को समझाया कि कहानी में जमींदार से बदला लेने के लिए गंगा का डाकू बन जाना, दर्शक स्वीकार नहीं करेंगे इसलिए कहानी को कोई और मोड़ दिया जाए लेकिन दिलीप ने नासिर की बात नहीं मानी और कहानी में फेर-बदल नहीं किया.

ग्रामीण परिवेश को समझने के लिए दिलीपकुमार ने उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के अनेक गाँवों का दौरा किया, ग्रामीणों से बातचीत की, उनके बात करने के ढंग को सीखा-समझा. बम्बई से १२५ किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित देवलाली में, जहाँ 'गंगा जमना' की अधिकांश शूटिंग हुई, वहां एक माली बिहारी और उसकी पत्नी फुलवा के बीच जिस भाषा में वार्तालाप होता था, उनमें झगड़ा होता था, वह दिलीपकुमार को लगा कि बोलने के इस लहज़े में गज़ब की मिठास है और गाँव के वातावरण का असली असर है, उन्होंने फिल्म 'गंगा जमना' की शहरी भाषा को ग्रामीण में बदल दिया जो फिल्म की रोचकता बनाए रखने में बहुत सहायक बनी.

फिल्म की शूटिंग महाराष्ट्र के इगतपुरी के आसपास, मध्यप्रदेश के रतलाम के आसपास और बम्बई के महबूब और कारदार स्टूडियो में हुई. दिलीपकुमार ने इस फिल्म के शुरू करने के पहले बहुत रिसर्च की, पेपर-वर्क किया, सलाह-मशविरा किया. इस फिल्म में उनकी भूमिका ऐसे नायक की थी जो अपने सम्मान के लिए कानून के बाहर जाकर अन्याय का विरोध करता है, बदला लेने के लिए अस्त्र उठा लेता है. ठेठ देहाती से लेकर डाकू तक की भूमिका को दिलीपकुमार ने तन्मयता से निभाया और जैसे उस पात्र में प्रविष्ट हो गया. इस फिल्म का नायक क़ानून के खिलाफ़ खड़ा होता है, बदला लेने के लिए डाकू बन जाता है लेकिन दर्शक की सहानुभूति नायक के साथ बनी रहती है. यह दो भाइयों के बीच का संघर्ष नहीं था वरन देश के क़ानून और अन्याय तथा भ्रष्टाचार के विरुद्ध नागरिकों के स्वाभाविक अधिकार के मध्य था.

फिल्म के अंतिम दृश्य में नायक गंगा को घर में स्थापित भगवान की मूर्ति के समक्ष अपने प्राण त्यागने थे. शूटिंग के लिए सूर्यास्त का समय चुना गया. दिलीपकुमार ने वी.बावासाहेब को निर्देश दिया, 'सभी कैमरे सही जगह रखे जाएं, कैमरामेन शाट लेने के लिए तैयार रहें. कोई रिहर्सल या रीटेक नहीं होगा. मैं सिर्फ एक बार कैमरे के सामने आऊंगा, वही फायनल शाट होगा.'
कैमरामेन ने अपनी-अपनी पोजीशन ले ली. दिलीपकुमार कुछ देर तक स्टूडियो में पैदल चक्कर लगाते रहे, फिर जागिंग की, उसके बाद बेतहाशा दौड़ने लगे. दौड़ते-दौड़ते इतना थक गये कि उन्हें लगा कि अब साँसें उखड जाएँगी, वे अचानक सेट के अन्दर घुसे और भगवान के सामने गिर कर अपना संवाद कह कर मर जाने का दृश्य अभिनीत किया. यह फिल्म 'गंगा जमना' का सर्वश्रेष्ठ दृश्य था.

दिलीपकुमार ने 'आज़ाद', 'इंसानियत', 'कोहिनूर', 'नया दौर' की सफलता से लबरेज थे. 'गंगा जमना' में उन्हें ग्रामीण भोलेपन, चुहुलबाजी, जिम्मेदारी और गंभीरता का मिला-जुला चुनौतीपूर्ण अभिनय प्रस्तुत करना था जिसे उन्होंने बख़ूबी निभाया. उतना ही सधा हुआ अभिनय वैजयंतीमाला ने किया. सहायक अभिनेताओं में कन्हैयालाल ने यादगार रोल निभाया. जिस भाई को तरक्की देने के लिए यह फिल्म बनी, वह भाई नासिर, दिलीपकुमार के सामने बौना रह गया. इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद दिलीपकुमार पर धन और पुरस्कारों की बौछार हो गयी.

नितिन बोस के निर्देशन, नौशाद के कर्णप्रिय संगीत, शकील के भावपूर्ण गीत, वजाहत मिर्ज़ा के अर्थपूर्ण संवाद, वी. बावासाहेब की मनभावन फोटोग्राफी और सभी कलाकारों के शानदार अभिनय से 'गंगा जमना' एक कालजयी कृति बन गयी, ऐसी फिल्म जो आज भी देखने में ताज़ा लगती है. 'गंगा जमना' हिंदी सिनेमा की क्लासिक फिल्म की श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण योगदान के रूप में सदैव अंकित रहेगी.



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