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क्लासिक फिल्म : दो आँखें बारह हाथ :

हिंदी फिल्म निर्माण के सन्दर्भ में जिन फिल्मकारों का नाम शिद्दत से याद किया जाता है, उनमें एक हैं, वी.शांताराम, पूरा नाम, शांताराम राजाराम वणकुद्रे (१९०१-१९९०). मराठी और हिंदी फिल्मों की कतार में उन्होंने सन १९५७ में एक फिल्म बनाई 'दो ऑंखें बारह हाथ' जो हिंदी फिल्म के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गयी.

पुणे के पास स्थित औंध रियासत में वहां के प्रगतिशील शासक ने एक आयरिश मनोवैज्ञानिक को जेल में निरुद्ध खतरनाक अपराधियों को खुली जेल में रखकर उन पर प्रयोग करने की सुविधा दी थी. वी.शांताराम ने उसी घटना को अपनी फिल्म 'दो ऑंखें बारह हाथ' का आधार बनाकर पटकथा तैयार की और इस फिल्म का निर्माण किया. मुख्य भूमिका में वे स्वयं थे. उनकी तीसरी पत्नी संध्या, फिल्म की स्त्री-पात्र के रूप में थी.

फिल्म का गीत 'ऐ मालिक तेरे बन्दे हम, ऐसे हों हमारे करम, नेकी पर चलें और बड़ी से लड़ें ताकि हंसते हुए निकले दम' आज भी प्रत्येक संस्कार-केंद्र में उच्च स्वर में गाया जाता है और भलाई के रास्ते पर चलने के लिए आज भी सबको प्रेरित करता है.

भरत व्यास के भावपूर्ण गीत और वसंत देसाई का मधुर संगीत इस फिल्म का मज़बूत पक्ष है. 'ऐ मालिक तेरे बन्दे हम' के अतिरिक्त लता मंगेशकर का गाया गीत 'सैंया झूठों का बड़ा सरताज निकला' हिंदी फिल्म के सर्वाधिक कर्णप्रिय गीतों में से एक है.

वी.शांताराम ने सामाजिक समस्याओं या कलात्मक विषयों पर फिल्म बनाई और उसके बॉक्सआफिस पर सफल होने की कभी परवाह नहीं की. उनकी बनाई फिल्मों की सूची लम्बी है जिस पर गौर करने से यह समझ आता है कि वे आम बम्बइया फिल्मकारों से अलग किस्म के व्यक्ति थे, सदा क्रांतिकारी सोच वाले फिल्मकार. उनकी कुछ चर्चित फ़िल्में हैं, शकुंतला (१९४३), डाक्टर कोटनीस की अमर कहानी' (१९४६), 'दहेज़' (१९५०), 'अमर भूपाली'(१९५१), 'तीन बत्ती चार रास्ता' (१९५३), 'सुबह का तारा' (१९५४),  'झनक झनक पायल बाजे' (१९५५), 'तूफ़ान और दिया', (१९५६), 'दो आँखें बारह हाथ' (१९५७), 'नवरंग (१९५९), 'स्त्री' (१९६१), 'सेहरा (१९६३), 'गीत गाया पत्थरों ने'(१९६४), 'लड़की सह्याद्री की'(१९६६), 'बूंद जो बन गयी मोती'(१९६७), 'जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली' (१९७१), 'पिंजरा' (१९७३) आदि. इन फिल्मों के विषय या तो समाज से जुड़े थे या सामाजिक घटनाओं से या उनके कला-प्रेम से. उनकी कलादृष्टि इतनी व्यापक थी कि 'दो आँखें बारह हाथ' के अंतिम दृश्य में सांड से मुठभेड़ की शूटिंग के समय हुई दुर्घटना में उनकी आँखों की रौशनी चली गयी थी, फिर भी, उन्होंने 'नवरंग जैसी रंग भरी फिल्म बनाई. फिल्म 'नवरंग' के शुरू होने के पहले वे परदे पर आकर दर्शकों से कहते हैं कि फिल्म की शूटिंग के समय उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन उनकी बंद आँखों में जो नए रंग उभरे, वह है, फिल्म 'नवरंग'.

बीसवीं शताब्दी में यह विचार विकसित होने लगा कि जेल को सजा देने वाली जगह के बदले उसे सुधारगृह बनाया जाए ताकि अपराधी को जेल से छूटने के बाद पुनः अपराधी बनने से रोका जा सके और सजा पूरी होने के बाद वह सम्मान से अपना शेष जीवन व्यतीत कर सके. समाजशास्त्रियों की इस पहल को विश्व भर सरकारों ने समझा और जेलों को सुधारगृह के रूप में परिवर्तित करने की सार्थक कोशिश की है. यह कोशिश अभी भी जारी है लेकिन प्रयोग के स्तर पर है. इस प्रयास की सफलता और असफलता, दोनों किस्से सामने आए हैं. वे मुजरिम जो सुधरना कहते थे, सुधरे और आत्मनिर्भर बने लेकिन नकारात्मक सोच वाले अपराधियों ने जेल को भी अपना अपराधिक कर्मभूमि बनाया और अपनी शक्ति का संवर्धन किया. फिल्म 'दो आँखें बारह हाथ' उस आशावाद की कहानी है जो बुराई में अच्छाई खोजती है और यह मानकर चलती है कि मनुष्य बुरा नहीं होता, उसका कर्म बुरा होता है. हमें अपराधी से नहीं, अपराध से घृणा करनी चाहिए.

फिल्म की शुरुआत एक जेल के दृश्य से होती है. जेल का सुपरिंटेंडेंट जालिम है, कैदियों से अमानवीय व्यवहार करता है. वहां का जेलर आदिनाथ सरल और क्षमाशील व्यक्ति है. जेलर ने उच्चाधिकारियों से छः सजायाफ्ता अपराधियों को जेल से छोड़ने की अनुमति माँगी है ताकि वह उन कैदियों को खुले वातावरण में रखकर उनका हृदय परिवर्तन हो और उन्हें अच्छा नागरिक बनाया जा सके. इस प्रयोग के लिए जेलर को अनुमति मिल जाती है और हत्या की सज़ा काट रहे छः दुर्दांत अपराधियों को वह अपने साथ ऐसी जगह में ले जाता है जहाँ उनके लिए खुली छूट रहती है. जेलर आदिनाथ उन्हें परिश्रम से जोड़ता है, उनके कुत्सित विचारों से उन्हें दूर करता है. कई ऐसी घटनाएं होती हैं जब यह प्रयोग असफल होता दिखता है लेकिन उन अपराधियों को जेलर आदिनाथ की दो आँखें हर बार गलतियां करने से रोकती हैं. कथानक में कई उतार-चढ़ाव आते हैं, अपराधी चूकते भी हैं, सँभलते भी हैं. अंत उन कैदियों की सांड के आक्रमण से रक्षा करते हुए जेलर आदिनाथ के प्राण चले जाते है. आदिनाथ के त्याग से प्रभावित होकर सभी अपराधियों का हृदय परिवर्तित हो जाता है और वे सभी नागरिक की तरह जीवन व्यतीत करने का संकल्प लेते हैं.

वी.शांताराम का अभिनय शानदार है, साथ में उनका निर्देशन भी. जेल में फिल्माए गए दृश्य अत्यंत प्रभावोत्पादक हैं. आदिनाथ का जेल में प्रवेश करते समय जेल के दरवाजे पर लटके ताले का झूलते रह जाना, प्रतीकात्मक रूप से बहुत कुछ कह जाता है. संध्या को कथानक में 'फिलर' के रूप में इस्तेमाल किया गया है जो गीत और संगीत पक्ष की आवश्यकता को बखूबी पूरा करता है. लता मंगेशकर का गाई लोरी 'मैं गाऊं तू चुप हो जा, मैं जागूं रे तू सो जा' इतनी मधुर है कि मन मोह लेती है. इन गीतों के अतिरिक्त 'तक तक धुम धुम' और 'उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा' भी कर्णप्रिय हैं और गंभीर कथानक को रसमय करने में मदद करते है.

इस श्वेत-श्याम फिल्म की शानदार फोटोग्राफी जी.बालकृष्ण ने की है. पूरी फिल्म में केवल तीन लोकेशन हैं, जेल, खुली जेल और सब्जी बाजार. इन तीनों स्थलों को कैमरे की गहरी नज़र से देखकर हम तक फिल्म के सन्देश पहुँचाने की भरपूर कोशिश की है. फिल्म में वसंत देसाई का पार्श्वसंगीत वह असरदार नहीं है लेकिन सभी गानों का संगीत मधुर और शानदार है.

वी.शांताराम की तीन पत्नियां थी, विमला, जयश्री और संध्या. तीनों एक घर में एक साथ रहती थी. फिल्म 'दो ऑंखें बारह हाथ' के निर्माण के समय वी शांताराम आर्थिक संकट से जूझ रहे थे इसलिए उन्होंने तीनों पत्नियों से उनके आभूषण मांगे ताकि उन्हें गिरवी रखकर बाजार से धन क़र्ज़ में ले सकें. विमला और संध्या ने चुपचाप अपने गहने शांताराम को दे दिए किन्तु जयश्री ने नहीं दिए. यही घटना शांताराम और जयश्री के मध्य तनाव का कारण बनी और उनका तलाक हो गया. फिल्म 'दो ऑंखें बारह हाथ' उनके दाम्पत्य जीवन के विघटन का कारण बनी. संध्या ने विमला और जयश्री के सभी बच्चों को अपने बच्चे की तरह पाला और सगी मां जैसा प्यार दिया. जानने योग्य बात यह है कि संध्या के बच्चे नहीं हो सके क्योंकि जयश्री से हुई अंतिम संतान के बाद शांताराम ने अपनी संतान-निरोधी शल्यक्रिया करवा ली थी.

इस फिल्म के प्रीमियर में सिने जगत की नामी हस्तियाँ उपस्थित थी. शो समाप्त होने के बाद प्रेक्षागृह में सन्नाटा खिंच गया और निर्माता विजय भट्ट ('बैजू बावरा' फेम) को छोड़कर हर कोई शांताराम से मिले बिना चुपचाप निकल गया क्योंकि हर किसी को फिल्म की सफलता पर संदेह था. विजय भट्ट शांताराम से मिले, हाथ मिलाया और कहा, 'आपकी यह फिल्म भारतीय सिनेमा के लिए प्रकाश स्तम्भ है.'

फिल्म पूरे देश में प्रदर्शित हुई. शुरूआत निराशाजनक रही लेकिन धीरे-धीरे दर्शक जुटने लगे और भीड़ बढ़ने लगी. बम्बई के ऑपेरा हाउस में यह फिल्म ६५ सप्ताह चली. इस फिल्म के तमिल और तेलुगु संस्करण भी बने जिन्हें दर्शकों ने बहुत पसंद किया. 'दो आँखें बारह हाथ' नेशनल फिल्म अवार्ड (१९५७) की दो अलग-अलग श्रेणियों में सर्वोत्कृष्ट फिल्म घोषित हुई और बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में 'सिल्वर बीयर एक्स्ट्रा-ऑर्डिनरी प्राइज़ ऑफ द ज्यूरी' पुरस्कार हासिल किया.

'दो ऑंखें बारह हाथ' हिंदी फिल्म के इतिहास में सार्थक सिनेमा का एक ऐसा उदाहरण है जो कथानक और उसके निर्वहन की दृष्टि से सदैव याद किया जाएगा. इस फिल्म का हर पहलू नायाब था, असरदार था जिसकी चर्चा आज भी होती है, इसीलिए यह हिन्दी सिनेमा की क्लासिक कृति मानी जाती है.

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