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क्लासिक फिल्म : बंदिनी

निर्माता-निर्देशक बिमल रॉय की फिल्म 'बंदिनी' (१९६३ ) हिंदी सिनेमा की अनोखी फिल्म थी.  जरासंध के बांग्ला उपन्यास 'तामसी' पर आधारित इस फिल्म की पटकथा नबेंदु घोष ने लिखी थी और संवाद पाल महेंद्र ने. कहानी उस समय की है जब देश में आज़ादी की लड़ाई चल रही थी. सब तरफ वन्दे मातरम का घोष था. तब ही जेल का एक दृश्य उभरता है और पुलिस की गाड़ी से कुछ महिला कैदी उतरती हैं, उनमें से एक थी कल्याणी (नूतन). वह हत्या के आरोप में सजा काटने आई है.  जेल में किसी महिला कैदी को तपेदिक नामक बीमारी हो जाती है. उसकी तीमारदारी के लिए कोई महिला कैदी के लिए तैयार नहीं होती क्योंकि तपेदिक संसर्गजन्य बीमारी थी. डाक्टर देवेन्द्र (धर्मेन्द्र) उस महिला के इलाज़ के लिए जेल में आते हैं. कल्याणी अपने जीवन की परवाह न करते हुए उस मरीज़ की सेवा में खुद को झोंक देती है. डाक्टर धर्मेन्द्र उसकी सेवा भावना से प्रभावित होते हैं और बिना जाने कि कल्याणी किस आरोप की सजा भुगत रही है, उससे प्रेम करने लगते हैं. वे कल्याणी से अपना प्रेम प्रगट करते हैं तथा विवाह का प्रस्ताव रखते हैं लेकिन कल्याणी स्वयं को उसके अयोग्य मानते हुए इन...

पुस्तक : सिनेमची

  पुस्तक : सिनेमची : ======   आलेख : पुरानी यादें : -----------------------   अवाम का सिनेमा : ============           बीसवीं शताब्दी में सिनेमा का आगमन समाज के बदलाव की रहस्यमयी आहट थी। दूरगामी प्रभाव पड़ने वाले थे लेकिन उस समय तो यह विस्मय था ,   आँखें फैला देने वाली आश्चर्यजनक खोज। पर्दे पर चलती-फिरती इन तस्वीरों का कौतूहल एक दिन पूरी दुनिया को अपने आगोश में समेट लेगा , ऐसा किसी ने सोचा तक न होगा।                       शुरुआती फिल्में ' खामोश ' थी लेकिन दुनिया को बहुत कुछ बता गई ,   नवीन वैज्ञानिक आविष्कारों से परिचित कराया , पृथ्वी की सैर कराई ,   डराया और हँसाया भी। उसके बाद फिल्मों को आवाज़ से जोड़ा गया , संवाद आए , गीत-संगीत आया। सन 1927 में पहली बार अमेरिका में सिनेमा में ध्वनि का प्रयोग किया गया , फिल्म का नाम था ,  The Jazz Singer   तो फ़िल्मकार चार्ली चैपलिन ने ' सुसाइड ऑफ सिनेमा ' शीर्षकयुक्त अपने लेख में लिखा था,  ' ध्वनि...