निर्माता-निर्देशक बिमल रॉय की फिल्म 'बंदिनी' (१९६३ ) हिंदी सिनेमा की अनोखी फिल्म थी. जरासंध के बांग्ला उपन्यास 'तामसी' पर आधारित इस फिल्म की पटकथा नबेंदु घोष ने लिखी थी और संवाद पाल महेंद्र ने. कहानी उस समय की है जब देश में आज़ादी की लड़ाई चल रही थी. सब तरफ वन्दे मातरम का घोष था. तब ही जेल का एक दृश्य उभरता है और पुलिस की गाड़ी से कुछ महिला कैदी उतरती हैं, उनमें से एक थी कल्याणी (नूतन). वह हत्या के आरोप में सजा काटने आई है.
जेल में किसी महिला कैदी को तपेदिक नामक बीमारी हो जाती है. उसकी तीमारदारी के लिए कोई महिला कैदी के लिए तैयार नहीं होती क्योंकि तपेदिक संसर्गजन्य बीमारी थी. डाक्टर देवेन्द्र (धर्मेन्द्र) उस महिला के इलाज़ के लिए जेल में आते हैं. कल्याणी अपने जीवन की परवाह न करते हुए उस मरीज़ की सेवा में खुद को झोंक देती है. डाक्टर धर्मेन्द्र उसकी सेवा भावना से प्रभावित होते हैं और बिना जाने कि कल्याणी किस आरोप की सजा भुगत रही है, उससे प्रेम करने लगते हैं. वे कल्याणी से अपना प्रेम प्रगट करते हैं तथा विवाह का प्रस्ताव रखते हैं लेकिन कल्याणी स्वयं को उसके अयोग्य मानते हुए इन्कार कर देती है. जेलर को कल्याणी के इन्कार पर आश्चर्य होता है इसलिए वह कल्याणी के अतीत के बारे में पूछता है. कल्याणी अपनी लिखित डायरी जेलर को दे देती है जिसमें उसके जीवन का इतिहास लिखा होता है.
कल्याणी का भाई स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी था, वह पुलिस से छिप रहा था. एक जरूरी गोपनीय सन्देश एक दूसरे नज़रबंद सेनानी बिकास बाबू (अशोक कुमार) तक पहुँचाने के लिए वह कल्याणी को तैयार करता है क्योंकि कल्याणी के पिता शासकीय सेवक थे इसलिए पुलिस को कल्याणी पर शक की गुंजाइश नहीं थी. कल्याणी सन्देश पहुंचा देती है लेकिन बिकास बाबू को देखकर उनके प्रेम में पड़ जाती है. दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं. बिकाश बाबू कल्याणी के घर आने-जाने लगते हैं. एक रात अकेले रह रहे बिकास बाबू तीव्र ज्वर से पीड़ित होकर कल्याणी के घर आ जाते हैं रात भर कल्याणी उनकी सेवा करती है. अचानक पुलिस पहुँच जाती है और बिकास बाबू को गिरफ्तार कर लेती है. जाते समय बिकास बाबू कल्याणी के पिता को वचन देते हैं कि वे जेल से लौट कर आएँगे और कल्याणी से विवाह कर लेंगे. पर वे नहीं लौटते. कल्याणी बिकास बाबू को खोजने शहर जाती है वहां एक मनोरोगी अस्पताल में उसे नर्स की नौकरी मिल जाती है. वहां एक बदमिजाज़ महिला रोगी को सहते हुए मालूम होता है कि वह बिकास बाबू की पत्नी है. उसे बहुत ख़राब लगता है और अपने पिता की मृत्यु के मानसिक दबाव के चलते वह उस महिला को जहर देकर मार डालती है. बिकास बाबू उसे बचाने की कोशिश करते हैं लेकिन कल्याणी पुलिस के समक्ष अपना गुनाह कबूल कर लेती है. इस प्रकार कल्याणी जेल पहुँच जाती है. कल्याणी को जेल में पता चलता है कि बिकास बाबू ने देशहित में एक पुलिस अफसर की लड़की से मजबूरी में शादी की थी तो उसे बहुत पीड़ा होती है.
कल्याणी की रिहाई के दिन जेलर उसे डाक्टर देवेन्द्र की मां का एक पत्र देते हैं जिसमें उन्होंने कल्याणी को अपनी बहू के रूप में स्वीकार करने की बात लिखी थी. कल्याणी भरे दिल से अपनी ज़िन्दगी की नयी शुरुआत करने के लिए निकल पड़ती है लेकिन कहते हैं कि एक बार जिससे दिल लग जाए, वह गाँठ टूटती नहीं है. मनिहारी जाने के लिए वह घाट पर गाड़ी का इंतज़ार करती बैठी थी अचानक तपेदिक रोग से जूझ रहे बिकास बाबू उसे दिख जाते हैं. वह डाक्टर देवेन्द्र के खुशहाल ज़िंदगी के प्रस्ताव को त्याग कर बिकास बाबू के साथ हो जाती है क्योंकि बिकास बाबू को उसकी जरूरत थी और वह बिकास बाबू से अब भी प्रेम करती थी.
इस त्रिकोण प्रेमकथा को बिमल रॉय ने फिल्म 'बंदिनी' में बहुत शिद्दत से चित्रांकित किया है, खास तौर से जेल में निरुद्ध महिलाओं के मनोभावों को गीतों के माध्यम से. 'अबकी बरस भेज भैया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाय रे, लौटेंगी जब मेरे बचपन की सखियाँ दीजो संदेसा भेजाय रे ', जेल में चक्की चलाती कैदी का अपने एकाकीपन में पिता और भाई की उपस्थिति का अहसास कराती आशा भोसले की दर्द भरी आवाज़ सायास दर्शकों की आँखें गीली कर जाती हैं. एक अन्य दृश्य में जेल में कल्याणी कपड़े धो रही है तब ही एक कैदी डाल पर बैठे एक पक्षी को देखकर गा उठती है, 'ओ पंछी प्यारे , सांझ सकारे, बोले तू कौन सी बोली, बता रे' का मार्मिक चित्रांकन है.
'जोगी जब से आया तू मेरे द्वारे, मेरे रंग गए सांझ सकारे' और 'मोरा गोरा रंग लइ ले, मोहे श्याम रंग दइ दे, छुप जाऊंगी रात में ही, मोहे पी का रंग दइ दे.' गीतों को गाते समय नूतन ने प्रेम से परिपूर्ण युवती का अनोखा अभिनय किया है. मुकेश का गाया गीत "ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना' कल्याणी के गाँव छोड़ने के वक्त की पीड़ा व्यक्त करने में समर्थ है. मन्ना डे का गया गीत 'मत रो माता, लाल तेरे बहुतेरे' फांसी के फंदे में चढ़ने के लिए जाते हुए स्वंतत्रता संग्रान सेनानी के साहस का प्रदर्शन है. फिल्म के अंत के पूर्व एस.डी.बर्मन का गाया 'ओ रे मांझी, मेरे साजन हैं उस पार, मैं मनमार, हूँ इस पार, ओ मेरे मांझी, अबकी बार, ले चल पार' ऐसा प्रभावपूर्ण गीत है जो फिल्म के कथानक के समापन को व्यक्त करने की सटीक अभिव्यक्ति के रूप में उभरा है.
इस श्वेत-श्याम फिल्म में दमदार कथानक, शैलेन्द्र और गुलज़ार के असरदार गीत, सचिनदेव बर्मन का मधुर संगीत और मन को छू लेने वाले बिमल रॉय के निर्देशन ने अपने समय की नायाब फिल्म बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, भले ही आर्थिक दृष्टि से उतनी कामयाब सिद्ध नहीं हुई. नूतन ने कम संवाद और अधिक भावाभिव्यक्ति के माध्यम से कल्याणी के पात्र को सजीव करने में समर्थ रही हैं. फिल्म के अंतिम दृश्य में जब कल्याणी बिकास बाबू को बीमार देखकर उनके पास जाती है, उनके घुटनों के नीचे बैठ जाती है और उनके गले लगती है, उस मर्मस्पर्शी दृश्य को बिना किसी संवाद के नूतन और अशोक कुमार ने केवल चेहरे के भाव से इस कदर निभाया है कि वाह-वाह कहने का दिल होता है. अशोक कुमार और धर्मेन्द्र अपने-अपने छोटे से रोल में अपना प्रभाव छोड़ते हैं.
वर्ष १९६३ का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में फिल्म 'बंदिनी' को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म घोषित किया गया था. उस वर्ष के फिल्म फेयर पुरस्कार में इस फिल्म को छः श्रेणियों में पुरस्कृत होने का सौभाग्य मिला, सर्वश्रेष्ठ फिल्म का 'बंदिनी', निर्देशन का बिमल रॉय, अभिनेत्री का नूतन, छायाकार का कमल बोस, ध्वन्यांकन का डी. बिलमोरिया और कहानी का जरासंध; इस फिल्म की झोली में आये.
बिमल रॉय के जीवन की अंतिम फिल्म 'बंदिनी' उनके फ़िल्मी कैरियर की महत्वपूर्ण फिल्म साबित हुई. 'दो बीघा जमीन', 'परिणीता', 'विराज बहू', 'देवदास', 'मधुमती', 'सुजाता' और 'परख' के बाद यह फिल्म उनकी बनाई फिल्मों की फेहरिस्त में हीरे की चमक की तरह हमेशा जगमगाएगी.
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