पुस्तक : सिनेमची
:
======
आलेख
: पुरानी यादें :
-----------------------
अवाम का सिनेमा :
============
बीसवीं शताब्दी में सिनेमा का आगमन समाज के बदलाव की रहस्यमयी आहट थी। दूरगामी प्रभाव पड़ने वाले थे लेकिन उस समय तो यह विस्मय था, आँखें फैला देने वाली आश्चर्यजनक खोज। पर्दे पर चलती-फिरती इन तस्वीरों का कौतूहल एक दिन पूरी दुनिया को अपने आगोश में समेट लेगा, ऐसा किसी ने सोचा तक न होगा।
शुरुआती फिल्में 'खामोश' थी लेकिन दुनिया को बहुत कुछ बता गई, नवीन वैज्ञानिक आविष्कारों से परिचित कराया, पृथ्वी की सैर कराई, डराया और हँसाया भी। उसके बाद फिल्मों को आवाज़ से जोड़ा गया, संवाद आए, गीत-संगीत आया। सन 1927 में पहली बार अमेरिका में सिनेमा में ध्वनि का प्रयोग किया गया, फिल्म का नाम था, The Jazz Singer तो फ़िल्मकार चार्ली चैपलिन ने 'सुसाइड ऑफ सिनेमा' शीर्षकयुक्त अपने लेख में लिखा था, 'ध्वनि के उपयोग से सुरुचिविहीन नाटकीयता के द्वार खुल जाएंगे और सिनेमा की अपनी विशिष्ट प्रकृति इसमें खो जाएगी।' चार्ली चैपलिन की इस भविष्यवाणी के प्रतिकूल ध्वनि के समावेश ने सिनेमा को और समृद्ध बनाया, इस माध्यम के प्रवेश से सम्प्रेषण अधिक प्रभावोत्पादक हो गया। जनमानस सिनेमा देखने के लिए उमड़ पड़ा और गीत-संगीत की लहरों के साथ थिरकने लगा।
भारत में 7 जुलाई 1896 को आरंभ हुए सिनेमा प्रदर्शन से निर्माण तक की
तमाम असुविधाओं और सामाजिक विरोध के बावजूद फिल्मों ने धीरे-धीरे अपने पैर जमा
लिए। हिंदी सिनेमा के पितामह थे, दादा साहब फाल्के, जिन्होंने सन 1913 में फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' का अत्यंत सीमित साधन से
निर्माण किया था. सन 1931
में
अर्देशर ईरानी ने पहली बोलती फिल्म बनाई, 'आलम आरा'.
शुरुआती दौर में प्रचलित नाटकों का फिल्मांकन
होता रहा जो सामान्यतया पौराणिक आख्यानों पर आधारित थे, फिर इन्हीं कथानकों पर
स्वतंत्र रूप से फिल्में बनने लगी। अर्देशर ईरानी, पृथ्वीराज कपूर, सोहराब मोदी जैसे समर्थ नाटककारों ने हिन्दी
सिनेमा में प्रवेश कर इसे लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। दादा साहब
फाल्के और बाबूराव पेंटर जैसे फिल्म-तकनीक-विशेषज्ञों ने उस समय उपलब्ध सीमित साधनों के बल पर
भारतीय सिनेमा की मजबूत नींव रखी।
फिल्में बनाना खर्चीला शौक है। बेहिसाब लागत वाला, मेहनती और बेहद जुनूनी काम है, फिल्म बनाना। सबसे पहले कहानी का चयन, फिर धन का जुगाड़, कलाकारों और तकनीशियनों का चुनाव, 'लोकेशन' का चयन, 'सेट' की व्यवस्था और फिल्म बन जाने के बाद प्रदर्शन का प्रबंध। हजारों के सपने आधे में टूट गए, सैकड़ों के सपने दुःस्वप्न में परिवर्तित हो गए। फिल्म 'हिट' न हुई तो फ़िल्मकार सड़क पर आ गया, कर्ज़ में डूब गया और अवसादग्रस्त होकर किसी नशे की गिरफ्त में फंस गया। जोखिम भरे इस दुःसाहस का सामना करने वाले दो वर्ग बने, पहला व्यापारिक बुद्धि वाला निर्माता जिसने बाज़ार की मांग को ध्यान में रखते हुए फिल्मों का निर्माण किया और दूसरा कलात्मक बुद्धि वाला जिसने बाज़ार को ठेंगा दिखाया और आवाम की रूहानी ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए फिल्में बनाई।
आवाम के सिनेमा की शुरुआत का श्रेय
निर्माता-निर्देशक बाबूराव पेंढारकर की मराठी फिल्म 'सावकारी पाश' को दिया जा सकता है जो
साहूकारों के द्वारा गरीबों पर अत्याचार की कहानी पर आधारित थी। इस सिलसिले को चंदूलाल शाह, वीरेन्द्रनाथ सरकार, पी.सी. बरुआ, देवकी बोस, नितिन बोस, हिमांशु रॉय, व्ही.शांताराम, महबूबखान, नन्दलाल जसवंतलाल, फणि मजुमदार, बिमलरॉय जैसे फिल्मकारों ने
बखूबी आगे बढाया।
बाज़ार की नब्ज़ पर गौर करने वालों ने मनोरंजन को
केन्द्र में रखकर 'मसाला' फिल्म की अवधारणा विकसित की
जिसका आरंभ हिमांशु रॉय की 'सुपर हिट' फिल्म 'अछूत कन्या' (1936) से हुआ। इस फिल्म की सफलता
ने हिन्दी फिल्म जगत को वह 'फार्मूला' दिया जो टिकट खिड़की पर भीड़ इकट्ठा करने में
मददगार था। उसके बाद निर्माताओं ने इस दिशा में नित नए प्रयोग किए, कुछ सफल हुए तो कुछ असफल।
मोटे तौर पर मधुर गीत-संगीत, रोमांस और रोमांच, सफलता का पैमाना बन गए। इस
फार्मूले के 'इंग्रेडिएंट्स' में दिनोंदिन इज़ाफ़ा होता गया
और टिकट खिड़की पर भीड़ जुटती गई।
हिन्दी फिल्मों पर गीत-संगीत, मार-धाड़, हंसी-मज़ाक और आंसुओं का स्थायी कब्जा हो गया।
कुछ फ़िल्मकारों ने हॉलीवुड की तर्ज पर 'सेक्स' को परोसा लेकिन भारतीय जनमानस ने उसे स्वीकार
नहीं किया, इस प्रकार भारतीय फिल्मों
में काफी हद तक शुचिता बनी रही।
विगत शताब्दी के उत्तरार्द्ध की फिल्मों को चार श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-
पहली, धार्मिक और ऐतिहासिक फिल्में
जिन्हें देखने वाला वर्ग बहुत बड़ा था। यद्यपि उल्लेखित शताब्दी के मध्यकाल में
अधिकाँश परिवारों में फिल्म देखने जाने पर सख्त पाबंदी हुआ करती थी किन्तु ऐसी
फिल्मों के लिए 'जाओ, देख आओ' की सुविधा
प्राप्त हो जाती थी। ये फिल्में अपनी कथानकीय 'पवित्रता' और मधुर
संगीत के सहारे खूब चलती थी।
दूसरी, सामाजिक और पारिवारिक फिल्में जिन्हें बनाने में एव्हीएम, जेमिनी, प्रसाद प्रोडक्शन जैसी मद्रासी फिल्म निर्माण कम्पनियों को खास महारत हासिल
थी। ये फिल्म निर्माता पारिवारिक कथानक पर संयुक्त परिवारों की तात्कालीन
परिस्थितियों को पर्दे पर इस तरह प्रस्तुत करते कि परिवारों का समूह, खास तौर से महिलाएं, सिनेमा हाल की ओर उमड़ पड़ती। परिवार की तकलीफों, प्रताड़नाओं और असुविधाओं का सामूहिक प्रदर्शन पूरे हाल को सिसकियों और आंसुओं
से भर देता। उस विरेचन प्रक्रिया से तृप्त होकर दर्शकगण स्वयं को ‘रिलेक्स' महसूस करते और 'पैसा वसूल' की मनोदशा के साथ घर वापस जाते।
तीसरी,स्टंट फिल्में थी जिनके पात्र तलवारबाजी या उठा-पटक की विभिन्न विधाओं से उन दर्शकों का मनोरंजन करते थे जिन्हें 'चवन्नी क्लास' का तमगा हासिल था। ये फिल्में दर्शकों में उत्तेजना बनाए रखती, ठूठे और कमजोर लोगों की भी शक्तिसंपन्न कर देती फलस्वरूप इन दर्शकों की आँखें और कान लाल हो जाते, वे खुशी के मारे सीटियाँ बजाते और तालियाँ पीटने लगते। नाडिया, जान कावस, रंजन, शेखमुख्तार, निशि, दारासिंह जैसे अनेक कलाकार इन झनझनाती फिल्मों के जरिये बेहद लोकप्रिय थे।
चौथी,'रोमांटिक' फिल्में थी जो युवाओं के दिल के बहुत नजदीक हुआ करती थी। सामान्यतया इनका
कथानक अपराध के इर्द-गिर्द बुना जाता था जिसमें खलनायकों से बचते या
मुकाबला करते प्रेमियों की दुखद दास्ताँ को मधुर गीत संगीत के साथ प्रस्तुत किया
जाता था। इन फिल्मों में पेड़ों के आसपास नाचते नायक-नायिका और बेबसी तथा बेवफाई
के दर्द भरे गीत होते जो युवाओं को मोहब्बत में होने वाले खतरों से वाकिफ भी कराते
और इश्क के जज्बात को सिनेमाहाल में ही उपलब्ध करा देते।
राजकपूर जैसे कुछ निर्धारित सीमा पार कर जाते अन्यथा सामाजिक 'पवित्रता' का फिल्म बनाते समय पर्याप्त ध्यान रखा जाता। निर्माता-निर्देशक यदि होशियारी
में लक्ष्मणरेखा लांघता तो सेंसरबोर्ड बेरहमी से कैंची चलाता। केवल पक्षियों
और फूलों के चुम्बन दृश्यों को अनुमति प्राप्त थी, वह भी अत्यंत संक्षिप्त।
राजकपूर के अतिरिक्त दिलीपकुमार, अशोककुमार, देव आनंद, बलराज साहनी, शम्मी कपूर, किशोर कुमार, गुरुदत्त, राजेन्द्रकुमार, धर्मेंद्र, जितेंद्र, राजेश खन्ना, संजीव कुमार, सुनील दत्त, मनोजकुमार, अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा, महमूद आदि इस युग के महानायक रहे। नर्गिस, मधुबाला, मीनाकुमारी, नूतन, नन्दा, वैजयंतीमाला, तनुजा, माला सिन्हा, वहीदा रहमान, हेमा मालिनी, सायराबानो, आशा पारेख, साधना आदि का अत्यंत लोकप्रिय अभिनेत्रियों के रूप में बोलबाला था।
रोचक पटकथा, तीखे चुटीले संवाद, मनमोहक नृत्य और मधुर संगीत से सजी ये फिल्में उस समय की सामाजिक परिस्थितियों
और समस्याओं का बखूबी चरित्र चित्रण करती थी। निर्माता और निर्देशक अपनी
अभिरुचियों के अनुरूप लेखकों से कहानियां लिखवाते और उसे मनोरंजक बनाकर प्रस्तुत
करते। ऐसा नहीं था कि सभी फिल्में स्तरीय थी, कुछ कमजोर फिल्में बनती थी
परन्तु फूहड़ता, जुगुप्सा या अश्लीलता का कोई काम न था।
इसी दौरान व्ही.शांताराम की 'दुनिया न माने'(1937), 'डा॰ कोटनीश की अमर कहानी'(1946), 'तूफान और दिया'(1956), 'दो आँखें बारह हाथ'(1957); महबूब खान की 'औरत'(1940), 'रोटी'(1942), 'मदर इंडिया'(1957); अमिय चक्रवर्ती की 'सीमा'(1955), बिमल रॉय की 'दो बीघा जमीन'(1953), 'परख'(1960), बंदिनी (1963); सत्येन बोस की 'जागृति'(1954), 'दोस्ती'(1964); राजकपूर की 'श्री 420'(1955), 'बूट पालिश'(1954), 'जागते रहो'(1956); बी॰आर॰चोपड़ा की 'धर्मपुत्र'(1961), ऋषिकेश मुखर्जी की 'अनाड़ी'(1959), 'आनंद'(1971); श्रीनिवास सथ्यू की 'गरम हवा'(1973), श्याम बेनेगल की 'अंकुर'(1974), 'निशांत'(1975), 'मंडी'(1983), 'मम्मो'(1994); गोविंद निहलानी की 'तमस'(1986) जैसी सामाजिक सरोकार से जुड़ी
अनेक फिल्में बनी।
अधिकांश फिल्म निर्माता अपने कार्य को
व्यापार की तरह करते थे जिसका उद्देश्य लाभ कमाना होता था। उसके लिए वे फिल्म की
कहानी में भावुकता, उत्सुकता, नाचना-गाना, अंग-प्रदर्शन, कॉमेडी, मार-धाड़ और सुखांत घटनाएं
पिरोते थे। उनकी सोच वाज़िब थी क्योंकि फिल्म निर्माण में बहुत बड़ी लागत लगती थी
जिसको वसूल करना मज़ाक नहीं था। सारे 'टोटकों' के बावज़ूद तथाकथित फार्मूला फ़िल्में पिटती थी
वहीं पर कम बजट में बनी सामाजिक सरोकार की फ़िल्में न केवल लागत वसूल कर लेती थी
वरन लाभ भी कमाती थी क्योंकि इन फिल्मों की कहानी दर्शक के जीवन के यथार्थ से जुड़ी
हुई थी जिसे वह सिनेमा-हाल के अँधेरे में देखना चाहता था। वह महसूस करना चाहता था
कि उसका संताप और उसकी भावनाएं उसके अकेले की नहीं बल्कि सार्वभौमिक हैं।
हिन्दुस्तानी सिनेमा में व्यापारियों की
बहुतायत थी लेकिन कला-मनीषियों की उपस्थिति भी कम न थी। सच तो यह है की फिल्मों के
व्यापारी कलाकारों की कला का शोषण करके धन कमाते थे लेकिन कभी-कभी 'सत्कर्म' भी हो जाता था, संयोग से संदेशवाहक फिल्में
भी बन जाती थी जैसे बी॰आर॰चोपड़ा की 'नया दौर'(1957), एम॰एस॰वासन की 'पैगाम'(1959), 'जिस देश में गंगा बहती है (1960) आदि। यद्यपि अनेक फिल्मों
में जनसामान्य की समस्या को कहानी का आधार बनाकर मनोरंजन का तानाबाना बुना जाता था
ताकि कोई 'अच्छा संदेश' चला जाए और लागत भी वसूल हो
जाए। जनोपयोगी पटकथा के आधार पर आगे बढ़ी अनेक फिल्में निर्माण के दौरान बनते-बनते
भटक गई क्योंकि निर्माता-निर्देशक पर उनकी धारा बदलने के लिए 'फायनेंसर' और वितरकों का दबाव रहता था।
हिन्दी सिनेमा जगत में अब नई पीढ़ी ने काम
सम्हाल लिया है जो वर्तमान दौर की जरूरतों के अनुसार फिल्में रचते हैं। उनका
स्पष्ट कथन है- 'वही बनाएँगे जो बिकता है।' परिणामस्वरूप भारतीय सिनेमा
को हॉलीवुड ने अपनी गिरफ्त में ले लिया और आयातित कहानी, स्टंट और निर्लज्जता ने
पुराने मूल्यों को विस्थापित कर दिया। अब फिल्म बनाने का उद्देश्य समाज की
समस्याओं पर चिंतन करना, बेहतर समाज का निर्माण करना, लोगों को शिष्टाचार सिखाना, देशभक्त बनाना, संवेदनशील बनाना नहीं रहा; अब उद्देश्य है, 'पब्लिक' का मनोरंजन करना और अपने 'बैंक बेलेन्स' की वृद्धि पर नज़र रखना है।
आज का पटकथा लेखक 'क्यू' को तोड़कर अलग खड़े नायक से यह
संवाद कहलाता है- 'जहां हम खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है।' ऐसे गैरजिम्मेदार संवाद
लेखकों और फिल्मकारों से सामाजिक सरोकार की उम्मीद कैसे की जाए ?
फिर भी, नई पीढ़ी के आदित्य चोपड़ा, करण जौहर, संजय लीला भंसाली, आशुतोष गोवारीकर, राजकुमार हिरानी, मधुर भंडारकर, फरहान अख्तर, प्रकाश झा और आमिर खान जैसे
फ़िल्मकार अच्छी फिल्में दे रहे हैं। सामाजिक समस्याओं पर प्रकाश झा ने अपनी चौंतीस
वर्ष (1976-2010)
की
फिल्म-यात्रा में अपनी फिल्मों का कथा-आधार भारत के सामाजिक जीवन को बनाया और उत्कृष्ट
फिल्में बनाई। 'दामुल'(1984), 'हिप-हिप हुर्रे'(1984), 'गंगाजल'(2003), 'अपहरण'(2005), 'राजनीति'(2010), जैसी आवाम से जुड़े यथार्थ को
उन्होंने भारतीय सिनेमा के मुकुट में दैदीप्यमान मणि की तरह जड़ा और वर्तमान दौर के
दूषित चलचित्र-विश्व में महाभारत के भीष्म की तरह अडिग बने रहे।
आशुतोष गोवारीकर की फिल्म 'स्वदेश'(2004), आशुतोष गोवारीकर और आमिर खान
की 'लगान'(2001), 'तारे जमीन पर'(2008) और 'दंगल' (2016) तथा विधु विनोद चोपड़ा
और राजकुमार हिरानी के साझा उपक्रम में निर्मित '3 ईडियट्स'(2009) समाज के सरोकार पर बनी
अद्भुत फिल्में थी। सन 2009
के
बाद फ़िल्मकारों की नई पीढ़ी का उदय हुआ है जो हिन्दी फिल्मों को नई दिशा देने में
लगा हुआ है।
वर्तमान पीढ़ी को शिक्षित करने में फिल्में अपना योगदान दे
सकती हैं बशर्ते, शिक्षा देने वाले स्वयं 'सुशिक्षित' हों। ऐसे फ़िल्मकार पहले भी थे और
आज भी हैं जो समाज की गतिविधियों पर नज़र रखते हैं और उसकी विसंगतियों पर फिल्म के
माध्यम से प्रहार करने का साहस करते है। मनोरंजन के साथ-साथ लोकशिक्षण का
उत्तरदायित्व निभाने वाले और भी आएंगे, नई समझ लेकर आएंगे और फिल्मों को जनमानस के
सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बनाएंगे। आने वाले समय को आने वाले फ़िल्मकारों से
बड़ी उम्मीदें हैं जो फिल्मों के माध्यम से भावी पीढ़ी को मनोरंजन देने के साथ-साथ
मनुष्य बने रहना सिखाएंगे और उन्हें दूसरों की तकलीफ़ों के प्रति संवेदनशील होने का
पाठ पढ़ाएंगे।
==========
आलेख
: पुरानी यादें :
-----------------------
सिनेमा और मैं :
==========
हम सब अभिनय ही तो कर रहे हैं, जब तक सांस है, अभिनय चलता रहेगा, सांस रुक जाने पर यह रुक जाएगा और हम अपने वास्तविक स्वरूप में आ जाएंगे। जिंदगी में हम अपनी 'स्क्रिप्ट' हम लिखने की कोशिश करते ज़रूर हैं लेकिन अपना लिखा कम उपयोग में आता है और समय का लिखा हुआ अधिक असर दिखाता है। डा॰ एरिक बर्न का मानना है कि मनुष्य की 'स्क्रिप्ट' उसके शैशवकाल में ही लिख जाती है, वह उसी के आधार पर अपना जीवन व्यतीत करता है। प्रश्न यह है कि इस 'स्क्रिप्ट' को कौन तैयार करता है ? इस 'स्क्रिप्ट' को हमारे बचपन से जुड़े आसपास के लोग तैयार करते हैं। उनकी गतिविधियों को देखकर शिशु अपने मस्तिष्क के कोरे कागज में लिख लेता है जिसका असर उसके पूरे जीवन पर हावी रहता है। किसी साक्षात निर्देशक के बिना भी हमारे जीवन की फिल्म में हम अभिनय करते रहते हैं और बचपन में संरक्षित हुई 'स्क्रिप्ट' हमसे अभिनय करवाते रहती है।
सीखने की प्रक्रिया जन्म लेने के साथ ही आरम्भ
हो जाती है. जन्म के बाद मनुष्य को संस्कारित करने के लिए संसार ने भांति-भांति के
तरीके रचे ताकि उसे पशुता से दूर रखा जा सके लेकिन समाज में मनुष्यता सिखाने वाले
हैं तो दुष्टता सिखाने वाले भी हैं. दोनों अपने-अपने फ़न में माहिर होते हैं. जो
जिसके कहने में आ गया, वही उस मनुष्य का भवितव्य होता है. हमारा जीवन स्वप्नवत है
पर नींद खुल जाने पर हम उससे मुक्त नहीं हो पाते। जागृत अवस्था में संकट से जूझते
रहना और उनसे मुक्त होने के स्वप्न देखना ही हमारा जीवन है। जैसे जीवन अनिश्चित है
वैसे ही संकट भी हमारे अनुमान से परे होते हैं। हम सब उन्हीं परिस्थितियों से जूझ
रहे हैं। सिनेमा इस संकट से कुछ देर की मुक्ति का साधन बन कर आया।
मनुष्य की उत्सुकताओं में से एक है- दूसरे
व्यक्ति की ज़िन्दगी में झांक कर देखना। हम यह इसलिए देखना चाहते हैं क्योंकि एक
सामाजिक प्राणी होने के कारण हमें अपने आस-पास हो रही घटनाओं पर नज़र रखना ज़रूरी
लगता है। दूसरों की ज़िन्दगी में विविध रंग हुआ करते हैं जैसे कोई खुश दिखता है तो
कोई दुखी, कोई बहादुर दिखता है तो कोई
कायर, कोई चतुर दिखता है तो कोई
बुद्धू। अगर गौर से देखा जाए तो प्रत्येक मनुष्य में ये सारे लक्षण विद्यमान रहते
हैं और अलग-अलग अवसरों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उद्घाटित होते रहते हैं।
इसके अतिरिक्त दूसरों की गल्तियां भी हमें आकर्षित करती हैं क्योंकि उनकी भूलें
हमें कुत्सित आनन्द देती हैं। सिनेमा हमारी इन आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक
सिद्ध हुआ, सम्भवतः इसीलिए लोकप्रिय भी
हुआ।
बीसवीं शताब्दी की शुरुआत के भारतवर्ष पर गौर करें
तो हमारा देश गरीबी, गुलामी और सामाजिक वर्जनाओं
से ग्रस्त था. अनेक फिल्मों के कथानक इन्हीं विषयों को ध्यान में रखकर लिखे गए और
एक से एक बढ़कर फ़िल्में बनी, सबसे ज्यादा रोमांटिक
फ़िल्में बनी. तात्कालीन समाज में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में एक स्पष्ट लक्ष्मण रेखा
थी जिसे लांघना घोर अनैतिक माना जाता था. लिहाज़ा, प्यार करने पर प्रतिबन्ध था और यदि किसी को
किसी से प्यार हो ही गया तो फ़िर उनके विवाह पर महाप्रतिबंध था. सिनेमा रचने वालों
ने इस सामाजिक सोच का भरपूर विदोहन किया. पहले छेड़-छाड़ दिखाई, फिर दोनों की आँखे मिलीं, दोनों मुस्कुराए, साथ-साथ गाने गाए. उसके बाद
अचानक किसी ने उन्हें प्यार करते देख लिया, परिवार में खबर हो गई, परिवार की इज्जत दांव पर लग
गई. दोनों को अलग कर दिया गया. विरह-वियोग के गीत गाए गाए और फिल्म का दुखांत हो
गया. भारत के फिल्मकारों ने वर्जनाओं से ग्रस्त समाज की पीड़ा को उकेरा और फिर उस
पर ठंडक देने वाला मरहम भी लगाया.
सिनेमा अगर आसन्न संकटों का दिग्दर्शन है तो वह
मीठे सपने बेचनेवाला सौदागर भी है। मेरे किशोर-वय की एक सच्ची बात आपको बता रहा
हूं, सन १९६१ में जब मैं चौदह
वर्ष का था, एक फ़िल्म आई- ‘जंगली’, जिसमें काश्मीर की हसीन
वादियां थी, शंकर-जयकिशन का मधुर संगीत
था, उछलता-कूदता शम्मी कपूर था
और जन्नत की परी जैसी सायराबानो। हाय, सायराबानो की छरहरी काया, मोहक नाक-नक्श, सलोनापन और झील जैसी शान्त
आंखों ने मुझपर जादू सा कर दिया। वह बोलती तो उसकी आवाज़ सुनकर ऐसा लगता जैसे उसके
होंठों से होकर दसेहरी आम की फ़ांकों से रस अब गिरा कि तब। सच बता रहा हूं, मैं रात को अपनी तकिया के
नीचे उसका फ़ोटोग्राफ़ रखकर सोता था क्योंकि मुझे किसी ने बताया था कि वैसा करने पर
वह मेरे सपने में आएगी। यह दूसरी बात है कि सायरा तो नहीं आई, एक बार मीनाकुमारी जरूर मेरे
सपने में आई थी। उस समय अक्ल ने काम नहीं किया अन्यथा मैं मीनाकुमारी का फ़ोटोग्राफ़
तकिए में दबाकर सोता तो शायद सायरा सपने में आ जाती। इस घटना से आप यह आसानी से
समझ सकते हैं कि सिनेमा सिर्फ़ हमें सपने ही नहीं दिखाता वरन हमारे सपनों में दिखता
भी है।
हिन्दी सिनेमा ने विगत सौ वर्षों में अपने
सीमित साधनों के बावज़ूद विश्व सिनेमा में अपनी अलग साख बनाई है, संख्या के साथ-साथ गुणवत्ता
में भी। इस अवधि की फ़िल्मों का अवलोकन किया जाए तो अनेक ऐसी फ़िल्में बनी जो मानवीय
मूल्यों की गहरी समझ लिए हुए थी। सन १९५५ में प्रदर्शित फ़िल्म ‘श्री ४२०’ को मैंने आठ वर्ष की उम्र
में देखा था. उस फ़िल्म में मनुष्य के छ्द्म सपनों का अभूतपूर्व चित्रण था. उन
दिनों भारतवर्ष आजादी की ताज़ी सांस ले रहा था, भारतवासियों की उमंगें लहरा रही थी, आशाओं के दीप जगमगा रहे थे; उसी समय `श्री ४२०' आई जिसने सभ्यता और प्रगति
के मुखौटे पहने समाज को पहचानने का प्रयास किया और उसके संभावित खतरों से अवाम को
परिचित कराया। फिल्म `श्री ४२०' में मनुष्य के संकट और
स्वप्न का ह्रदयस्पर्शी चित्रण था। इस फ़िल्म को मैंने जितनी बार देखा, हर बार इसने मुझे कुछ नए
अर्थ समझाए. फ़िल्मकार राजकपूर ने जैसे दर्शक को खुली छूट दे रखी हो कि फ़िल्म के हर
फ़्रेम में दर्शक अपने जीवन को फ़िट करके देखे और उसके चाहे जितने अर्थ निकाले. यह
सच है कि मनुष्य के दुख और सुख उसकी व्यक्तिगत अनुभूति होती है लेकिन जब हम उसे
अपनों के बीच साझा करके व्यापक अभिव्यक्ति देते हैं तब वे सबके हो जाते हैं.
सन १९५७ में फ़िल्म ‘मदर इन्डिया’ आई जिसमें ग्रामीण जीवन की
विषमताओं और समस्याओं का गहन विश्लेषण करने के लिए भारतीय ग्राम्य जीवन के वैविध्य
भरे कथानक को बखूबी पिरोया गया था। उसमें गरीब के सपने थे और जिजीविषा का संघर्ष
भी। लहलहाती फ़स्लों का संतोष था और बाढ़ से उजड़ गए सपने भी। स्त्री की लज्जा एवं
सम्मान का संकट था और उसके भूखे बच्चों का पेट भरने की विवशता भी।
फ़िल्म की कहानी इस तरह लिखी गई जिससे भारतीय समाज में स्त्रियों की दयनीय स्थिति, पुरुषों के बढ़ते प्रभाव का विरोध और एक स्त्री के अपने स्वाभिमान पर दृढ़ निश्चय को दर्शाया गया। मेहबूब खान ने इन्सानी ज़ज़्बात और उसकी मजबूरियों को इस तरह उकेरा था कि फ़िल्म देखने वाले का दिल दहल जाए। स्वप्न और संकट का अनवरत संघर्ष मनुष्य के जीवन की वह विशेषता है जो सपनों को सच करने की चाहत और उसे संकट से लड़ने की ताकत देते रहता है। यदि वह निराश करता है तो नए सपने दिखाकर पुनः आशा का संचार करता है और इसी तरह मनुष्य का जीवनचक्र चलते रहता है। फ़िल्म ने दो विकल्प दिए- एक, नायक का घर-परिवार से पलायन कर जाना और दूसरा, नायिका का अत्यन्त विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करना.
सन १९६० में प्रदर्शित फ़िल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ में दो पीढ़ियों के संघर्ष को
आधार बनाकर इन्सानी ताकत और मोहब्बत की ताकत के फ़र्क का बखूबी चित्रण किया गया.
मधुर गीत-संगीत से सजी इस फ़िल्म को देखना मनमोहक था लेकिन समझना कठिन क्योंकि
फ़िल्म के संवाद इस कदर खालिस उर्दू में थे जो सामान्य दर्शकों की पकड़ के बाहर थे.
सलीम-अनारकली की काल्पनिक कहानी को निर्माता-निर्देशक के. आसिफ़ ने इस खूबसूरती से
बनाया कि अगर शहंशाह अकबर ज़िन्दा होते और इस फ़िल्म को देखते तो उनके दरबार में नौ
की जगह दस रत्न होते, दसवें रत्न होते, के. आसिफ .
सन १९९३ में निर्माता एल.बी.लछमन और निर्देशक हृषिकेश
मुखर्जी ने एक ईमानदार फ़िल्म बनाई- ‘अनाड़ी’ जिसे राजकपूर, नूतन, ललिता पवार, मोतीलाल के अभिनय और शंकर जयकिशन के संगीत ने
यादगार बना दिया. नायक की संघर्ष गाथा में ईमानदारी के पुट को जोड़कर इस फ़िल्म ने
संदेश दिया था कि ईमानदारी की राह कठिन है लेकिन वही जीवन का असल संगीत है.
फ़िर सन १९७१ में आई फ़िल्म ‘आनन्द’. हृषिकेश मुखर्जी ने ज़िन्दगी
और मौत के संघर्ष को इस तरह चित्रित किया था कि कैन्सर जैसी जानलेवा बीमारी भी एक
कविता बन गई. राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के असरदार अभिनय और हृषिकेश मुखर्जी के
कसे हुए निर्देशन ने इस फिल्म को यादगार बना दिया.
============
आलेख
: पुरानी यादें :
-----------------------
असरदार सिनेमा :
===========
बीसवी शताब्दी की शुरुआत
में जब चलती-फिरती तस्वीरें परदे पर उभरी तो हिन्दुस्तान में खलबली मच गई। दर्शकों
के लिए सिनेमा का आगमन किसी जादू से कम नहीं था। सिनेमा के आविर्भाव ने
दर्शकों का ऐसा वर्ग तैयार किया जो सहस्त्रबाहु की तरह बढ़ता ही गया और वह मनोरंजन
का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम बन गया। जब देश में सिनेमाहाल बनने
लगे तो दर्शकों की संख्या और बढ़ने लगी। कालांतर में फिल्में जनमानस को सन्देश देने
का प्रभावशाली माध्यम बन गई।
सिनेमा की तकनीक ने दर्शकों के मनोविज्ञान को
चुपके से प्रभावित किया। यद्यपि फिल्मों की कहानियां महज़ मनोरंजन के लिए लिखी जाती
थी लेकिन उनका प्रभाव व्यापक होता था। वे फिल्में मनोरंजन के साथ-साथ मानव व्यवहार
की विशेषताओं और कमजोरियों पर दर्शकों से खुली चर्चा करने लगे। मनुष्य के स्वभाव
में कुछ बातें सार्वभौमिक हैं जैसे, प्रेम और घृणा, दया और दुष्टता, स्नेह और ईर्ष्या, राग और विराग, सहनशीलता और क्रोध, आनंद और आतंक, समझदारी और नासमझी आदि।
हिन्दुस्तानी सिनेमा ने इन्हीं भावनाओं के आसपास बिखरी हुई कहानियों को अपनी फिल्म
की विषयवस्तु बनाया और इनका भरपूर विदोहन किया।
भारत में रामलीला और कृष्णलीला
की प्राचीन परम्परा रही है इसलिए शुरूआती सिनेमा पौराणिक कथाओं के चित्रांकन
से आरम्भ हुआ जो सुर-असुर के मध्य संघर्ष में बुराई पर अच्छाई की विजय की
प्रमाणिकता और भगवान की उपस्थिति पर विश्वास जन-मन में स्थापित करने में सफल रहा।
धार्मिक फिल्मों ने अतीत की कथाओं को वर्तमान में इस तरह प्रस्तुत किया कि दर्शक
धर्म के प्रति अधिक आस्थावान होकर आत्मिक गहराई से जुड़ सके। चूँकि फिल्मकार
फ़िल्में धन कमाने के लिए बनाते थे इसलिए कथानक का चुनाव करते समय दर्शकों की
संख्या का गणित उनके दिमाग में सदैव बना रहता था, आज भी ऐसा ही चल रहा है।
उन दिनों अधिकतर फ़िल्में हिन्दू धर्म में प्रचलित दंतकथाओं पर बनी क्योंकि उसका
दर्शक वर्ग बहुत बड़ा था। कुछ मुस्लिम मान्यताओं पर भी फ़िल्में बनी जिन्होंने
मुस्लिम समुदाय को मोहित और प्रभावित किया। ईसाई मतावलंबियों के लिए भी फ़िल्में
बनी होंगी लेकिन वे मेरी जानकारी में नहीं हैं, हां, बीसवी सदी के अंत में ईसाई
परिवारों के जीवन पर अनेक लोकप्रिय फ़िल्में बनी, जैसे, 'जुली', 'बॉबी' आदि और उनका असर समाज के सभी वर्गों पर
समान रूप से पड़ा। मेरा अनुमान है कि इन फिल्मों ने भारतीय समाज में आधुनिकता का
प्रसार करने में महती भूमिका निभाई।
सन 1940 से 1960 के मध्य धार्मिक फिल्मों
के साथ-साथ ऐतिहासिक घटनाओं पर केन्द्रित फिल्में भी बनी और उसके बाद अमरीकी 'काउ बॉय' फिल्मों की नकल पर मारधाड़
वाली स्टंट फिल्में भी बनी लेकिन इन फिल्मों को समाज ने इन्हें बहुत गंभीरता से
नहीं लिया। उसके बाद सामाजिक विषयों पर बनी फिल्मों का दौर चला जिसने भारतीय समाज
की कुप्रथाओं पर गहरी चोट की तथा जनमानस को नवीन दृष्टिकोण से विचार करने और
अपनाने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया।
आज़ादी के पूर्व काल में
भारतीय जनमानस शिक्षित नहीं था। घरों में प्रचलित परिपाटी के अलिखित आदेश पर
परिवार संचालित होते थे, पुराने रीति-रिवाजों का
अखंड वर्चस्व था। ये सामाजिक नियम मजबूती से माने और कड़ाई से मनाये जाते थे। कम
उम्र में विवाह होते थे, उसी अपरिपक्व आयु में
स्त्री का गर्भाधान होता था। अक्सर बच्चे का जन्म देते समय या तो समुचित देखरेख के
अभाव में माँ मर जाती थी या बच्चा निपट जाता था। स्त्री जब तक गर्भधारण करती रहे, उसे उतने बच्चे जनने पड़ते
थे, आम तौर पर एक स्त्री के दस
से पंद्रह बच्चे होना सामान्य बात थी। उसे घर के बाहर परदा करना पड़ता था और घर के
भीतर भी। एक हाथ का लंबा घूँघट काढ़ कर चूल्हे में भोजन बनाने और परोसने वाली औरत
की उसके अपने घर-परिवार में कोई आवाज़ नहीं थी। जब तक उसका पति जीवित होता तब तक वह
मनुष्य जैसी होती लेकिन यदि पति का असमय निधन हो गया तो वह स्त्री न मनुष्य रह
पाती न निरीह पशु। विधवा विवाह की बात सोचने से पुरुषों के समूह को पाप लग जाता
था।
उन दिनों संयुक्त परिवार
की व्यवस्था बेहद दोषपूर्ण थी जिसमें प्यार और स्नेह की जगह डांट-फटकार और आतंक का
बोलबाला था। परिवार के सदस्यों में आपसी बातचीत का अभाव था, 'चुप रहो' का साम्राज्य था। विवाह के
निर्णय पर बुजुर्गों का एकाधिकार था, जिन युवाओं की शादी होती
थी वे निरीह पशुओं की खरीद-बिक्री की तरह चुपचाप अपने खूँटे बदल लेते थे। अविवाहित
स्त्री और पुरुषों को प्यार करने की मनाही थी, यहाँ तक कि विवाह के बाद
भी पति-पत्नी को प्यार दिखाने पर प्रतिबंध था। पिता-पुत्र के संबंध सदैव खिंचे-खिंचे
रहते थे, सास-बहू के सहसंबंध बाघिन
और बकरी की तरह हुआ करते थे।
भारतीय सिनेमा ने
तात्कालीन हिन्दू-मुस्लिम परिवारों की परिस्थितियों को बारीकी से छुआ, उनकी विसंगतियों को उजागर
किया और उस पर 'कुछ' नया करने की ज़रूरत को
प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
सिनेमा की विधा दर्शकों को
आकर्षित करती है लेकिन फिल्म निर्माण की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि इससे जुड़े
लोगों को आप अर्ध-पागल
कह सकते हैं। इस पागलपन के पीछे उनकी अनेक उम्मीदें नृत्य करती हैं, कोई सिनेमा से पैसा कमाना
चाहता है तो कोई नाम। आम तौर पर फ़िल्मकार की नज़र
दर्शकों की रुचि पर टिकी रहती है जो समय-समय पर बदलती रहती है। फिल्म की सफलता का
कोई निश्चित पैमाना नहीं है, 'जय संतोषी माता' जैसी साधारण फिल्म सुपर हिट हो जाती है, 'मेरा नाम जोकर' जैसी उत्कृष्ट बुरी तरह पिट जाती है।
साधारणतया भारतीय फिल्म किसी निर्माता-निर्देशक की अजीब सी उधेड़-बुन का परिणाम
होता है जो जनसामान्य पर अपना प्रभाव डाले, न डाले, निर्माता की आर्थिक स्थिति
को अवश्य प्रभावित करता है। फिल्म बनाने के लिए केवल धन ही नहीं, धन डुबाने का हौसला भी
चाहिए होता है।
जिनकी नज़र केवल पैसा पीटने
की होती है वे फ़िल्मकार अपनी फिल्म को खट्टी-मीठी-चटपटी चाट की तरह तैयार करता है
क्योंकि ऐसी फिल्म के प्रदर्शन पर सिनेमा की टिकट खिड़की पर लंबी लाइन लगने की
संभावना अधिक होती है। वहीं पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो सामाजिक सरोकार से जुड़ी
फिल्में बनाते हैं ताकि वे अपनी फिल्म के माध्यम से नकारात्मक माहौल को दिखाकर
समाज को कुछ सकारात्मक संदेश दे सकें।
विगत शताब्दि के मध्यकाल
में मद्रासी फिल्म निर्माताओं ने पारिवारिक विषयों पर एक से बढ़कर एक शानदार
फिल्में बनाई और भारतीय परिवारों में व्याप्त विसंगतियों पर मनोरंजक प्रहार किया।'ललिता पवार टाइप' सास अपनी बहू के साथ 'लेडीज़ क्लास' में अगल-बगल बैठकर इन
फिल्मों को देखती थी और फिल्म के कथानक में जब सास के द्वारा बहू पर अत्याचार का
दृश्य पर्दे पर आता तो बहू के संग सास भी सिसक-सिसक कर रोती क्योंकि सास भी तो कभी
बहू थी। जेमिनी, ए॰वी॰एम॰, एल॰वी॰प्रसाद आदि
निर्माताओं ने अपनी फिल्मों के माध्यम से बहुओं के प्रति सासों के कड़क व्यवहार को
कुछ हद तक 'डायल्यूट' किया था। यह परिवर्तन उन
फ़िल्मकारों के साझा प्रयास का प्रतिफल था।
एक और संकट था उन दिनों
युवाओं के लिए, विपरीतलिंगी प्यार पर समाज
का कड़ा विरोध। इसके पहरेदार हर समय प्रेमियों की हरकतों पर सतर्क निगाह रखते थे और
ज़रा सी भनक लगने पर क्रोध से भभकने लगते थे। दरअसल, 'वे मुहब्बत के दुश्मन नहीं थे, उसूलों के गुलाम थे।' लेकिन प्यार ऐसा जज़्बा है, चाहे जितनी पाबंदी लगाई
जाए, हो जाता है। आश्चर्य की
बात यह है कि विवाह जैसा जीवन के लिए महत्वपूर्ण संस्कार निपट अंजान से किया जा
सकता था लेकिन किसी युगल का जान-पहचान के आधार पर विवाह होना असंभव था। एक मुश्किल
यह भी थी कि प्रेमी प्यार करने के पहले जात-कुजात का विचार नहीं करते थे, प्यार अक्सर ऊंची-नीची जाति
में होते थे, इस वजह से उन दिनों
सामाजिक परंपरा के संकट खड़े हो जाते थे। प्यार करने वाले आशिक और माशूका दोनों को
पहले तो घर में मनाया-समझाया जाता था फिर न मानने पर लतियाया जाता था। परिणामतः
आत्महत्या और घर से भागना जैसे दुस्साहसिक प्रयोग बड़ी संख्या में सुनाई पड़ते थे।
देश की आज़ादी के आसपास
स्त्री-पुरुष प्रेम पर आधारित फिल्मों का जो सिलसिला शुरू हुआ तो आज तक थमा नहीं
है। सन 1944 में एक फिल्म 'रतन' प्रदर्शित हुई जिसमें
नौशाद की धुन पर प्रेमरस से पगे हुए ऐसे मधुर गीत थे कि जिसने भी उन्हें सुना, प्यार की भावना से सराबोर
हो गया। उन गीतों ने मोहब्बत करने वालों को दीवाना बना दिया। उस जमाने के लोग
बताते हैं कि फिल्म 'रतन' से प्रभावित होकर अनेक
अविवाहित जोड़े घर से भाग गए और समाज के विरोध की परवाह किए बिना विवाह कर लिया और
अपनी गृहस्थी बसा ली। इस फिल्म के 29 वर्ष बाद 'बॉबी' आई जिसका असर 'रतन' से बहुत आगे बढ़कर हुआ। उन
युवाओं ने घर-परिवार से विद्रोह करके अपनी आज़ादी की नई इबारत लिखी और पुराने
उसूलों की धज्जियाँ उड़ा दी। ऐसी रोमांटिक भारतीय फिल्मों की लिस्ट लंबी है जिसने
युवा पीढ़ी की सोच में परिवर्तन लाने एवं उनमें साहस के संचार करने का अद्भुत
कारनामा कर दिखाया और अनेक युवाओं को आत्महत्या जैसा घटिया निर्णय लेने से बचाया।
1947 में
देश को आज़ादी मिली, पूरा देश खुशहाली के सपने
आशा भरी निगाह से देख रहा था। आज़ादी के बाद कई फिल्मों भूख और बेकारी को केंद्र
में रखकर बनाई गई ताकि भारत के आवाम की जरूरतों को सार्थक दिशा दी जा सके। ख़्वाजा
अहमद अब्बास जैसे कई लेखकों की कलम ने गरीबी की तकलीफ़ों को सिनेमा के पर्दे पर
पहुंचा कर जन गण मन को शब्द दिए। ऐसी फिल्में अधिक नहीं बनी लेकिन जो बनी, उन्होंने अपनी उपस्थिति
दर्ज़ कराई और दर्शकों ने उन फिल्मों को बेहद शिद्दत से देखा।
1960 से 2000 तक की फिल्में मुहब्बत के
तराने गाते हुए आई। ऐसा लगा जैसे भारतीय फिल्मों में मस्ती छाई हुई है। प्रेमकथा
में संयोग और वियोग को पिरोया गया, विविध शैली के खलनायकों के
चरित्र गढ़े गए, भावपूर्ण गीत लिखे गए, मधुर संगीत से सजाया गया।
उस युग का युवा वर्ग उन फिल्मों को देखकर थिरकने लगा। श्वेत-श्याम फिल्में कम होती
गई और 'गेवाकलर', 'टेक्निकलर' फिल्में आ गई जो देखने में
मनमोहक और अधिक प्रभावशाली हो गई। इसी काल में समानान्तर सिनेमा आया जिसने अनेक कलात्मक
फिल्में दी और देश भर में वैसा प्रबुद्ध दर्शक वर्ग तैयार कर दिया जैसा पश्चिम
बंगाल में था।
फिल्मों की कलाकारों की
वेषभूषा का जनमानस पर गहरा प्रभाव पड़ा। सन 1950 तक नायक-खलनायक-सह कलाकार
आम तौर पर धोती-कुरता पहनते थे लेकिन उसके बाद वे शर्ट-फुलपेंट पहनकर अवतरित होने
लगे। धोती जिस तरह सिनेमा से गुम हुई, उसी तरह उस समय के युवकों
ने धोती पहनना छोड़ दिया और शर्ट-फुलपेंट अपना लिया। फिल्म में यदि नायक को ईमानदार
और भले आदमी के रूप में प्रस्तुत करना हो तो उसे मज़बूरी में कुरता-पायजामा पहना कर
उतारा जाता था जैसे 'सुजाता' में सुनील दत्त और 'सत्यकाम' में धर्मेंद्र। जब 'सुपर स्टार' राजेश खन्ना का जलवा
हिंदुस्तान के सिनेमा जगत में बिखरा तो पुराने जमाने का कुरता और नए जमाने का
फुलपेंट एक साथ चलन में आया और 'गुरु कुरता' फैशन में छा गया, जिसे पुराने और तात्कालिक परिधान
का 'फ्यूजन' कहा जा सकता है।
साड़ी पहनने वाली नायिकाएँ
सलवार-कमीज पहनने लगी तो लड़कियों ने भी साड़ी त्यागकर चूड़ीदार सलवार-कमीज पहन ली।
सार्वजनिक रूप से ढँकी-छुपी स्त्री की देह हौले-हौले खुलने लगी। घरेलू बहुओं के
घूँघट सिर पर टिके पल्लू में आकर रुक गए, स्त्रियॉं के ब्लाउज़ और
कुरती की बांह ऊपर खिसकने लगी, अधोवस्त्र कम होने लगे। सबसे गज़ब अभिनेत्री
साधना ने ढाया। उसका माथा बहुत बड़ा था जो फिल्म के निर्माता-निर्देशक को 'फोटोजनिक' नहीं लग रहा था इसलिए
साधना के सिर के सामने वाले कुछ बाल मेकअपमेन ने उसके माथे पर तनिक 'ट्विस्ट' देकर चिपका दिए। साधना हिट
हो गई तो साधना-कट 'हेयर स्टाइल' भी हिट हो गई और अधिकांश
युवतियों ने अपने माथे पर उसी तरह बाल चिपका लिए।
सिनेमा ने नशे की आदतों को
बहुत प्रोत्साहित किया। अशोक कुमार, देव आनंद, प्राण जैसे कलाकार हर फिल्म में
सिगरेट फूंकते थे, धुएँ के गोल छल्ले बनाते
थे और ऊपर शून्य में ताकने का अभिनय करते थे। युवकों ने उसे फैशन की तरह अपना लिया
और हर दूसरा युवक सिगरेट पीने की लत लगा बैठा। बिलकुल ऐसा ही असर शराब का भी हुआ।
मनुष्य के स्वास्थ्य और खुशहाली को नष्ट करने वाली शराब को अनेक फिल्मों ने 'प्रमोट' किया। गम भुलाने के लिए पी
गई शराब ने पीने वालों को ही पी लिया, कई कलाकार पीने का अभिनय
करते-करते स्वयं शराब की चपेट में आ गए और असमय काल के गाल में चले गए। दर्शक तो फिल्मों से और
आगे निकल गए, फिल्मों ने गम भुलाने के
लिए पीने का उपाय समझाया लेकिन 'पब्लिक' खुशी मनाने के लिए भी पीने
लगी। अब हाल यह है कि शराब न पीने वाले 'सोसाइटी' में पिछड़े हुए माने जाते
हैं!
किसी जमाने में छोटे-छोटे
घर थे, उनमें पूरा परिवार मिल-जुल
कर रहता था। घरों में जगह कम थी लेकिन लोगों के दिलों में जगह की कोई कमी न थी।
बीसवी शताब्दी के अंतिम कालखंड में लोगों के दिल सिकुड़ गए और घर में रहने की जगह
कम पड़ने लगी। फिल्मों में घरों के लिए सजाए गए 'सेट' और सोफासेट दर्शकों की
आँखों से होकर उनके दिमाग में प्रवेश कर गए और घर की कल्पना ने वही वृहद आकार ले
लिया जो उस काल के सिनेमा में दिखाया गया। उसी शैली के घर बनवाने के लिए भरपूर धन
की ज़रूरत थी इसलिए उतनी मात्रा में धन जुगाड़ने की चाहत उत्पन्न हुई और लोग उस तरफ
अधाधुंध दौड़ पड़े। धन आए, चाहे जिस तरह आए, अपना घर बनेगा तो वैसा
जैसा फिल्मों में होता है, बाथरूम बनेगा तो वैसे 'बाथ टब' वाला जिसमें 'हीरोइन' नहाती है। सिनेमा के असर
ने शानदार घरों की कतार खड़ी कर दी और उन भवनों के निर्माण में लगने वाले धन को
अर्जित करने के लिए नैतिक मूल्य गौड़ हो गए, मानवीय गुणों का क्षय हो
गया।
आज़ादी के बाद देश में
समृद्धि आई, भले ही वह कम लोगों के
हिस्से में आई। हमारे राजनीतिज्ञों का पूर्वानुमान है कि वह समय भी आएगा जब देश का
हर नागरिक समृद्ध हो जाएगा। इस समृद्धि के सपने हम सब देखते हैं, पता नहीं वे दिन आएंगे या
नहीं लेकिन एक सिने-दर्शक जब टिकट खरीद कर सिनेमाहाल की सीट पर बैठता है तो
दो-अढ़ाई घंटे की समृद्धि पर उसका पूर्ण अधिकार रहता है। उतने समय तक उसके पास एक
शानदार हवेली होती है, खूबसूरत कार होती है, मादक जोड़ीदार होता है। वह
उन क्षणों में जी कर अपने भूत और भविष्य काल को भुला देता है, यह समय उसका खरीदा हुआ समय
होता है, उसका अपना। इसी समृद्धि का
दिवास्वप्न सिनेमा की लोकप्रियता का आधार है जो हर फिल्म में घुमा-फिराकर अलग-अलग
ढंग से दिखाया जाता है।
समृद्धि के प्रदर्शन के
लिए फ़िल्मकार बड़े सेट लगवाता है, ड्रेस डिजाइन करवाता है, गहने पहनाता है, कलाकारों के चेहरे पर
मेकअप करके छ्द्म आभा बिखेरता है। ट्रिक फोटोग्राफी और कंप्यूटर की मदद से नकली को
असली बना कर दर्शक के समक्ष प्रस्तुत करता है। अधिकतर फिल्मों का असर दो-अढ़ाई घंटे
तक ही रहता है लेकिन कुछ फिल्में बहुत गहरे तक असर कर जाती हैं।
सादगी और ईमानदारी के झूले
में अच्छाई के झोंके लेते समाज ने अचानक करवट ली और झूले से नीचे उतर कर जमीन में
अपनी बाहें समेटता खड़ा हो गया, जैसे चलती गाड़ी में किसी ने 'गेयर' बदल दिया हो। 'एंग्रीयंगमेन' के सनसनीखेज अवतरण ने
युवाओं को अतिआत्मविश्वास, दुस्साहस और मनमर्जी का
ऐसा धारदार हथियार दे दिया कि समाज में शिक्षित-अशिक्षित का अंतर समाप्त हो गया और शिष्टता तथा शालीनता
प्रश्नवाचक चिन्ह बन गई।
किसी भी समाज को उसकी
सज्जनता और परिश्रम करने की शक्ति से पहचाना जाता है। भारतवासी स्वाभाविक रूप से सहनशील और सरल
स्वभाव के हैं। बहुसंख्य लोगों को कानून में लिखी धाराओं से कोई सरोकार नहीं रहता
क्योंकि वे जीवन भर समाज के उन अलिखित नियमों के अधीन रहते हैं जो उन्हें किसी ने
बताए-समझाए नहीं है लेकिन वे स्वयमेव प्रशिक्षित हो जाते हैं। इसके बावजूद शासन के
द्वारा नियम-अधिनियम इसलिए बनाए जाते हैं ताकि लोग नियम भंग करने से डरें। नियमों
के पालन के लिए पुलिस है और पुलिस के ऊपर न्यायालय। जब समाज को ऐसा लगता है कि
पुलिस और न्यायालय उसके हितों की रक्षा नहीं कर रहे हैं, अपराधियों पर उनका दबाव
नहीं है तब समाज में से ऐसे लोग प्रगट होने लगते हैं जो कानून के पालन करवाने के
लिए कानून को अपने हाथ में लेने लगते हैं और गैर-इरादन गैर-कानूनी कार्य करने लगते
हैं। हिन्दुस्तानी फिल्मों ने पश्चिमी फिल्मों से प्रभावित होकर ऐसे लोगों को
प्रोत्साहित करने में बेहद गैरजिम्मेदाना भूमिका निभाई। विगत तीस वर्षों में भारत
में बनी फिल्मों का विवेचन किया जाए तो आधी से अधिक फिल्में ऐसे ही विषयों पर बनी
जिसने युवाओं की सोच को नकारात्मक दिशा दी। लचर प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था से
उपजे असंतोष के कारण कानून अपने हाथ में लेने वालों की संख्या बहुत बढ़ी है जो
अत्यंत चिंताजनक है।
सन 1940 से 1990 तक पचास वर्षों की अवधि
में अनेक फिल्में स्त्री-पुरुष प्रणय सम्बन्ध को केंद्र में रखकर बनी। तात्कालिक
समाज में स्त्री-पुरुष के विवाहपूर्व प्रेम प्रसंग स्वीकार्य नहीं थे, इस बात को फ़िल्मकारों ने
बखूबी भुनाया और उनकी छुपी इच्छाओं को अभिव्यक्ति दी। फिल्म ऐतिहासिक हो या
धार्मिक, सामाजिक हो या पारिवारिक, जासूसी हो या मारधाड़ वाली, पूरी फिल्म में एक
प्रेमकथा साथ-साथ चलती थी। प्यार के रास्ते पर कांटे बिछाने वालों की दुष्टता का
असर दर्शकों पर इतना अधिक होता था कि वह खुद को पीड़ित महसूस करने लगता था। प्रेम
की आत्मीयता, त्याग और पीड़ा से लबरेज ये
फिल्में दर्शकों के हृदय में बस गई और उन्हें आत्मिक प्रेम की ऊंचाई पर स्थापित
किया। इन फिल्मों में प्रेम से होने वाली अनुभूति का नाचता-गाता चित्रण होता था।
इन फिल्मों में पिरोए गए मधुर गीत आज भी जीवंत हैं और सदियों तक ज़िंदा रहेंगे।
उसके बाद प्यार करने का
अंदाज़ बदला। पुरानी फिल्मों में नायक को प्यार होता था, नायिका उसके प्यार में 'पड़' जाती थी, इस काल की फिल्मों ने 'प्यार हो जाने' की शैली में किंचित
परिवर्तन किया और दोनों पक्ष एक-दूसरे से प्रेम की पहल करने लगे। सन 1990 के बाद की फिल्मों ने
युवाओं के प्यार को नई दिशा दी, अब नायिका प्यार की पहल करती है और नायक
भागा-भागा फिर रहा है। प्यार की पहल कोई भी कर सकता है, इसमें कोई ऐतराज़ नहीं
लेकिन वर्तमान में प्यार की भाषा और परिभाषा दोनों बदल गई है। प्रेमी-प्रेमिका का
प्रेम अब 'यूज एंड थ्रो' वाले खेल में तब्दील हो
गया। आत्मिक संबंधों का स्थान दैहिक सम्बन्ध ले चुके हैं। विवाह-पूर्व दैहिक संबंध
बनाने की वर्जना अब 'यू टर्न' ले रही है. सामाजिक सोच के
इस परिवर्तन का असर हमारी विवाह व्यवस्था को प्रभावित कर रहा है।
फटाफट प्यार का यह सूत्र
उन्हें आधुनिक सिनेमा की रोमांटिक कहानियों से मिला। फिल्म बनाने वाले कहते हैं, 'हम वही बनाते हैं जो लोग
देखना चाहते हैं।' जबकि दर्शक कहते है, 'हम वही देखते हैं जो वे बनाते
हैं।' सच्चाई जो भी हो लेकिन यह
तय है कि सिनेमा की अभिव्यक्ति का प्रभाव बहुत व्यापक और गहरा है।
भारत की हिन्दी फिल्मों में 'कापी-पेस्ट' का हुनर बड़ी सफाई से आजमाया गया है। पिछली सदी की सर्वाधिक सफल फिल्म 'शोले' (1975) इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। इस फिल्म के बहुत से दृश्य अनेक पुरानी हिन्दी और अंग्रेजी फिल्मों की साफ-साफ नकल है। 'शोले' मशहूर जापानी निर्देशक अकीरा कुरोसावा की बेहद चर्चित फिल्म Seven samurai का देशी संस्करण थी साथ ही इसमें इटली के प्रसिद्ध निर्देशक Sergio Leone की 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म Once Upon A Time In The West से भी कई दृश्य चुराए जिसे जावेद अख्तर ने अपने साक्षात्कार में स्वीकार किया है। इस फिल्म की अपार सफलता के पीछे फिल्म के कलाकारों का योगदान तो है ही, साथ ही, सलीम-जावेद की पटकथा-संवाद, द्वारका दिवेचा की उत्कृष्ट फोटोग्राफी, राहुलदेव बर्मन का असरदार पार्श्व संगीत और रमेश सिप्पी के कुशल निर्देशन को भी जाता है। 'शोले' ने भारत के फिल्म निर्माताओं को सफलता के नये सूत्र बताए, परिणामस्वरूप, हिन्दी फिल्में चिथड़ों को जोड़कर सिले गए थैले की भांति बनने लगी और हिंस्रक दृश्यों को दिल खोल कर शामिल कर दिया गया। विगत 44 वर्षों में बनी इस तरह की फिल्मों का प्रभाव अब समाज में स्पष्ट दिखने लगा है, सहिष्णुता का स्थान अपराध ने संभाल लिया है, मानवीय तत्व का तेजी से ह्रास होता दिखाई पड़ रहा है क्योंकि सिनेमा दर्शक के मस्तिष्क को गहराई तक प्रभावित करता है। फिल्म 'शोले' को भारतीय सिनेमा में हिंसा के खुले प्रदर्शन के सूत्रपात का श्रेय दिया जा सकता है। विगत वर्षों में फिल्मों में बहुप्रचारित की गई हिंसा वर्तमान भारतीय समाज में भलीभाँति प्रवेश कर गई है और अब हत्या और डकैती की घटनाएँ हमारे देश में भी उसी तरह होने लगी जैसी अमेरिका में हुआ करती हैं। इन घटनाओं के पीछे हमारी फिल्मों का पर्याप्त योगदान है क्योंकि इन फिल्मों के कथानक में नायक या नायिका के हिंसक व्यवहार को महिमामंडित किया गया। हिंसक कथानक वाली फिल्मों ने दर्शकों के मानस को इस कदर प्रभावित किया है कि नई पीढ़ी में सहनशीलता के गुण कमजोर पड़ते जा रहे हैं और बदला लेने की प्रवृत्ति हावी हो रही है।
सन 1994 को रिलीज़ हुई फिल्म 'हम आपके हैं कौन' ने भारतवर्ष के सभी
अभिजात्य और मध्यमवर्गी परिवारों को सिनेमाघरों तक खींच कर बुला लिया और आम
परिवारों को मिलजुल कर रहने और खुश रहने का संदेश दिया। इस फिल्म ने पारिवारिक
सम्बन्धों की खरोच पर ठंडा मरहम लगाया और मस्ती में जीने का सलीका भी सिखाया। इस
फिल्म की कहानी वैभवशाली परिवारों की थी इसलिए भव्य सेट्स, आकर्षक वेषभूषा और मंहगे
गहनों की मदद से ऐसा मनोहारी तानाबाना बुना गया था कि उस फिल्म को लोग सम्मोहन की
दशा में देखते रह गए। कहानी में पिरोई गई खुशियाँ और दुख फिल्म समाप्त होते ही
वहीं छूट गई किन्तु उसका वैभव दर्शक अपने सीने में सँजो कर अपने साथ ले आया। उस
वैभव का प्रभाव हमारे शादी-ब्याह के कार्यक्रमों में दिखाई पड़ने लगा और शादियों
में होने वाला व्यय अपव्यय में परिवर्तित हो गया। शिक्षित समाज से वैवाहिक आडंबर
से बचने के लिए जिस परिवर्तन की आशा थी उसे इस फिल्म ने सहसा अवरोधित कर दिया और
दिखावे की ऐसी प्रतिस्पर्धा को जन्म दे दिया जिसे अब हर परिवार भुगतने के लिए
मजबूर हो गया है, चाहे वह सम्पन्न हो, मध्यम हो या विपन्न।
फिल्में जनजागरण का सशक्त
माध्यम बन सकती हैं, आज़ादी के आसपास बनी फिल्मों
ने ऐसा कर दिखाया है लेकिन अधिकांश आधुनिक फिल्म निर्माता समाज के प्रति अपनी
ज़िम्मेदारी न समझते हुए नागरिकों के असंतोष को नकारात्मक मोड़ दे रहे हैं। वर्तमान
परिप्रेक्ष्य में विधु विनोद चोपड़ा, राजकुमार हिरानी, आमिर खान, आशुतोष गोवारीकर, प्रकाश झा, अनुराग बसु जैसे कुछ
फ़िल्मकार हैं जो सामाजिक समस्याओं और उनके समाधान को अपनी फिल्मों का विषय बनाते
हैं, शेष निर्माता अपनी फिल्म
की कहानी का चयन के समय केवल 'सौ करोड़ की दौड़' का ध्यान रखते हैं। फ़िल्मकारों की एक
नई पौध दमखम के साथ सार्थक फिल्मों के निर्माण के लिए आती दिखाई पड़ रही है जिनसे
उम्मीद बन रही है कि वे धन के लिए पगलाए मनुष्य को मानवीयता का मार्ग दिखाएंगे और
जन-मन पर सिनेमा से होने वाले प्रभाव का प्रभावशाली उपयोग करेंगे। बेशक सिनेमा
मनोरंजन का साधन है लेकिन यदि इसे आम जन की सोच को सकारात्मक दिशा देने के उपकरण के
रूप में इस्तेमाल किया जाए तो समाज की भावी स्थिति पर इसके दूरगामी परिणाम होंगे। ज़रुरत इस बात की है कि
फिल्मकार इस तलवार की धार को समझें।
==========
क्लासिक फिल्म :
क्लासिक फिल्म : '
=====================
सोलहवीं शताब्दी के महान गायक पंडित बैजनाथ का जन्म मध्यप्रान्त के चंदेरी ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में सन १५४२ की शरद पूर्णिमा की रात को हुआ था. उन्हें बचपन में लोग प्यार से बैजू कहकर पुकारते थे. जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ी, वे शास्त्रीय गायन में निपुण होते गए. युवावस्था में उन्हें कलावती से प्यार हो गया, वे उसके दीवाने हो गए थे, इस कारण लोग उन्हें बैजू बावरा के नाम से जानने लगे थे. कलावती उनकी प्रेयसी होने के साथ-साथ संगीत के क्षेत्र में उनकी मार्गदर्शक भी थी. बैजनाथ ने वृन्दावन के गुरु हरिदास स्वामी से ध्रुपद गायन की विधिवत शिक्षा ली थी. ग्वालियर के जयविलास महल में संरक्षित इतिहास के अनुसार पंडित बैजनाथ राग दीपक गाकर दीप जला सकते थे, राग मेघ-मल्हार गाकर वर्षा करवा सकते थे, राग बहार गाकर फूल उगा सकते थे और राग मालकौंस गाकर पत्थर पिघला सकते थे. शास्त्रीय संगीत के इस प्रकांड पंडित बैजनाथ की ७१ वर्ष की आयु में उनके जन्मस्थान चंदेरी में सन १६१३ की बसंत पंचमी के दिन हो गया.
सन १९५२ में प्रकाश भट्ट, जो कि एक स्टेशन मास्टर थे, ने एक फिल्म का निर्माण किया, 'बैजू बावरा'. इस फिल्म की सफलता ने उन्हें बम्बई के फिल्म उद्योग में फिल्म निर्माता-निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया. उन दिनों ऐतिहासिक विषयों पर बनी फिल्मों को दर्शक पसंद करते थे इसलिए इस विषय को प्रकाश भट्ट ने चुना. बैजू बावरा के ज्ञात इतिहास को एक फ़िल्मी कहानी का परिवर्तित रूप दिया हरीश चन्द्र ठाकुर और आर.एस.चौधरी ने. फिल्म में संगीत के लिए प्रकाश भट्ट ने उस समय के उभरते संगीतकार नौशाद अली को चुना और गीत लिखने के लिए शकील बदायूँनी को. नौशाद और शकील बदायूँनी की जोड़ी ने ऐसे मधुर गीत तैयार किये कि वे जन-जन की जुबान पर चढ़ गए, दर्शक उन गीतों को बार-बार सुनने और देखने को मजबूर हो गए, इस कारण से फिल्म सुपर हिट हो गयी.
फिल्म में कहानी इस प्रकार है, बैजू के बचपन की घटना है, उस समय अकबर का शासनकाल था. उनके नवरत्नों में से एक संगीत सम्राट मियाँ तानसेन थे जो शास्त्रीय गायक थे, उनके गायन में व्यवधान न हो इसलिए उनके महल के आसपास किसी अन्य व्यक्ति को गाने की मनाही थी. एक दिन बैजू के पिता वहां गाने लगे, बालक बैजू ने उन्हें गाने से रोका लेकिन वे नहीं माने. इस बीच सिपाहियों ने उन पर तलवार से हमला कर दिया. मरणासन्न अवस्था में उन्होंने बैजू से इस घटना का बदला लेने का वायदा लिया और वे मर गए. तब से बदले की आग में जलता हुआ बैजू संगीत की शरण में जा पहुंचा और गायक बैजू (भारत भूषण) बन गया. युवावस्था में उसे एक मल्लाह की बेटी गौरी (मीना कुमारी का फ़िल्मी नाम) से प्रेम हो गया. संगीत की दुनिया में दोनों एक-दूसरे के प्रेरक बन गए. गौरी के प्रेम में बैजू अपने पिता को दिया वायदा भूल जाता है तब ही गाँव में डकैती की एक घटना के सन्दर्भ में उसे अपने वायदे की याद आती है. वह तलवार लेकर तानसेन के महल में उनकी हत्या के इरादे से पहुँच जाता है. तानसेन उस समय संगीत की साधना कर रहे थे. तानसेन की आलाप सुनकर बैजू की हाथ से तलवार छूट जाती है. वह तलवार को जमीन से उठाकर तानपूरे पर वार करता और उसे तोड़ देता है. आश्चर्यचकित होकर तानसेन पूछते हैं, 'तुमने तानपूरे पर तलवार चलाई, मुझ पर क्यों नहीं?' बैजू कहता है, 'इस तानपूरे के सुर मुझे ऐसा करना से रोक रहे थे.' तब तानसेन को यह जानकार कि बैजू संगीत का जानकार है. वे उससे कहते हैं, 'मैं किसी तलवार से मरने वाला नहीं, तुम कोई सुरीली तान छेड़ो, तानसेन खुद-ब-खुद मर जाएगा.'
तानसेन की बात सुनकर वह संगीत की शिक्षा लेने के लिए स्वामी हरिदास की शरण में जाता है. स्वामी हरिदास से संगीत की शिक्षा लेकर वह अकबर के दरबार में आकर तानसेन को गायन की चुनौती देता है. दोनों के बीच मुकाबला होता है जो अनिर्णीत हो जाता है, तब अकबर एक तजवीज पेश करते हैं कि जो संगमरमर के पत्थर को पिघला देगा, उसे विजेता घोषित किया जाएगा. बैजू अपने गायन से पत्थर को पिघला देता है और मुकाबला जीत जाता है.
उधर गाँव में गौरी के किसी अन्य व्यक्ति से विवाह होने की खबर बैजू को मिलती है. वह गाँव पहुँचना चाहता था लेकिन नदी में बाढ़ आई हुई थी. मल्लाह उस बाढ़ में नाव से ले जाने के लिए मना कर देता है तो बैजू खुद नाव को लेकर नदी पार करने की कोशिश करता है. यह देखकर गौरी, जिसे तैरना आता है, वह बैजू को बचाने के लिए नदी में कूद जाती है. तब ही बैजू की नाव पलट जाती है. गौरी बैजू को बचाने की कोशिश करती है लेकिन पानी के तेज बहाव में बैजू को बचाना मुश्किल था. बैजू गौरी से वापस लौट जाने के लिए कहता है लेकिन गौरी वापस जाने से इन्कार कर देती है और दोनों प्रेमी जल समाधि ले लेते हैं.
नौशाद और शकील की जुगलबंदी से सजी हुई इस संगीतमय दुखांत प्रेम कहानी को देखने के लिए सिने-दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ी. चूँकि फिल्म की कहानी शास्त्रीय संगीत से जुड़ी हुई थी इसलिए नौशाद ने प्रत्येक गीत को शास्त्रीय रागों में निबद्ध किया था. इस फिल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत, 'तू गंगा की मौज मैं जमना का धारा, हो रहेगा मिलन, हो हमारा तुम्हारा रहेगा मिलन' मोहम्मद रफ़ी के द्वारा राग भैरवी में गाया गया था. इसी प्रकार 'ओ, दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले', राग दरबारी; 'मन तड़पत हरि दर्शन को आज', राग मालकौंस; 'इंसान बनो कर लो भलाई का कोई काम', राग तोड़ी में मोहम्मद रफ़ी की ही आवाज़ में रिकार्ड किए गए थे. रफ़ी और लता का एक बेहद खूबसूरत युगल गीत 'झूले में पवन के आई बाहर, नयनों में नया रंग लायी बहार, प्यार छलके' राग पीलू पर आधारित था. इसी प्रकार लता और शमशाद बेगम की आवाज़ में गाये गीत 'दूर कोई गाये, धुन ये सुनाए, तेरे बिन छलिया रे, बाजे न मुरलिया रे' (राग देस) में नायिका मीनाकुमारी ने प्रेम में पड़ी शर्माती हुई गौरी का अविस्मरणीय अभिनय किया है. लता मंगेशकर की आवाज़ में 'मोहे भूल गए सांवरिया, आवन कह गए अबहु न आये, लीन्ही न मोरी खबरिया' (कलिंगदा के साथ राग भैरव) और 'बचपन की मोहब्बत को दिल से न भुला देना, जब याद मेरी आये मिलने की दुआ करना' (राग मंद), ये दोनों दर्द भरे गीत श्रोताओं के मन को आज भी छू रहे हैं. इनके अतिरिक्त शुद्ध रागों पर आधारित चार गीत उस्ताद आमीर खान और डी.वी.पलुस्कर की आवाज में हैं जो मुगल सम्राट अकबर के महल में या सभागार में चित्रांकित किये गए हैं. कुल मिलाकर उस समय के नवयुवक, नवागंतुक, नवोन्मेषी संगीतकार नौशाद ने फिल्म 'बैजू बावरा' ने अपने हुनर का ऐसा इस्तेमाल किया कि फिल्म की कहानी को अनदेखा करके दर्शक सुर की लहरियों में खो गए.
बैजू के रोल में भारत भूषण और गौरी के रोल में मीनाकुमारी ने कमाल का अभिनय किया. उन पात्रों को सजीव करने के लिए जिस भोलेपन की अभिव्यक्ति आवश्यक थी, वह मुलायमियत दोनों के चेहरे में अनवरत बनी रही. 'तू गंगा की मौज मैं जमना का धारा', नदी के किनारे खड़े होकर गा रहे इस गीत को नाव पर बैठी गौरी के साथ चित्रांकित किया गया है. गीत के अंतिम हिस्से में गौरी किनारे पर खड़े होकर मुग्ध ग्रामवासियों की भीड़ को देखकर गौरी शर्म के मारे दोनों गदेलियों से अपना चेहरा छुपा लेती है, इस दृश्य को मीनाकुमारी ने इतनी शिद्दत से निभाया है कि वह सालों-साल दर्शकों की स्मृतियों में कैद रहेगा. अकबर की भूमिका में बिपिन गुप्ता, तानसेन के रूप में सुरेन्द्र ने ठीक-ठाक अभिनय किया है, वहीं पर हास्य अभिनेता राधाकिशन ने छोटे-छोटे तीन-चार दृश्यों में अपनी जबरदस्त उपस्थिति दर्ज की है.
फिल्म फेयर पुरस्कार (१९५४) सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री मीनाकुमारी और सर्वश्रेष्ठ संगीतकार नौशाद को प्राप्त हुआ था. इस पुरस्कार से बढ़कर पुरस्कार दर्शकों ने दिया इस फिल्म को बहुत बड़ी संख्या में देखकर. निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट की इस फिल्म का छायांकन वी.एन.रेड्डी तथा संवाद लेखन ज़िया सरहदी ने किया था.
कथानक की दृष्टि से लचर लेकिन गीत-संगीत के लिए उत्कृष्ट इस फिल्म को हिंदी फिल्मों के इतिहास में सदा याद रखा जाएगा. मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में ध्वन्यांकित किए गए गीत 'अब तो नीर बहा ले, ओ दुनिया के रखवाले' को गायन की जिस ऊँचाई पर गवाया गया है, वह रफ़ी और नौशाद का अभूतपूर्व कारनामा था, निःसंदेह.
==========
=================
राजकपूर की चार फिल्म मेरी क्लासिक फिल्म की सूची में हैं, 'श्री ४२०', 'जागते रहो', 'जिस देश में गंगा बहती है' और 'मेरा नाम जोकर'. सबसे पहले 'श्री ४२०' पर चर्चा हो जाए.
हिन्दी सिनेमा ने विगत सौ वर्षों में अपने सीमित साधनों के बावज़ूद विश्व सिनेमा में अपनी अलग साख बनाई है, संख्या के साथ-साथ गुणवत्ता में भी। इस अवधि की फ़िल्मों का अवलोकन किया जाए तो अनेक ऐसी फ़िल्में बनी जो मानवीय मूल्यों की गहरी समझ लिए हुए थी। इसी समझ के साथ सन १९५५ में प्रदर्शित फ़िल्म ‘श्री ४२०’में मनुष्य के छ्द्म सपनों का अभूतपूर्व चित्रण था.
फिल्म समीक्षक प्रह्लाद अग्रवाल लिखते हैं, 'उन दिनों भारतवर्ष आजादी की ताज़ी सांस ले रहा था, भारतवासियों की उमंगें लहरा रही थी, आशाओं के दीप जगमगा रहे थे; उसी समय `श्री ४२०' आई जिसने सभ्यता और प्रगति के मुखौटे पहने समाज को पहचानने का प्रयास किया और उसके संभावित खतरों से अवाम को परिचित कराया। उस फिल्म में संकट से जूझती गरीबी, अभावों की कसक, धनवान बनने की चाहत और उसके टेढ़े-मेढ़े रास्तों का मानवीय चित्रण किया गया था। फिल्म के एक दृश्य में दिन-रात भीख मांगकर गुजर-बसर करने वाला भिखारी 'अपने राजू' को विश्वास के कारण संतान्वे रूपए, नौ आने और दो खोटे पैसे दे जाता है, अपनी ज़िन्दगी के सबसे दिलकश सपने- ‘अपने घर’ की खातिर ! वह कहता है- "दो-ढाई रूपए कम हैं, चाहे एक खिड़की कम लगाना पर घर दे देना भाई !"
सभ्यता का मतलब मनुष्य के भीतर कोमलता का विस्तार है, पाशविकता का नहीं। देव और दानव मनुष्य के ह्रदय में एक साथ मौजूद होते हैं और दानवी प्रवृतियों से मुक्त होने की लगातार संघर्ष यात्रा ही सभ्यता के उत्थान की महागाथा है।'
एक भोलाभाला ग्रामीण राज, इलाहाबाद से बम्बई जैसे बड़े शहर में रोजी-रोटी के चक्कर में आता है. बम्बई में उसकी मुलाक़ात एक गरीब लेकिन स्वाभिमानी लड़की विद्या से हो जाती है और दोनों में प्यार हो जाता है. अचानक ताश के खेल में निपुण होने के कारण राज सेठ सोनाचंद धर्मानंद के चंगुल में फंस जाता है और अनैतिक ढंग से धन कमाने के गिरोह का सदस्य बन जाता है. विद्या की लाख कोशिशों के बावजूद राज उस जंजाल से बाहर नहीं निकलता और अधिक धनवान होने की उसकी चाह बढ़ती जाती है.
सेठ सोनाचंद गरीबों को धोखा देकर एक सस्ता घर बनाने की योजना बनाता है, 'केवल १०० रूपए में खुद का मकान'. गरीबों की भीड़ टूट पड़ती है, मकान खरीदने के लिए. योजना के लिए एकत्रित धन को लेकर भाग जाने के सेठ सोनाचंद की कोशिश से राज का ह्रदय परिवर्तन हो जाता है और वह इसका भंडाफोड़ कर देता है और गरीबों का पैसा लुटने से बच जाता है. अंत में, पुलिस सेठ सोनाचंद को गिरफ्तार कर लेती है तब राज सोनाचंद को इंगित करके कहता है, 'ये लोग केवल ४२० नहीं है, श्री ४२० हैं.'
फिल्म `श्री ४२०' में मनुष्य के संकट और स्वप्न का ह्रदयस्पर्शी चित्रण था। फ़िल्मकार राजकपूर ने जैसे दर्शक को खुली छूट दे रखी हो कि फ़िल्म के हर फ़्रेम में दर्शक अपने जीवन को फ़िट करके देखे और उसके चाहे जितने अर्थ निकाले. यह सच है कि मनुष्य के दुख और सुख उसकी व्यक्तिगत अनुभूति होती है लेकिन जब हम उसे अपनों के बीच साझा करके व्यापक अभिव्यक्ति देते हैं तब वे सबके हो जाते हैं. छोटी-छोटी रोचक घटनाओं के माध्यम से समाज की पीड़ा और कसक को व्यक्त करने अद्भुत कारनामा राजकपूर ने इस फिल्म में संभव कर दिखाया.
इस फिल्म के निर्माता, निर्देशक और मुख्य अभिनेता राजकपूर थे. सधे हुए निर्देशक की भूमिका में राजकपूर ने अपनी योग्यता का परिचय तो दिया ही है, एक समर्थ अभिनेता के रूप में भी वे उभर कर सामने आते हैं. फिल्म के पूर्वार्ध में वे सीधे-सादे-हंसोड़ ग्रामीण के रूप में दिखाई पड़ते हैं लेकिन बाद में एक गंभीर युवक की भूमिका में अपनी भूमिका के प्रति पूरा न्याय करते हैं. नर्गिस ने गंभीर युवती की भूमिका निभाई जो फिल्म की कहानी को बखूबी आगे बढ़ाती है. ख्वाज़ा अहमद अब्बास की पटकथा और संवाद से सजी इस फिल्म में नादिरा ने भी शानदार अभिनय किया. ललितापवार, रशीद खान, एम. कुमार, नाना पलसीकर और सेठ सोनाचंद धर्माचंद के रोल में निमो का अभिनय गज़ब का है.
वह शंकर जयकिशन के संगीत का उषाकाल था. उनकी ताजगी भरी धुनों ने हिंदी फिल्म जगत के संगीत को नई दिशा दी जिसमें हिन्दुस्तानी और पश्चिमी संगीत का मनमोहक मिश्रण था. लता, मुकेश, मन्ना डे, आशा भोसले और रफ़ी की मधुर आवाज़ से सजी फिल्म श्री ४२० के गीत-संगीत ने संगीत प्रेमियों को झूमने के लिए मजबूर कर दिया. 'मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंगलिश्तानी, सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी', मुकेश का गाया यह गीत स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय भावना के अनुकूल था इसलिए पूरे देश में बेहद लोकप्रिय हुआ. सोवियत रूस में भी यह गीत पसंद किया गया और वहां गाया भी जाता रहा है. पाश्चात्य धुन पर आधारित गीत 'मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के' में आशा भोंसले और मन्ना डे ने अपनी आवाज़ में वह असर पैदा किया कि सुनने वाले के पैर अनायास थिरकने लगते हैं.
एक ऐसा गीत भी था जो फिल्म के अन्य लोकप्रिय गीतों की वृष्टिछाया में उपेक्षित रह गया, लता मंगेशकर का गाया हुआ, 'ओ जाने वाले मुड़ के ज़रा देखते जाना, दिल तोड़ के तो चल दिये मुझको न भुलाना', इस गीत में किसी के बिछुड़ जाने के बाद सीने में जो सन्नाटा पसरता है, वह प्रभाव अतुलनीय है.
मन्ना डे के गाए गीत 'दिल का हाल सुने दिल वाला, थोड़ी सी बात में मिर्ची मसाला, कह के रहेगा कहने वाला' भारत के संविधान के द्वारा नागरिकों को प्रदत्त अभिव्यक्ति के अधिकार और उसकी दुर्दशा को सरलतम शब्दों में समझा जाता है.
'ईचक दाना, बीचक दाना, दाने ऊपर दाना' हर युग में बच्चों का पसंदीदा गीत रहेगा.
सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ, 'रमैया वस्ता वैया (तेलुगु भाषा का हिंदी अनुवाद 'राम, तुम आओगे'), मैंने दिल तुझको दिया.' इस मधुर गीत को लता, रफ़ी और मुकेश ने गाया, फिल्म श्री ४२० का सबसे 'टची' गीत था. समूह नृत्य का कुशल संयोजन, अचानक गीत में नायक की 'एंट्री' और फिर गीत का मानवीय श्रृंखला के माध्यम से नायिका तक पहुंचना, राजकपूर के सृजनशील निर्देशन का कमाल था.
सदाबहार युगल गीत 'प्यार हुआ, इकरार हुआ है, प्यार से फिर क्यों डरता है दिल', को लता और मन्ना डे ने गया है, जो हिंदी सिनेमा का सर्वश्रेष्ठ 'रोमांटिक पिक्चराइजेशन' है. इस गीत के पीछे की एक घटना ऋषि कपूर बताते हैं :
'इस गाने की शूटिंग के दौरान अपने बड़े भाई रणधीर के साथ मुझे बरसते पानी में रेनकोट पहन कर फुटपाथ से चुपचाप निकलना था. उस वक्त मैं महज़ दो वर्ष का था, मैंने 'शाट' देने से इनकार कर दिया तब नर्गिस मेरे पास आयी और उन्होंने मुझे 'शाट' होने के बाद टाफी देने का वादा किया, मैंने तुरंत 'शाट' दे दिया. इस प्रकार मैं दो साल की उम्र से ही रिश्वत लेकर काम करने का आदी हो गया था.'
इस ब्लेक-एंड-व्हाइट फिल्म की शानदार फोटोग्राफी राधू करमरकर ने की थी.
भारतीय दंड संहिता की धारा ४२० ऐसे अपराध को इंगित करती है जो किसी को धोखा देने से संबधित है. भारत में किसी धोखेबाज भी को सहज ही चार सौ बीस कहा जाता है, जैसे यह संबोधन धोखेबाजी का मानक हो गया हो. इस फिल्म में इलाहबाद से रोजगार की तलाश में आया नायक प्यार करने वालों की बस्ती में आता है और विद्या से मिलता है, 'विद्या' का अर्थ है ज्ञान. अचानक वह ऐसे लोगों के चंगुल में आ जाता है जो अनैतिक कार्यों से धन कमाकर अपनी तिजोरी भरने में दक्ष हैं. यहाँ उसकी मुलाकात माया से होती है, 'माया' का अर्थ है भ्रम. नायक भरपूर पैसे के लालच में उनके समूह में शामिल हो जाता है और अपनी उन ज़रूरतों को हासिल कर लेता है जो कभी उसके लिए सपना थी लेकिन सच्चा प्यार उसके हाथों से फिसल जाता है. एक दिन वह धोखेबाजों की दुनिया को धोखा देकर अपने अपराध का पश्चाताप करता है और प्यार की दुनिया में वापस आ जाता है, इसीलिए फिल्म के नामकरण में उसके नाम के आगे 'श्री' शब्द को जोड़ा गया.
श्री ४२० हिंदी फिल्म जगत की उन फिल्मों में से है जो कभी पुरानी नहीं होती, सदा तर-ओ-ताज़ा. सामाजिक सरोकार, सामाजिक सोच, सामाजिक पाखण्ड और सामाजिक चक्रव्यूह का मर्मान्तक चित्रण है, इस फिल्म में. शुरू से आखिर तक दर्शक को बाँध कर रखने वाली कहानी, उत्कृष्ट अभिनय, मधुर संगीत, अर्थपूर्ण संवाद और चुटीले अंदाज़ में ज़िन्दगी का फलसफा सिखाने वाली फिल्म, श्री ४२०, निःसंदेह सर्वकालिक क्लासिक फिल्म है.
=============
क्लासिक फिल्म : '
=====================
हिंदी फिल्म निर्माण के सन्दर्भ में जिन फिल्मकारों का नाम शिद्दत से याद किया जाता है, उनमें एक हैं, वी.शांताराम, पूरा नाम, शांताराम राजाराम वणकुद्रे (१९०१-१९९०). मराठी और हिंदी फिल्मों की लम्बी कतार में उन्होंने सन १९५७ में एक फिल्म बनाई 'दो ऑंखें बारह हाथ' जो हिंदी फिल्म के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गयी.
पुणे के पास स्थित औंध रियासत में वहां के प्रगतिशील शासक ने एक आयरिश मनोवैज्ञानिक को जेल में निरुद्ध खतरनाक अपराधियों को खुली जेल में रखकर उन पर प्रयोग करने की सुविधा दी थी. वी.शांताराम ने उसी घटना को अपनी फिल्म 'दो ऑंखें बारह हाथ' का आधार बनाकर पटकथा तैयार की और इस फिल्म का निर्माण किया. मुख्य भूमिका में वे स्वयं थे. उनकी पत्नी संध्या, फिल्म की नायिका के रूप में थी.
बीसवीं शताब्दी में यह विचार विकसित होने लगा कि जेल को सजा देने वाली जगह के बदले उसे सुधारगृह बनाया जाए ताकि अपराधी को जेल से छूटने के बाद पुनः अपराधी बनने से रोका जा सके और सजा पूरी होने के बाद वह सम्मान से अपना शेष जीवन व्यतीत कर सके. समाजशास्त्रियों की इस पहल को विश्व भर सरकारों ने समझा और जेलों को सुधारगृह के रूप में परिवर्तित करने की सार्थक कोशिश की है. यह कोशिश अभी भी जारी है लेकिन प्रयोग के स्तर पर है. इस प्रयास की सफलता और असफलता, दोनों किस्से सामने आए हैं. वे मुजरिम जो सुधरना कहते थे, सुधरे और आत्मनिर्भर बने लेकिन नकारात्मक सोच वाले अपराधियों ने जेल को भी अपना अपराधिक कर्मभूमि बनाया और अपनी शक्ति का संवर्धन किया. फिल्म 'दो आँखें बारह हाथ' उस आशावाद की कहानी है जो बुराई में अच्छाई खोजती है और यह मानकर चलती है कि मनुष्य बुरा नहीं होता, उसका कर्म बुरा होता है. हमें अपराधी से नहीं, अपराध से घृणा करनी चाहिए.
फिल्म की शुरुआत एक जेल के दृश्य से होती है. जेल का सुपरिंटेंडेंट जालिम है, कैदियों से अमानवीय व्यवहार करता है. वहां का जेलर आदिनाथ सरल और क्षमाशील व्यक्ति है. जेलर ने उच्चाधिकारियों से छः सजायाफ्ता अपराधियों को जेल से छोड़ने की अनुमति माँगी है ताकि वह उन कैदियों को खुले में रखकर उनका हृदय परिवर्तन करके उन्हें अच्छा नागरिक बनाया जा सके. इस प्रयोग के लिए उन्हें जेल सुपरिंटेंडेंट से अनुमति मिल जाती है और हत्या के आरोप में सज़ा काट रहे छः दुर्दांत अपराधियों को वह अपने साथ ऐसी जगह में ले जाता है जहाँ उनके लिए जेल नहीं, खुला वातावरण मिलता है. जेलर आदिनाथ उन्हें अपने लगातार प्रयासों से व्यवस्थित करता है, उनके कुत्सित विचारों से उन्हें दूर करता है. कई ऐसी घटनाएं होती हैं जब यह प्रयोग असफल होता दिखता है लेकिन उन अपराधियों को जेलर की दो अदृश्य आंखें हर बार गलतियां करने से रोकती हैं. कथानक में कई उतार-चढ़ाव आते हैं, अपराधी चूकते भी हैं, सँभलते भी हैं. अंत उन कैदियों की सांड के आक्रमण से रक्षा करते हुए जेलर आदिनाथ के प्राण चले जाते है. आदिनाथ के त्याग से प्रभावित होकर सभी अपराधियों का अंततः हृदय परिवर्तित हो जाता है और वे सभी आदर्श नागरिक की तरह जीवन व्यतीत करने का संकल्प लेते हैं.
वी.शांताराम का अभिनय शानदार है, साथ में उनका निर्देशन भी. जेल में फिल्माए गए दृश्य अत्यंत प्रभावोत्पादक हैं. आदिनाथ का जेल में प्रवेश करते समय जेल के दरवाजे पर लटके ताले का झूलते रह जाना, प्रतीकात्मक रूप से बहुत कुछ कह जाता है. संध्या को कथानक में 'फिलर' के रूप में इस्तेमाल किया गया है जो गीत और संगीत पक्ष की आवश्यकता को बखूबी पूरा करता है. भरत व्यास के भावपूर्ण गीत और वसंत देसाई का मधुर संगीत इस फिल्म का मज़बूत पक्ष है. 'ऐ मालिक तेरे बन्दे हम' के अतिरिक्त लता मंगेशकर का गाया गीत 'सैंया झूठों का बड़ा सरताज निकला' हिंदी फिल्म के सर्वाधिक कर्णप्रिय गीतों में से एक है. फिल्म का गीत 'ऐ मालिक तेरे बन्दे हम, ऐसे हों हमारे करम, नेकी पर चलें और बदी से लड़ें ताकि हंसते हुए निकले दम' आज भी प्रत्येक संस्कार-केंद्र में उच्च स्वर में गाया जाता है और भलाई के रास्ते पर चलने के लिए आज भी सबको प्रेरित करता है. लता मंगेशकर की गाई लोरी 'मैं गाऊं तू चुप हो जा, मैं जागूं रे तू सो जा' इतनी मधुर है कि सहज ही मन मोह लेती है. इन गीतों के अतिरिक्त 'तक तक धुम धुम' और 'उमड़ घुमड़ कर आई रे घटा' भी कर्णप्रिय हैं और गंभीर कथानक को रसमय करने में मदद करते है.
वी.शांताराम ने फिल्मों के निर्माता के रूप में भारत की सामाजिक समस्याओं और कलात्मक विषयों पर फिल्म बनाई और उसके बॉक्सआफिस पर सफल होने या न होने की कभी परवाह नहीं की. उनकी बनाई फिल्मों की सूची लम्बी है जिस पर गौर करने से यह समझ आता है कि वे आम बम्बइया फिल्मकारों से अलग किस्म के व्यक्ति थे, सदा क्रांतिकारी सोच वाले फिल्मकार. उनकी कुछ चर्चित फ़िल्में हैं, शकुंतला (१९४३), डाक्टर कोटनीस की अमर कहानी' (१९४६), 'दहेज़' (१९५०), 'अमर भूपाली'(१९५१), 'तीन बत्ती चार रास्ता' (१९५३), 'सुबह का तारा' (१९५४), 'झनक झनक पायल बाजे' (१९५५), 'तूफ़ान और दिया', (१९५६), 'दो आँखें बारह हाथ' (१९५७), 'नवरंग (१९५९), 'स्त्री' (१९६१), 'सेहरा (१९६३), 'गीत गाया पत्थरों ने'(१९६४), 'लड़की सह्याद्री की'(१९६६), 'बूंद जो बन गयी मोती'(१९६७), 'जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली' (१९७१), 'पिंजरा' (१९७३) आदि. इन फिल्मों के विषय या तो समाज से जुड़े थे या सामाजिक घटनाओं से या उनके कला-प्रेम से. उनकी कलादृष्टि इतनी व्यापक थी कि 'दो आँखें बारह हाथ' के अंतिम दृश्य में सांड से मुठभेड़ की शूटिंग के समय हुई दुर्घटना में उनकी आँखों की रौशनी चली गयी थी, फिर भी, उन्होंने 'नवरंग जैसी रंग भरी फिल्म बनाई. फिल्म 'नवरंग' के शुरू होने के पहले वे परदे पर आकर दर्शकों से कहते हैं कि फिल्म की शूटिंग के समय उन्हें कुछ दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन उनकी बंद आँखों में जो नए रंग उभरे, वह है, फिल्म 'नवरंग'.
फिल्म की शानदार फोटोग्राफी जी.बालकृष्ण ने की है. पूरी फिल्म में केवल तीन लोकेशन हैं, जेल, खुली जेल और सब्जी बाजार. इन तीनों स्थलों को कैमरे की गहरी नज़र से देखकर हम तक फिल्म के सन्देश पहुँचाने की भरपूर कोशिश की है. फिल्म में वसंत देसाई का पार्श्वसंगीत असरदार नहीं है लेकिन सभी गानों के संगीत में मधुरता है.
वी.शांताराम की तीन पत्नियां थी, विमला, जयश्री और संध्या. तीनों एक घर में एक साथ रहती थी. फिल्म 'दो ऑंखें बारह हाथ' के निर्माण के समय वी शांताराम आर्थिक संकट से जूझ रहे थे इसलिए उन्होंने तीनों पत्नियों से उनके आभूषण मांगे ताकि उन्हें गिरवी रखकर बाजार से धन क़र्ज़ में ले सकें. विमला और संध्या ने चुपचाप अपने गहने शांताराम को दे दिए किन्तु जयश्री ने नहीं दिए. यही घटना शांताराम और जयश्री के मध्य तनाव का कारण बनी और उनका तलाक हो गया. फिल्म 'दो ऑंखें बारह हाथ' उनके दाम्पत्य जीवन के विघटन का कारण बनी. संध्या ने विमला और जयश्री के सभी बच्चों को अपने बच्चे की तरह पाला और सगी मां जैसा प्यार दिया. जानने योग्य बात यह है कि संध्या के बच्चे नहीं हो सके क्योंकि जयश्री से हुई अंतिम संतान के बाद शांताराम ने अपनी संतान-निरोधी शल्यक्रिया करवा ली थी.
'दो आँखें बारह हाथ' के प्रीमियर-शो में सिने जगत की नामी हस्तियाँ उपस्थित थी. शो समाप्त होने के बाद प्रेक्षागृह में सन्नाटा खिंच गया. फिल्म 'बैजू बावरा' के निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट को छोड़कर हर कोई शांताराम से मिले बिना चुपचाप निकल गया क्योंकि हर किसी को फिल्म की सफलता पर संदेह था. विजय भट्ट शांताराम से मिले, हाथ मिलाया और कहा, 'आपकी यह फिल्म भारतीय सिनेमा के लिए प्रकाश स्तम्भ है.'
फिल्म पूरे देश में प्रदर्शित हुई. शुरूआत निराशाजनक रही लेकिन धीरे-धीरे दर्शक जुटने लगे और भीड़ बढ़ने लगी. बम्बई के ऑपेरा हाउस में यह फिल्म ६५ सप्ताह चली. इस फिल्म के तमिल और तेलुगु संस्करण भी बने जिन्हें दर्शकों ने बहुत पसंद किया. 'दो आँखें बारह हाथ' नेशनल फिल्म अवार्ड (१९५७) की दो अलग-अलग श्रेणियों में सर्वोत्कृष्ट फिल्म घोषित हुई और बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में 'सिल्वर बीयर एक्स्ट्रा-ऑर्डिनरी प्राइज़ ऑफ द ज्यूरी' पुरस्कार हासिल किया.
'दो ऑंखें बारह हाथ' हिंदी फिल्म के इतिहास में सार्थक सिनेमा का एक ऐसा उदाहरण है जो कथानक और उसके निर्वहन की दृष्टि से सदैव याद किया जाएगा. इस फिल्म का हर पहलू नायाब था, असरदार था जिसकी चर्चा आज भी होती है, इसीलिए यह हिन्दी सिनेमा की क्लासिक कृति मानी जाती है.
==========
क्लासिक फिल्म : 'मदर इण्डिया' :
-------------------------------------
हिन्दी सिने-जगत ने विगत सौ वर्षों में अनेक फिल्म दी लेकिन अविस्मरणीय रचना तो संयोग से बनती है। ऐसी ही एक कृति थी- 'मदर इंडिया।' महबूब खान ने सन 1940 में एक फिल्म बनाई थी, 'औरत' जो उस समय विशेष सफल नहीं हुई। काफी समय बाद उनके दिमाग में फिल्म 'औरत' का 'रीमेक' बनाने का विचार आया। संगी-साथियों ने बहुत समझाया, मना किया लेकिन महबूब खान पर तो जैसे धुन सवार हो गई थी।
महबूब खान को इस फ़िल्म के शीर्षक का ख्याल सन 1952 में आया। महबूब खान ने बताया- 'हमारी फ़िल्म 'मदर इंडिया' और मायो की 'Mother India' को लेकर काफ़ी असमंजस की स्थिति पैदा हो गई थी। दोनों ही वस्तुएँ बेहद अलग और एक दूसरे के विपरीत हैं। हमने जानबूझ कर फ़िल्म को 'मदर इण्डिया' नाम दिया ताकि हम पुस्तक को चुनौती दे सकें और लोगों के दिमाग में से मायो की बकवास को बाहर निकल सकें।'
फ़िल्म की कहानी इस तरह लिखी गई जिससे भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति, पुरुषों के बढ़ते प्रभाव का विरोध और स्त्री के अपने स्वाभिमान पर दृढ़ निश्चय को दर्शाया गया। महबूब खान को इस कहानी की प्रेरणा अमरीकी लेखक पर्ल एस. बक की The Good Earth (1931) व The Mother (1934) पुस्तकों से मिली जिन्हें सिडनी फ्रेंकलिन ने 1937 और 1940 में फ़िल्म का रूप दिया था।
महबूब खान ने 'लीड रोल' के लिए नर्गिस को चुना, उस नर्गिस को जो तत्कालीन जनमानस में अपनी रोमांटिक भूमिकाओं के लिए लोकप्रिय थी। नायिका राधा के बड़े पुत्र के रूप में राजेंद्र कुमार और छोटे पुत्र के लिए सुनील दत्त को लिया गया। यद्यपि महबूब खान की पसंद दिलीप कुमार थे लेकिन वे नर्गिस के पति के रूप में अभिनय के लिए राजी थे, बेटे के रोल लिए सहमत नहीं हुए तब सुनील दत्त को वह अवसर मिला। नायिका के पति की भूमिका में राजकुमार को लिया गया. गाँव के सूदखोर महाजन सुक्खीलाला के पात्र के लिए उनकी इसी विषय पर पूर्व में बनी फिल्म 'औरत' के अभिनेता कन्हैया लाल को 'रिपीट' किया गया।
गीत शकील बदायूनी ने लिखे और संगीत दिया नौशाद ने। महबूब खान, नौशाद और शकील का पिछली आठ फिल्मों का साथ था इसलिए उनमें आपसी समझ अच्छी थी जिसका परिणाम हुआ, 'मदर इंडिया' का अनुपम गीत-संगीत. फिल्म में 12 गीत पिरोये गए थे, सब एक से बढ़कर एक. शकील बदायूनी द्वारा लिखे गए सभी गीत ग्रामीण परिवेश का साक्षात दिग्दर्शन कराते हैं. नौशाद अली ने भारतीय रागों पर आधारित इनका ऐसा संगीत रचा है कि सभी गीत जन-जन की जुबां पर चढ़ गए थे. आज भी इस फिल्म के गीतों को पुरानी फिल्मों के गानों के शौक़ीन दिल लगा कर सुनते हैं. 'चुन्दरिया कटती जाए रे...', नगरे नगरी द्वारे द्वारे...', दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा...', ओ, गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हांक रे...', 'मतवाला जिया डोले पिया...', 'दुःख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख आयो रे...', 'होली आई रे कन्हाई, रंग छलके सुना दे ज़रा बांसुरी...', 'पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली...', 'घूँघट नहीं खोलूँगी सैयां तोरे आगे...', 'ओ, मेरे लाल आ जा...', ओ, जाने वाले जाओ न घर अपना छोड़ के...', और 'न मैं भगवान हूँ, न मैं शैतान हूँ, दुनिया जो चाहे समझे, मैं तो इंसान हूँ..., जैसे अर्थपूर्ण गीतों को नौशाद ने मनोहारी संगीत से पिरोया है. नौशाद ने फिल्म के पार्श्वसंगीत के लिए वेस्टर्न क्लासिक और हालीवुड स्टाइल म्यूजिक का भरपूर उपयोग किया ताकि कथा के वातावरण को प्रभावी ढंग से उभारा जा सके।
फिल्म
की अधिकांश शूटिंग गुजरात और महाराष्ट्र के गाँवों में हुई, मुंबई के महबूब स्टूडियो में
भी हुई. फिल्म की शूटिंग शुरू होने के पहले सन 1955 में उत्तरप्रदेश में भीषण बाढ़ आई. फोटोग्राफर
फर्दून ईरानी ने वहां जाकर शाट ले लिए जिसका उपयोग फिल्म की बाढ़ के दृश्य में किया
गया. बाढ़ की विभीषिका से त्रस्त ग्रामवासियों के पलायन के दृश्य के लिए गुजरात के
उमरा गाँव में की गयी. इसके लिए वहां के कृषकों ने अपनी 500 एकड़ जमीन, 300 बैल गाड़ियाँ और हल इत्यादि
निःशुल्क दिये. समूह नृत्य में भी स्थानीय नर्तकों ने अपनी भागीदारी दी, प्रोफेशनल डांसर को नहीं
बुलाना पड़ा.
इसी
उमरा गाँव में 1 मार्च 1957 को आग लगने के एक दृश्य का
फिल्मांकन करते समय नर्गिस आग की लपटों में घिर गयी थी और सुनील दत्त ने उन्हें
बचाया था. दोनों बहुत जख्मी हुए थे, उन्हें मुंबई वापस भेजा गया जहाँ सुनील दत्त और
नर्गिस के मध्य प्यार पनपा और दोनों विवाह के लिए उद्यत हो गए लेकिन महबूब खान ने
उन्हें समझा-बुझा कर रोका क्योंकि उनके विवाह का फिल्म पर दुष्प्रभाव पड़ सकता था.
दोनों ने प्रतीक्षा की और 11 मार्च 1958 को विवाह किया. उनका विवाह
उन दिनों की बहुचर्चित घटना थी क्योंकि नर्गिस बेहद प्रसिद्ध थी और सुनील दत्त कम.
इसे 25 अक्तूबर 1957 को रिलीज़ किया गया लेकिन दो
दिन पूर्व इसका विशेष प्रदर्शन राष्ट्रपति भवन में हुआ जहाँ तात्कालीन राष्ट्रपति
डा.राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने इसे देखा और मुक्तकंठ से
प्रशंसा की. इसे विश्व की अनेक भाषाओं में डब करके प्रदर्शित किया गया. 'विश्व की वे100 फिल्म, जिन्हें मरने से पहले अवश्य
देखना चाहिए' की सूची में 'मदर इण्डिया' का भी नाम है. पटकथा-संवाद लेखक जावेद
अख्तर की मान्यता है- 'सभी हिंदी फिल्म 'मदर इण्डिया' से निकल कर आती है.'
फ़िल्म
‘मदर इन्डिया’ में भारतीय ग्रामीण जीवन के
वैविध्य भरे कथानक को पिरोया गया था। उसमें सपने भी थे और जिजीविषा का संघर्ष भी।
लहलहाती फ़स्लों का संतोष था और बाढ़ से उजड़ गए सपने भी। स्त्री की लज्जा एवं सम्मान
का संकट था और भूखे बच्चे का पेट भरने की विवशता भी। मेहबूब खान ने इन्सानी ज़ज़्बात
और उसकी मजबूरियों को इस तरह उकेरा था कि फ़िल्म देखने वाले का दिल दहल जाए। स्वप्न
और संकट का अनवरत संघर्ष मनुष्य के जीवन की वह विशेषता है जो सपनों को सच करने
चाहत और उसे संकट से लड़ने की ताकत देते रहती है। यदि निराश करती है तो फ़िर से नए
सपने दिखाकर पुनः आशा का संचार करती है और इसी तरह जीवनचक्र चलते रहता है। फ़िल्म
ने दो विकल्प दिए- एक, नायक का घर-परिवार से पलायन
कर जाना और दूसरा, नायिका का अत्यन्त विपरीत
परिस्थितियों से संघर्ष करना. फिल्म में नायक को नहीं, नायिका को आदर्श के रूप में
स्थापित किया गया जिसने बिगड़े हालात से जम कर लोहा लिया. नर्गिस ने अनेक फिल्में की
थी, उनके अभिनय का असर हर
सिने-प्रेमी पर था लेकिन 'मदर इंडिया' में वे नर्गिस न रही, राधा बन गई। कलाकार विलुप्त
हो गया और कला उजागर हो गई।
इस फिल्म में कन्हैया लाल ने निर्मम महाजन की ऐसी प्रभावशाली भूमिका निभाई कि उस पात्र का प्रभाव दर्शक के दिमाग से उतरना मुश्किल है. चाहे फसल की गलत तौल कराने का दृश्य हो, या झूठा हिसाब-किताब तैयार करने का, या बाढ़ की विभीषिका का सामना करती हुई नायिका का अपने बच्चे की भूख से लाचार होने पर उसे मदद का प्रस्ताव करने का या उसके बाद उससे मदद माँगने पहुंची नायिका से मुलाक़ात का, उनके संवाद बोलने और अभिनय की अद्भुत अदायगी सुनने-देखने को मिली.
फोटोग्राफर फर्दून ईरानी का काम लाजवाब है. वे दृश्य जो लांगशॉट में लिए गए हैं, वे गाँव के समूचे दृश्य को सजीव बनाकर प्रस्तुत करते हैं. 'ओ जाने वाले जाओ न घर अपना छोड़ के, माता बुला रही है तुम्हें हाथ जोड़ के...' गीत को पूरा का पूरा लांगशॉट में फिल्माया गया है. बाढ़ से उजड़ा गाँव, बर्बाद हो गयी फसल, ग्रामीणों का बैल गाड़ियों में बैठकर गाँव से पलायन का चित्रण और नायिका का गाँव वालों से गाँव छोड़कर न जाने की अपील और गाँव वालों की वापसी को जिस अनोखे ढंग से शूट किया गया है उसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है.
खेतों में लहलहाती फसल का दृश्य हो, या शिव की मूर्ति के समक्ष किया गया होली
नृत्य हो, रंगों की छटा उभर कर सामने
आती है. 'गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हांक
रे...' गीत के साथ बैलगाड़ी दौड़ का
फिल्मांकन उस समय के हिसाब से फोटोग्राफर के लिए बेहद कठिन और चुनौती पूर्ण रहा
होगा. नायिका नर्गिस और नायक राजकुमार के विवाह के पश्चात् चित्रित विदाई गीत 'पी के घर आज प्यारी
दुल्हनिया चली...' तथा उन दोनों की सुहाग रात
के क्लोज-अप शॉट बहुत आकर्षक हैं. सम्पूर्ण फिल्म फोटोग्राफर फर्दून ईरानी के
केमरामेनशिप का कमाल है जो दर्शकों के दिमाग में आज भी छाया हुआ है.
अंत में, महबूब खान के निर्देशन पर बात होनी चाहिए. ९ सितम्बर १९०७ को जन्मे महबूब खान बम्बई के एकघोड़ा बेचने वाले सेठ के यहाँ उनके घोड़े के खुर में नाल ठोंकने का काम करते थे. संयोग से एक फिल्म निर्माता से उनकी मुलाकात हो गयी, फिल्मों में उनकी रूचि को देखते हुए वे उन्हें अपनी फिल्म में सहायक निर्देशक की ज़िम्मेदारी दे दी. यहाँ से महबूब खान का फ़िल्मी कैरियर शुरू हुआ. शुरूआती फिल्मों में उन्होंने फिल्मों के राइटर-स्क्रिप्ट राइटर और कुछ फिल्मों में अभिनय किया और फिर निर्देशन के क्षेत्र में उतर गए. वे २४ फिल्मों के निर्देशक हुए और ७ फिल्मों के निर्माता बने. फिल्म 'अनमोल घड़ी' (१९४६), 'अंदाज़' (१९४९), 'आन' (१९५१), 'अमर' (१९५४) और 'मदर इंडिया' (१९५७) के माध्यम से हिंदी सिनेमा के दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करने में वे बेहद सफल रहे. इनमें से फिल्म 'आन' को उन्होंने हालीवुड की फिल्मों की निर्माण शैली में बनाया जिसे देखने के लिए तात्कालीन सिनेमा घरों में दर्शकों की भीड़ टूट पड़ी थी. ग्रामीण परिवेश पर बनी फिल्म 'मदर इंडिया' को उसी तरह के बड़े केनवास में बनाकर वे अमर हो गए. फिल्म निर्देशन के अपने जीवन भर के अनुभव को महबूब खान ने इस फिल्म में झोंक दिया. पटकथा और स्क्रीन प्ले, कलाकारों का अभिनय, गीत-संगीत का समायोजन, फोटोग्राफी, स्थल चयन, सेट निर्माण और एडिटिंग का उत्कृष्ट निर्देशन पूरी फिल्म में स्पष्ट दिखाई पड़ता है. सर्वश्रेष्ठ फिल्म 'मदर इंडिया' के साथ-साथ सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का उस वर्ष का फिल्मफेयर एवार्ड महबूब खान को मिलना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है.
मेरी दृष्टि में 'मदर इण्डिया' भारत में बनी ऐसी फिल्म है जो 'मुग़ल-ए-आज़म' के समकक्ष है, उससे भी बेहतर.
============
क्लासिक फिल्म : '
=====================
हिन्दुस्तान में बनी फिल्मों का सुनहरा शाहकार है 'मुग़ल-ए आज़म' जिसे निर्माता के.आसिफ ने 5 अगस्त 1960 को बम्बई के मराठा मंदिर और देश के अनेक सिनेमागृहों में प्रदर्शित किया था. सैय्यद इम्तियाज़ अली ताज की लिखी प्रेमकथा पर आधारित इस फिल्म को सन १९४६ में पहली बार जब के.आसिफ ने बनाना शुरू किया था तो इसके कलाकार थे, चन्द्रमोहन (अकबर की भूमिका में), सप्रू (सलीम की भूमिका में) और नर्गिस (अनारकली की भूमिका में). उस बीच फिल्म के नायक चन्द्रमोहन की मृत्यु हो गयी और भारत विभाजन में निर्माता शिराज़ अली पाकिस्तान चले गए, फिल्म बंद हो गयी. इस बीच के.आसिफ ने फिल्म 'हलचल' बना ली जो १९५१ में प्रदर्शित हुई.
सन 1950 में 'मुग़ल-ए आज़म' फिर से शुरू हुई. अकबर के रोल के लिए पृथ्वीराज कपूर को लिया गया जिन्होंने फिल्म की शूटिंग के पहले अकबर का मेक-अप करवाने के बाद दहाड़ कर कहा था, 'पृथ्वीराज कपूर जा रहा है, अकबर अब आ रहा है.' और, सच में जीता-जागता अकबर अवतरित हो गया. अकबर महान ने यदि यह फिल्म देखी होती तो निश्चयतः पृथ्वीराज कपूर के 'मैनरिज्म' अपना लेता. अनारकली की भूमिका के लिए सुरैया को लिया जाना था लेकिन संभवतः दिलीपकुमार की सिफारिश पर मधुबाला को लिया गया. दिलीपकुमार किसी ऐतिहासिक फिल्म के किरदार को नहीं करना चाहते थे लेकिन मधुबाला की नजदीकी की चाहत में 'हाँ' कर बैठे लेकिन नजदीकी अचानक एक अदालती मुकदमे में उन दोनों के बीच दूरी की वज़ह बन गयी, जिसकी वज़ह से इस फिल्म के दौरान ही दिलीप कुमार और मधुबाला के बीच बोलचाल बंद थी लेकिन फिल्म के दृश्यों को देखकर दर्शक यह अनुमान नहीं लगा सकते कि 'एक-दूसरे का मुंह न देखने' की कसम खाकर भी दोनों कलाकारों ने कितनी शिद्दत से अपनी-अपनी भूमिका निभाई.
सहायक कलाकारों में जिन दो ने सर्वाधिक प्रभावित किया, वे हैं, दुर्गा खोटे और अजित. दुर्गा खोटे ने अकबर की पत्नी महारानी जोधाबाई का रोल निभाया है जिसका अभिनय सच में लाजवाब है. शहजादा सलीम के युद्धभूमि से राजमहल लौटने पर जिस ख़ुशी को उन्होंने जिया है, वह देखने लायक है. अकबर और सलीम के बीच होने वाली जंग के पूर्व सलीम और जोधाबाई तथा अकबर और जोधाबाई के बीच के संवाद की अदायगी तथा आंसुओं और हिम्मत के मिले-जुले भाव को उन्होंने बखूबी निभाया. अजित ने सलीम के राजपूत दोस्त दुर्जन सिंह की भूमिका में अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ अभिनय किया है. निगार सुल्ताना ने बहार और संगतराश की भूमिका में कुमार ने अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दिया है.
अमानुल्लाह खान, वजाहत मिर्ज़ा, कमाल अमरोही और अहसान रिज्वी को पटकथा और संवाद लिखने की ज़िम्मेदारी दी गयी. इस टीम ने फारसी-उर्दू में ऐसे संवाद लिखे जो मुगलिया आन-बान-शान के बहुत नज़दीक लगते हैं और गज़ब का असर पैदा करते हैं. शहंशाह अकबर का दरबार लगा हुआ है, एक दरबान की गंभीर आवाज़ गूंजती है, 'हुश्यार बाश, सजदे में निगाह रहे, तमाम होश-ओ-खिरक पेशे बादशाह रहे, जिल्ले इलाही, जहाँपनाह, शहंशाह, जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर जल्वा अफरोज होते हैं...' तो पुराने बादशाहों का जमाना आँखों और कानों से होकर गुजर जाता है. अकबर और सलीम, अकबर और जोधाबाई, अकबर और अनारकली, सलीम और जोधाबाई, सलीम और दुर्जन सिंह तथा बहार और संगतराश के संवाद जिस तरह से लिखे गए, जिस तरह से बोले गए, जिस तरह से निभाए गए, वे आज भी दर्शकों के कानों में गूंजते हैं.
संगीत तैयार करने के लिए के.आसिफ ने नौशाद के पास गए, नोटों से भरा एक बैग उन्हें दिया और कहा, 'मुग़ल-ए-आज़म' के लिए यादगार संगीत तैयार करो.' नौशाद ने नाराज़ होकर उस बैग को खिड़की के बाहर फेंक दिया और कहा, 'पैसे की ताकत से संगीत नहीं बनता.' नौशाद की पत्नी इस घटना को देखती रह गयी. उन्होंने उन दोनों के बीच समझौता करवाया. के.आसिफ को अपनी गलती का अहसास हुआ, नौशाद से माफ़ी मांगी, तब 'मुग़ल-ए-आज़म' के गीतों का कालजयी संगीत बना और अत्यंत प्रभावोत्पादक पार्श्वसंगीत.
फिल्म में कुल मिलाकर 12 गीत थे जिनके फिल्मांकन में फिल्म का एक तिहाई भाग खप गया, शेष दो तिहाई में कथानक था. फिल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत 'प्यार किया तो डरना क्या, प्यार किया कोई चोरी नहीं की, छुप-छुप आहें भरना क्या...' को तैयार करने की भी एक कहानी है. शकील बदायूँनी ने इस सिचुएशन पर दो गीत लिखे लेकिन वे सिचुएशन के अनुरूप फिट नहीं बैठ रहे थे. एक दिन आसिफ, शकील और नौशाद छत पर दिन भर बैठे रहे, बहस करते रहे, अपनी राय देते और बदलते रहे तब ही नौशाद को पूर्वी उत्तरप्रदेश का एक लोकगीत याद आया, 'प्रेम किया, का चोरी करी है?', इसे शकील ने ग़ज़ल के रूप में परिवर्तित किया तब गीत बना और उसकी धुन तैयार हुई. उसी प्रकार 'मोहे पनघट में नन्दलाल छेड़ गयो रे' गीत की क्रेडिट यद्यपि शकील बदायूंनी को दी गयी है जबकि यह उत्तरप्रदेश में शास्त्रीय गायकों के बीच पहले से ही प्रचलित था, इसके असली रचयिता को लेकर आज भी भ्रान्ति है. इस गीत के फिल्म में होने पर भी फिल्मकार प्रकाश भट्ट ने आपत्ति की थी, 'मुगलकाल में हिन्दुओं के त्यौहार कृष्णजन्माष्टमी का आयोजन उचित नहीं लगेगा, फिल्म बर्बाद हो जाएगी.' तब इस गीत के लिए कहानी में एक पृष्ठभूमि तैयार की गई, संवाद लिखे गए, इस गीत को पिरोया गया और इसका फिल्मांकन किया गया.
कई बार ऐसा लगा कि यह फिल्म नहीं बन पाएगी, अनेक अवरोध आते गए तब पटकथा लेखक कमाल अमरोही ने इस कहानी पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया. के आसिफ ने उन्हें समझाकर रोका लेकिन फिल्मिस्तान के नन्दलाल जसवंतलाल ने 'मुग़ल-ए-आज़म' के सेट पर अपने जासूसों को भेजकर जो जानकारियाँ हासिल की उसके आधार पर सन 1953 में फिल्म 'अनारकली' दर्शकों के सामने प्रस्तुत कर दी जो बेहद सफल हुई और 'मुग़ल-ए-आज़म' की संभावित सफलता और उसके निर्माण पर प्रश्नचिन्ह लग गया. 'अनारकली' में बीना रॉय के मादक अभिनय ने मधुबाला के समक्ष कड़ी चुनौती प्रस्तुत का दी थी. साथ ही सी.रामचंद्र के संगीत तथा राजिंदर किशन के मधुर गीतों ने वह समां बांधा कि के.आसिफ भी घबरा गये. परन्तु के.आसिफ ने हिम्मत नहीं हारी और वे 'मुगले-ए-आज़म' को एक शानदार शाहकार बनाने में जुटे रहे और तमाम मुसीबतों और परेशानियों के बावजूद इसे पूरा किया. कुल बारह में से दस गीतों के साथ और बहुत काट-छांट के बाद कुल 197 मिनट की इस आंशिक रंगीन-ब्लेक एंड व्हाईट फिल्म को परदे पर उतारा गया. फिल्म की टिकट विशेष रूप से पोस्टल-लिफाफे की साइज और चिकने कागज़ में बनाकर पूरे भारत के सभी सिनेमा गृहों में भेजी गयी थी. फिल्म के प्रमोशन के लिए शानदार पोस्टर तैयार किये गए थे. फिल्म 'हिट' हो गयी.
'मुग़ल-ए-आज़म' अपने प्रदर्शन के पहले ही बहुचर्चित हो गयी थी, खास तौर से शीशमहल के निर्माण और उसकी शूटिंग के चर्चे हर सिनेमाप्रेमी की जुबान में थे. लिहाज़ा, टिकट खरीद कर पहले देखने के लिए लम्बी लाइन लग गयी, सबकी उत्सुकता चरम पर थी. फिल्म प्रभावशाली थी लेकिन दर्शकों को दो बातें पसंद नहीं आयी, एक, संवादों की कठिन भाषा और दो, कहानी का दुखद अंत. फिर भी हर सिनेमाप्रेमी ने उसे देखा और फिल्म की भव्यता पर मोहित हुआ. दर्शक कम होने लगे तब के.आसिफ़ ने फिल्म में दो गीत और जोड़े, 'ऐ इश्क ये सब दुनिया वाले, बेकार की बातें करते हैं, पायल के ग़मों का इल्म नहीं, झंकार की बातें करते हैं.' और 'हमें काश तुमसे मोहब्बत न होती, कहानी हमारी हकीकत न होती.' इन गीतों को देखने-सुनने के लिए बहुत से दर्शकों ने फिल्म को दोबारा देखा.
फिल्म चली, बहुत चली, ये कोई खास बात नहीं है; खास बात यह है कि 'मुग़ल-ए-आज़म' में कौन सी विशेषता थी कि वह सर्वकालिक और सर्वप्रिय फिल्म बनी और प्रदर्शन के अर्ध-शतक बीत जाने के बाद भी क्लासिक फिल्मों में सिरमौर है? इस फ़िल्म में दो पीढ़ियों के संघर्ष को आधार बनाकर बाजुओं की ताकत और मोहब्बत की ताकत के फ़र्क का बखूबी चित्रण किया गया. यह फिल्म पृथ्वीराज कपूर के प्रभावोत्पादक अभिनय और संवाद-प्रेषण, मधुबाला की कमनीयता, नौशाद-शकील की युति का कर्णप्रिय गीत-संगीत, भव्य सेट, युद्ध का सजीव चित्रण, असरदार संवाद और आर.डी.माथुर की उत्कृष्ट फोटोग्राफी का अद्भुत सम्मिश्रण थी.
सलीम-अनारकली की काल्पनिक कहानी को के.आसिफ़ ने बड़ी खूबसूरती और तन्मयता से बनाया था. मेरी दृष्टि में, हिन्दुस्तान में बनी सर्वकालिक उत्कृष्ट फिल्म है, 'मुग़ल-ए-आज़म'.
क्लासिक फिल्म : '
=========================
जब कोई कलाकार अपनी अभिनय प्रतिभा से दर्शक के
दिल में स्थायी जगह बना ले तो वह यादगार कहानी बन जाती है. दर्शकों ने दिलीपकुमार और
वैजयंतीमाला को बी.आर.चोपड़ा की फिल्म 'नया दौर' में देखा था लेकिन यह जोड़ी फिल्म 'गंगा जमना' में गज़ब कर गयी. भोले-भाले
ग्रामीण गंगा की भूमिका में दिलीपकुमार और उसकी प्रेमिका धन्नो धोबन के रूप में
वैजयंतीमाला को भुला पाना असंभव है. गाँव में होने वाली हंसी-ठिठोली से लेकर प्रेम
के उच्चतम शिखर तक ले जाने वाली इस रोमांचक कथा को स्वयं दिलीपकुमार ने रचा था.
गरीब
और अमीरी का जीवन, गरीबी का निबाह और अमीरी का
आतंक, कर्तव्य और अपराध के द्वंद्व
को फिल्म 'गंगा जमना' में ईस्टमेनकलर में फिल्माया
गया था. इसके फिल्मांकन के लिए गाढ़े रंगों को चुना गया जिसने अत्याचार और उसके
विरुद्ध संघर्ष को अधिक असरदार बना दिया.
एक
समय था जब मध्यप्रदेश के चम्बल का इलाका डाकुओं के आतंक से त्रस्त था. इनमें डाकू
मानसिंह, तहसीलदार सिंह, सूबेदार सिंह, लुक्का, पन्ना बाई, तुलसी बाई, पानसिंह तोमर, पंचम सिंह, मोहर-माधो, माखन-चिड्डा, बाबा-मुस्तकिल, फूलन-विक्रम, श्रीराम-लालाराम, ददुआ आदि डाकुओं ने
मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश को डकैती के आगोश में समेट लिया था. उनको समाप्त करने
की पुलिस की कोशिशें निष्फल हो जाती थी क्योंकि वहां के स्थानीय नागरिक डाकुओं का
साथ देते थे. यदि कोई गिरफ्तार हो जाता तो उसे जेल में बंद करके रखना भी मुश्किल
था. आचार्य बिनोबा भावे की पहल पर 19 मई, 1960 को डाकू-गिरोहों के 11 मुखियाओं ने लुक्का के
नेतृत्व में विनोबा के चरणों में अपने हथियार रख दिए. इन डाकुओं ने आत्मसमर्पण
किया और सामान्य नागरिकों की तरह जीवनयापन का वादा किया. लुक्का ने अश्रुपूरित
आंखों से कहा था- ‘अब तक हमने बहुत से बुरे काम
किए हैं. उन पर हमें दुःख हो रहा है.’ उनके लिए देश में पहली बार खुली जेल बनायी गयी, उन पर भरोसा किया गया जिसे
उन डाकुओं ने निभाया.
जब यह
घटना चर्चा में थी तब इस फिल्म को बनाया गया. यह जमींदारों के अत्याचार और शोषण के
विरुद्ध गरीबों की संघर्ष कथा है जो महबूब खान की फिल्म 'मदर इण्डिया' के वातावरण की याद दिलाती
है. वही ग्रामीण परिवेश, वही चुहल, वही शोषण, वही प्रतिकार, वही अपने सम्मान की रक्षा के
लिए संघर्ष. फिल्म में गाँव वालों के परिवार हैं, उनकी झोपड़ियाँ हैं, जमींदार का भव्य मकान है, नर्तकी का कोठा है, स्कूल है, कबड्डी खेलने का मैदान है, कच्ची सड़क है, दूकाने हैं, झील है, नदी है, पहाड़ है; अर्थात् वह सब कुछ ऐसे जतन
से जोड़ा गया है जो किसी गाँव को आपके समक्ष जीवंत कर दे.
उस
काल में इस विषय पर कई रोचक फिल्में बनी; राजकपूर ने बनायी 'जिस देश में गंगा बहती है' (१९६०), दिलीपकुमार ने 'गंगा जमना' (१९६१), सुनील दत्त ने 'मुझे जीने दो' (१९६३), ये तीनों फ़िल्में दर्शकों
में बेहद लोकप्रिय हुई. 'जिस देश में गंगा बहती है' और 'गंगा जमना' ने तो सिनेमाहाल की टिकट
खिड़कियों को हिलाकर रख दिया. 'जिस देश में गंगा बहती है' में डाकुओं के आत्मसमर्पण की उहापोह का भावुक
चित्रण था तो 'गंगा जमना' में अत्याचार के विरोध में
डकैत बनने और इंसाफ की डगर में दो भाइयों के मध्य विचारों के संघर्ष का.
हरिपुर
नामक एक गाँव में गोविन्दी गरीबी में जीवनयापन करती है. वह जमींदार के घर का काम
करती है और उसका बड़ा बेटा गंगा उसकी सहायता करता है. जमींदार की पत्नी कर्कशा है, गोविंदी का बात-बात पर अपमान
करती है. गोविन्दी का छोटा बेटा जमना स्कूल जाता है, पढ़ने में तेज है जबकि गंगा की पढाई में रूचि
नहीं है. ज़मींदार गोविंदी पर चोरी का झूठा आरोप लगाता है, उसे पुलिस गिरफ्तार कर लेती
है. गोविंदी इस घटना से विचलित हो जाती है और उस सदमे में उसके प्राण चले जाते
हैं.
वयस्क
होने पर गंगा निर्णय लेता है कि वह अपने छोटे भाई को खूब पढ़ा-लिखा कर अच्छा आदमी
बनाएगा. इसके लिए वह दिन-रात मजदूरी करता है, गाड़ी में माल की ढुलाई करता है और पैसे कमाकर
भाई की पढ़ाई में भरपूर मदद करता है. गंगा स्वभाव का शोख है जबकि जमना शांत और
सौम्य. गाँव की एक लड़की धन्नो की गंगा से छेड़-छाड़ चलती रहती है, अघोषित प्यार भी था दोनों के
बीच.
एक
दिन सूनेपन का फायदा उठाकर जमींदार धन्नो की इज्ज़त लूटने की कोशिश करता है, गंगा उसकी कोशिश असफल कर
देता है. इस बात से कुंठित जमींदार गंगा पर डकैती का झूठा आरोप लगाता है और उसे
जेल हो जाती है.
जेल
से रिहा होने पर जब उसे मालूम पड़ता है कि उसका छोटा भाई निस्सहाय हो गया है तो वह
बदला लेने के लिए ज़मींदार पर हमला करता है और उसे लूट लेता है. गाँव वाले उसे
मारने के लिए दौड़ाते हैं, उनसे बचने के लिए वह भागता
है. किसी प्रकार वह बच जाता है और जंगल की ओर निकल जाता है, धन्नो भी उसके साथ हो लेती
है. गंगा डाकुओं के गिरोह में शामिल हो जाता है. डाकुओं के अड्डे में गंगा और
धन्नो विवाह कर लेते हैं.
इस
बीच गंगा का छोटा भाई जमना पढ़ाई पूरी करने के बाद पुलिस निरीक्षक बन जाता है.
धन्नो गर्भवती हो जाती है. गंगा चाहता है कि वह गाँव की ज़िन्दगी में वापस लौट जाए
और उसके अपराधों को माफ़ कर दिया जाए लेकिन उसका छोटा भाई जमना, उसे पुलिस के समक्ष
आत्मसमर्पण करने की सलाह देता है लेकिन गंगा इन्कार कर देता है. भागते समय उसकी पुलिस से
मुठभेड़ हो जाती है और वह अपने ही भाई की गोली से मारा जाता है. संबंधों पर कर्तव्य
की विजय होती है.
इस कहानी को दिलीपकुमार ने खुद लिखा था और
सिटिज़न्स फिल्म के बैनर तले निर्माता की हैसियत से बनाया था. संयोग से, यह सफल फिल्म उनकी पहली और
अंतिम फिल्म रही, इसके बाद उन्होंने किसी
फिल्म का निर्माण नहीं किया, हाँ, बतौर नायक वे उसके बाद अनेक फिल्म में आए.
'गंगा
जमना' के निर्देशन के लिए नितिन
बोस को चुना गया जिन्होंने दिलीपकुमार को फिल्म 'अंदाज़' (१९५१) में निर्देशित किया था. संवाद लिखे थे, वज़ाहत मिर्ज़ा ने जिन्होंने 'मदर इण्डिया' (१९५७) और 'मुगल-ए-आज़म' (१९६०) के भी संवाद लिखे थे.
इस फिल्म के संवाद आम हिन्दुस्तानी भाषा में लिखे गए थे लेकिन ग्रामीण परिवेश को
उभारने के लिए इसके संवाद पूरबी (अवधी और भोजपुरी) भाषा में रखने की बात
दिलीपकुमार के दिमाग में आई. ग्रामीण परिवेश को समझने के लिए दिलीपकुमार ने उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के
अनेक गाँवों का दौरा किया, ग्रामीणों से बातचीत की, उनके बात करने के ढंग को
सीखा-समझा. बम्बई से १२५ किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित देवलाली में, जहाँ 'गंगा जमना' की अधिकांश शूटिंग हुई, वहां एक माली बिहारी और उसकी
पत्नी फुलवा के बीच जिस भाषा में वार्तालाप होता था, उनमें झगड़ा होता था, वह दिलीपकुमार को लगा कि
बोलने के इस लहज़े में गज़ब की मिठास है और गाँव के वातावरण का असली असर है, उन्होंने फिल्म 'गंगा जमना' की शहरी भाषा को ग्रामीण में
बदल दिया जो फिल्म की रोचकता बनाए रखने में बहुत सहायक बनी. इस परिवर्तन की वज़ह से
बहुत सी मुश्किलें सामने थी, क्या इस भाषा को हिंदी फिल्म के दर्शक स्वीकार
करेंगे? क्या दिलीपकुमार, जो पेशावरी हैं और
वैजयंतीमाला, जो मद्रासी हैं; संवाद कहते समय अवधी भाषा की
लय पकड़ पाएंगे? तय यह हुआ कि कुछ दृश्यों के
संवाद अवधी में लिखे जाएं, उन दृश्यों को शूट किया जाए
और किसी विशेषज्ञ की राय ली जाए. फिल्म शूट हुई और वरिष्ठ फिल्मकार शशधर मुखर्जी
को हिन्दी और अवधी, दोनों भाषा की रील को दिखाया
गया. शशधर मुखर्जी ने अवधी भाषा को तुलनात्मक रूप से अधिक असरदार बताया और उनकी
बात मानकर पूरी फिल्म के संवाद अवधी में लिखे गए. दिलीपकुमार और वैजयंतीमाला सहित
सभी कलाकारों ने अवधी भाषा में संवाद बोलने का कठिन अभ्यास किया और उन संवादों को
बिना किसी डबिंग के रिकार्डिस्ट एम.आई. धरमसे ने रेकार्ड किया. 'गंगा जमना' अवधी भाषा में बनी भारत की
सर्वप्रथम फिल्म थी.
फोटोग्राफी के लिए दिलीप ने वी.बाबासाहेब को
बुलाया जिन्होंने उनके साथ फिल्म 'दाग' (१९५२) में काम किया था. वी.बाबासाहेब ने तब तक
श्वेत-श्याम फिल्म का छायांकन किया था, 'गंगा जमना' उनकी पहली रंगीन फिल्म थी. इस फिल्म में उनके
चटख रंगों वाले छायांकन ने कथा को उभारने में भरपूर सहयोग दिया, खास तौर से ट्रेन में डकैती
के दृश्य के फिल्मांकन की उस समय बहुत चर्चा थी. फिल्म की सफलता में ट्रेन-डकैती
के दृश्यांकन का भी योगदान था.
संगीत
के लिए नौशाद और गीत के लिए शकील बदायूँनी की जोड़ी दिलीपकुमार की विगत सभी फिल्म
की जाँची-परखी थी. लता मंगेशकर, आशा भोसले, मोहम्मद रफ़ी और हेमंतकुमार के स्वरों की सुरीली
आवाज की मदद से इस जोड़ी ने आठ कालजयी गाने तैयार किए जो आज भी गुनगुनाए जा रहे
हैं. 'न मानूं न मानूं न मानूं रे, दगाबाज तोरी बतियाँ न मानूं
रे, पिया दिल मा तोरे का है, न जानूं रे', 'दो हंसों का जोड़ा बिछुड़ गयो
रे, गज़ब भयो रामा, जुलुम भयो रे', 'ढूँढो ढूँढो रे साजना, मोरे कान का बाला', 'नैन लड़ जैहैं तो मनवा माँ
खटक होइवै करी',
'झनन
घुँघर बाजे',
'इंसाफ
की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के, ये देश है तुम्हारा, नेता तुम ही हो कल के', 'तोरा मन बड़ा पापी संवरिया रे', 'ओ छलिया रे छलिया मन में
हमार, नज़र तोरी गड़ गयी'. ऐसे मधुर गीतों का समुच्चय
दर्शकों को भा गया और एक गंभीर किस्म के कथानक को मिठास दे गया.
दिलीपकुमार
के मन में बहुत दिनों अपने छोटे भाई नासिर को फिल्म जगत में पुनर्स्थापित करने की
बात थी क्योंकि उसकी कई फ़िल्में असफल हो चुकी थी. वे अपना प्रोडक्शन-हाउस भी बनाना
चाहते थे. फिल्म 'गंगा जमना' की कल्पना को साकार करने के
लिए दिलीप को ढेर सारा धन चाहिए था जिसे मुहैया कराने के लिए शापुनजी और पालोनजी
मिस्त्री फिल्म की कहानी सुनकर राजी हो गए क्योंकि उन्हें उसमें कामयाबी की खुशबू
महसूस हुई, वैसे भी उन दिनों दिलीपकुमार
फ़िल्मी दुनिया के सबसे कामयाब एक्टर थे, उन पर दांव लगाना फायदे की गारंटी थी.
दिलीप
ने खुद के लिए गंगा का पात्र चुना और नासिर के लिए गंगा के छोटे भाई जमना का.
नासिर ने दिलीप को समझाया कि कहानी में जमींदार से बदला लेने के लिए गंगा का डाकू
बन जाना, दर्शक स्वीकार नहीं करेंगे
इसलिए कहानी को कोई और मोड़ दिया जाए लेकिन दिलीप ने नासिर की बात नहीं मानी और
कहानी में कोई फेर-बदल नहीं किया.
फिल्म
की शूटिंग महाराष्ट्र के इगतपुरी के आसपास, मध्यप्रदेश के रतलाम के आसपास और बम्बई के
महबूब और कारदार स्टूडियो में हुई. दिलीपकुमार ने इस फिल्म के शुरू करने के पहले
बहुत रिसर्च की, पेपर-वर्क किया, सलाह-मशविरा किया. इस फिल्म
में उनकी भूमिका ऐसे नायक की थी जो अपने सम्मान के लिए कानून के बाहर जाकर अन्याय
का विरोध करता है, बदला लेने के लिए अस्त्र उठा
लेता है. ठेठ देहाती से लेकर डाकू तक की भूमिका को दिलीपकुमार ने तन्मयता से
निभाया और जैसे उस पात्र में प्रविष्ट हो गया. इस फिल्म का नायक क़ानून के खिलाफ़
खड़ा होता है, बदला लेने के लिए डाकू बन
जाता है लेकिन दर्शक की सहानुभूति नायक के साथ बनी रहती है. यह दो भाइयों के बीच
का संघर्ष नहीं था वरन देश के क़ानून और अन्याय तथा भ्रष्टाचार के विरुद्ध नागरिकों
के स्वाभाविक अधिकार के मध्य था.
फिल्म
के अंतिम दृश्य में नायक गंगा को घर में स्थापित भगवान की मूर्ति के समक्ष अपने
प्राण त्यागने थे. शूटिंग के लिए सूर्यास्त का समय चुना गया. दिलीपकुमार ने
वी.बावासाहेब को निर्देश दिया, 'सभी कैमरे सही जगह रखे जाएं, कैमरामेन शाट लेने के लिए
तैयार रहें. कोई रिहर्सल या रीटेक नहीं होगा. मैं सिर्फ एक बार कैमरे के सामने
आऊंगा, वही फायनल शाट होगा.'
कैमरामेन
ने अपनी-अपनी पोजीशन ले ली. दिलीपकुमार कुछ देर तक स्टूडियो में पैदल चक्कर लगाते
रहे, फिर जागिंग की, उसके बाद बेतहाशा दौड़ने लगे.
दौड़ते-दौड़ते इतना थक गये कि उन्हें लगा कि अब साँसें उखड़ जाएँगी, वे अचानक सेट के अन्दर घुसे
और भगवान के सामने गिर कर अपना संवाद कह कर मर जाने का दृश्य अभिनीत किया. यह
फिल्म 'गंगा जमना' का अत्यंत प्रभावशाली दृश्य
था.
दिलीपकुमार
ने 'आज़ाद', 'इंसानियत', 'कोहिनूर', 'नया दौर' की सफलता से लबरेज थे. 'गंगा जमना' में उन्हें ग्रामीण भोलेपन, चुहुलबाजी, जिम्मेदारी और गंभीरता का
मिला-जुला चुनौतीपूर्ण अभिनय प्रस्तुत करना था जिसे उन्होंने बख़ूबी निभाया. उतना
ही सधा हुआ अभिनय वैजयंतीमाला ने किया. सहायक अभिनेताओं में कन्हैयालाल ने यादगार
रोल निभाया. जिस भाई को तरक्की देने के लिए यह फिल्म बनी, वह भाई नासिर, दिलीपकुमार के सामने बौना रह
गया. इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद दिलीपकुमार पर धन और पुरस्कारों की बौछार हो
गयी.
नितिन
बोस के निर्देशन, नौशाद के कर्णप्रिय संगीत, शकील के भावपूर्ण गीत, वजाहत मिर्ज़ा के अर्थपूर्ण
संवाद, वी. बावासाहेब की मनभावन
फोटोग्राफी और कलाकारों के शानदार अभिनय से 'गंगा जमना' एक कालजयी कृति बन गयी, ऐसी फिल्म जो आज भी देखने
में ताज़ा लगती है. 'गंगा जमना' हिंदी सिनेमा की क्लासिक
फिल्म की श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण योगदान के रूप में सदैव अंकित रहेगी.
=============
========================
वसंतकुमार शिवशंकर पादुकोण जिसे हम गुरुदत्त
कहते हैं, यह उस अद्भुत फिल्मकार का
नाम है जिसने 'बाज़ी' (१९५१), 'जाल'(१९५२), 'राज' (१९५३), 'आरपार'(१९५४), 'मिस्टर एंड मिसेज ५५' (१९५५), 'सैलाब (१९५६), 'सी आई डी' (१९५६), 'गौरी' (१९५७), 'प्यासा' (१९५७), 'कागज़ के फूल'(१९५९), 'चौदहवीं का चाँद'(१९६०), 'साहिब बीबी और गुलाम (१९६२)
और 'बहारें फिर भी आयेंगी' (१९६६) जैसी फ़िल्में हिंदी
फिल्म के दर्शकों को दी. ९ जुलाई १९२५ को जन्मे गुरुदत्त ने मात्र ३९ वर्ष की आयु
में अपना जीवन त्याग दिया.
मस्तमौला
गुरुदत्त ने 'चौदहवीं का चाँद' की अपार सफलता के बाद बिमल
मित्र के बांग्ला उपन्यास 'शाहेब बीबी गोलाम' पर फिल्म बनाने की सोची.
गुरुदत्त ने बिमल मित्र को कलकत्ता से बम्बई बुलवाया और अपने पुराने सहयोगी अबरार
अल्वी के साथ बैठकर फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार की और निर्देशन का भार अबरार अल्वी
को सौंपा. उन्नीसवी और बीसवीं शताब्दी में बंगाल की सामन्ती व्यवस्था पर आधारित इस
कथा में उनकी अय्याश जीवन शैली का रोचक बयान था. कहानी एक सामंत, उसकी पत्नी और एक नौकर पर
केन्द्रित थी.
घरेलू
नौकर भूतनाथ के रोल के लिए शशिकपूर का चयन हुआ लेकिन वे व्यस्तता के कारण उपलब्ध न
हो सके. शशिकपूर के बाद बिश्वजीत से बात चली लेकिन नहीं बनी तब उस रोल को खुद
गुरुदत्त ने किया. ऐसा फिल्म 'प्यासा' में भी हुआ था जब नायक की भूमिका के लिए
दिलीपकुमार को साइन किया गया था लेकिन वे शूटिंग के दिन सेट पर आये ही नहीं इसलिए
नायक की भूमिका गुरुदत्त को करनी पड़ी. सामंत की पत्नी 'छोटी बहू' के लिए वहीदा रहमान ने कुछ
शाट्स दिए लेकिन फोटोग्राफर वी.के.मूर्ति ने राय दी कि छोटी बहू के रोल के लिए जो
गंभीरता चाहिए वह कम उम्र वहीदा के चेहरे में उभर कर सामने नहीं आ रही है, तब मीनाकुमारी से संपर्क
किया गया. फिल्म की शूटिंग कलकत्ता स्थित 'धन्कुरिया मेंशन' में होने वाली थी, मीनाकुमारी ने शूटिंग के लिए
कलकत्ता जाने से इंकार कर दिया, मजबूरन बम्बई के स्टूडियो में ही एक उसी तरह का
सेट बनवाया गया जिसमें मीनाकुमारी ने अपने दृश्य फिल्मांकित करवाए. जमींदार की
भूमिका में 'चौदहवीं का चाँद' के हिट अभिनेता रहमान को
लिया गया. वहीदा को भूतनाथ की प्रेयसी सबा का रोल दिया गया जो सहनायिका का था, इस रोल को वहीदा ने हिचकते
हुए स्वीकार किया था क्योंकि वह दरअसल नायिका का रोल चाहती थी.
'शाहेब
बीवी और गोलाम' को बिमल मित्र ने सन १९४०
में लिखना शुरू किया था, चौदह वर्ष के अथक परिश्रम के
पश्चात यह बांग्ला भाषा में पुस्तक की शक्ल में प्रकाशित हुआ. उपन्यास इतना
लोकप्रिय हुआ कि कुछ ही समय में बंगाल के घर-घर में पहुँच गया. बांग्ला भाषा में
इस पर फिल्म भी बनी और खूब चली. नाटक भी खेले गये जिसमें भूतनाथ की भूमिका
बिश्वजीत निभाते थे.
उसी बांग्ला उपन्यास पर बन रही हिंदी फिल्म 'साहिब बीबी और गुलाम' की शूटिंग १ जनवरी १९६१ को
शुरू हुई. बिमल मित्र उस दिन को याद करते हैं और लिखते हैं, 'उसी कहानी का नायक, भूतनाथ, मेरी नज़रों के सामने साक्षात
हाज़िर था, यह मानो (मेरे) विश्वास के
बाहर था. मुझे आज भी याद है कि इस उपन्यास के लिए मुझे अकथनीय निंदा और कल्पनातीत
प्रशंसा नसीब हुई थी. अचरज से मुंह बाए, मैं गुरुदत्त की तरफ एकटक देख रहा था.'
बात
तब की है जब फिल्म 'कागज़ के फूल' की आरंभिक तैयारी चल रही थी.
संगीत दे रहे थे, एस.डी. बर्मन. बर्मन दा के
साथ साहिर लुधियानवी की जोड़ी ने एक-से-बढ़कर-एक गीत दी थे, उनकी ट्यूनिंग बहुत अच्छी थी
लेकिन उन्होंने साहिर के साथ काम करने के लिए इंकार कर दिया. कारण यह था कि साहिर
ने शर्त रखी थी कि वे अपने गीतों के लिए एस.डी. बर्मन से 'एक रूपया' अधिक पारिश्रमिक लेंगे.
बर्मन दा का स्वाभिमान चोट खा गया और गुरुदत्त से कहा कि वे साहिर के साथ काम नहीं
करेंगे, अपमान नहीं सहेंगे. उसके
बदले किसी और को लाओ तब कैफ़ी आज़मी को बुलाया गया और 'वक्त ने किया क्या हसीं सितम, तुम रहे न तुम, हम रहे न हम' और 'देखी ज़माने की यारी, बिछड़े सभी बारी बारी' जैसे यादगार गीत तैयार हुए.
फिल्म
'साहिब बीबी गुलाम' में भी गुरुदत्त एस.डी.
बर्मन और साहिर की जोड़ी को फिर से चाहते थे लेकिन बात नहीं बनी क्योंकि सचिन दा की
तबीयत खराब हो गयी थी और साहिर ने इस फिल्म के गीत लिखने से इंकार कर दिया. इस
फिल्म में संगीत दिया हेमंतकुमार ने और गीत लिखे थे शकील बदायूँनी ने. यह अपूर्व
संयोग उन सात गीतों की श्रृंखला को लेकर आया जिन्हें लोग आज भी गुनगुनाते है.
वैसे
आठ गीत थे फिल्म में लेकिन एक गीत 'साहिल की तरफ कश्ती ले चल', जिसे हेमंत कुमार ने गाया था, को फिल्म रिलीज होने के बाद
काट दिया गया था क्योंकि दर्शकों में उस दृश्य की प्रतिकूल प्रतिक्रिया हुई थी
क्योंकि फिल्म के अंत में जब यह गीत नेपथ्य में बज रहा था, छोटी बहू अपने घरेलू नौकर
भूतनाथ की गोद में अपना सिर रखे हुए थी. यह उस समय के दर्शकों ने पसंद नहीं किया.
परिणामस्वरूप उस गीत के स्थान पर अबरार अल्वी ने कुछ संवाद लिखे और उस दृश्य को 'रीशूट' किया गया. बाद में इसी धुन
का उपयोग फिल्म 'अनुपमा' में किया गया, गीत के बोल थे, 'या दिल की सुनो दुनिया वालों, या मुझको अभी चुप रहने दो, मैं गम को ख़ुशी कैसे कह दूं, जो कहते हैं उनको कहने दो'.
'साहिब
बीबी और गुलाम' के गीत बेहद अर्थपूर्ण, कर्णप्रिय और मदमस्त थे.
फिल्म के आरम्भ में गीता दत्त का गूंजता स्वर 'कोई दूर से आवाज़ दे चले आओ' जब उभरता है तो ऐसा लगता है
जैसे कोई दसों दिशाओं से कोई आपको पुकार कर अपने पास बुला रहा हो. 'न जाओ सैंया, छुड़ा के बैंया, कसम तुम्हारी मैं रो पडूँगी' और 'पिया ऐसो जिया में समय गयो
रे, कि मैं तन-मन की सुध बुध
भुला बैठी', इन दोनों गीतों में
मीनाकुमारी ने अभिनय के ऐसे शिखर को छुआ कि छोटी बहू का पात्र और गीता दत्त की
आवाज़, दोनों गुम हो गए, केवल मीनाकुमारी का चेहरा
स्मृति-कोष में संचित रह गया. 'भंवरा बड़ा नादान है' और 'मेरी बात रही मेरे मन में', इन दोनों गीतों को वहीदा
रहमान पर फिल्माया गया, आशा भोसले ने अपनी अल्हड़
आवाज में इन्हें गाया था जो आज भी श्रोताओं मन मोहता है. 'मेरी जां, ओ मेरी जां, अच्छा नहीं इतना सितम' और 'साकिया आज मुझे नींद नहीं
आएगी', ये दोनों गीत मुज़रे के दृश्य
के लिए तैयार किए गए थे, आशा भोसले की खनकती आवाज़ में
थे.
'साकिया
आज मुझे नींद नहीं आएगी' वाले दृश्य में गुरुदत्त ने
फोटोग्राफर वी.के. मूर्ति को निर्देश दिया कि नर्तकी मीनू मुमताज़ अन्य नर्तकियों
के साथ नृत्य करेगी लेकिन रोशनी सिर्फ मीनू मुमताज़ के शरीर पर होगी, अन्य नर्तकियों के शरीर छाया
की तरह काले दिखने चाहिये. फोटोग्राफर वी.के. मूर्ति ने वह कमाल अपनी फोटोग्राफी
में कर दिखाया. बताने लायक बात यह है कि फिल्म 'साहिब बीबी और गुलाम' का निर्देशन यद्यपि अबरार
अल्वी ने किया था लेकिन सभी गानों की शूटिंग गुरुदत्त के निर्देशन में हुई थी.
बिमल
मित्र ने 'बिछड़े सभी बारी बारी' में लिखा है, 'सुविनय बाबू के घर का दृश्य
फिल्माया गया, उसके बाद लंच हो गया. (भोजन के समय) गीतादत्त के
चेहरे का भाव देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा. वहीदा और गीता को एक ही मेज पर देखकर
मुझे बहुत भला लगा. मैंने गौर किया कि दोनों में काफी सद्भाव था. वहीदा रहमान गीत
दत्त को 'गीता जी' कहकर संबोधित कर रही थी; गीता भी वहीदा को 'वहीदा जी' कहकर बातें कर रही थी. दोनों
को आपस में बातें करते देखकर मुझे ऐसा लगा मानो वे दोनों एक ही परिवार की दो बहनें
हैं.'
'खाने
के बाद शूटिंग की घंटी बज उठी. गुरुदत्त और वहीदा स्टूडियो में चले गये. मैं और
गीता वहीं रह गये. मैंने पूछा, "आपको शूटिंग कैसी लग रही है?"
"अच्छी
लगी. किसी दिन मैंने ही इस फिल्म को बनाने के लिए मना किया था.''
"क्यों?"
"क्योंकि
'साहिब बीबी और गुलाम' हमारी ही ज़िन्दगी की कहानी
है."
"यह आप
क्या कह रही हैं?"
"मैंने
उनसे पूछा भी था, 'आप इस फिल्म को क्यों बना रहे
हैं?' सिर्फ मैं ही नहीं, बहुत से लोग इस फिल्म के लिए
उन्हें मना करते रहे." गीतादत्त ने बताया.'
सबने
मना किया लेकिन गुरुदत्त को 'साहिब बीबी और गुलाम' बनाने के लिए धुन सवार हो
गयी थी, इस फिल्म को बनाने की.
समस्या यह थी कि फिल्म 'चौदहवी का चाँद' अपने अंतिम चरण में थी, उसे रिलीज करना था. वे 'कागज़ के फूल' की असफलता से आर्थिक कष्ट
में थे और बचा-खुचा 'चौदहवी का चाँद' में विनियोजित हो गया था.
पैसे की बहुत तंगी थी लेकिन इन सबसे ऊपर गुरुदत्त की जिद थी.
इस
बीच 'चौदहवी का चाँद' रिलीज हो गयी और गुरुदत्त की
आलमारियाँ नोट की गड्डियों से भर गयी, 'चौदहवी का चाँद' सुपर हिट हो गयी थी और 'साहिब बीबी और गुलाम' के सहज निर्माण का रास्ता
खुल गया. गुरुदत्त के उसी जुनूनी पागलपन का नमूना है 'साहिब बीबी और गुलाम'.
'साहिब
बीबी और गुलाम' की कहानी बीसवी शताब्दी के
सामंती रहन-सहन से जुड़ी थी जहाँ ऐश्वर्य था, अहंकार था और उनका भसकता हुआ साम्राज्य लेकिन
ठसक जस-की तस.
अधेड़
उम्र का अतुल चक्रवर्ती उर्फ़ भूतनाथ जो कि वास्तुकार है, अपने मातहतों के साथ एक
हवेली के खंडहरों को गिराकर नयी इमारत का निर्माण करवा रहा है. उस हवेली को देखकर
उसे अपने पुराने दिनों की याद आ जाती है. फिल्म फ्लैशबेक में चली जाती है. भूतनाथ अपने
गाँव से नौकरी की तलाश में अपने रिश्तेदार के यहाँ कलकत्ता आता है और एक हवेली के
अन्य मुलाजिमों के साथ रहता है. यह हवेली शहर के नामी चौधरी खानदान की है जिसमें
तीन भाई रहते हैं, बड़े बाबू, मंझले बाबू और छोटे बाबू.
भूतनाथ को यह देखकर आश्चर्य होता है कि रोज रात को मंझले बाबू घर में तवायफों की
महफ़िल जमाते हैं और छोटे बाबू एक बग्घी में बैठकर किसी तवायफ के घर चले जाते हैं. भूतनाथ को सुबिनय बाबू के 'मोहिनी
सिन्दूर' बनाने के कारखाने में नौकरी मिल जाती है. एक दिन
सुबिनय बाबू उसे एक विज्ञापन पढने के लिए देते हैं जिसमें यह दावा किया गया था कि
उनके द्वारा निर्मित मोहिनी सिन्दूर को जो स्त्री अपने मांग में भरती है, उसका पति उसके वश में हो जाता है.
एक
रात छोटे बाबू का नौकर बंशी भूतनाथ को कहता है कि छोटी बहू उसे बुला रही हैं.
भूतनाथ डरते-डरते वहां जाता है. छोटी बहू भूतनाथ को एक डिब्बी देती है और कहती
है कि वह उसमें वही 'मोहिनी सिन्दूर' भर कर ला दे ताकि वह अपने
पति को वश में कर सके. भूतनाथ सुबिनय बाबू से
सिन्दूर के प्रभाव की सत्यता जानने की कोशिश करता है लेकिन सुबिनय बाबू बात को टाल देते
हैं. भूतनाथ फिर भी डिब्बी में सिन्दूर भरकर छोटी बहू को दे देता है. इस बीच सुबिनय बाबू की लड़की जबा और
भूतनाथ के बीच प्रेम पनपने लगता है.
छोटी
बहू को मोहिनी सिन्दूर लगाने से कोई लाभ न हुआ. एक रात जब छोटी बहू ने अपने पति से
अपनी उपेक्षा का कारण पूछा तो छोटे बाबू ने उससे कहा कि यदि वह तवायफों की तरह
व्यवहार करे, साथ में शराब पिए तो वह घर
में रुकने के लिए तैयार हो जाएगा. छोटी बहू अपने पति की बात मानकर वैसा ही करने
लगती है लेकिन यह सिलसिला कम समय तक चल पाया, छोटे बाबू फिर से तवायफ के कोठे में जाने लगे.
भूतनाथ
किसी आर्किटेक्ट के साथ काम करने लगता है और उसका संपर्क बहुत समय के लिए छोटी बहू
और सबा से टूट जाता है. कई दिनों बाद जब भूतनाथ हवेली वापस आता है तब उसे मालूम
पड़ता है कि छोटे बाबू बिस्तर पर अपंग होकर पड़े हैं और छोटी बहू को शराब पीने की लत
लग गयी है. अपने पति को स्वस्थ करने की
इच्छा से छोटी बहू भूतनाथ के साथ बग्घी में किसी सिद्ध पुरुष के आश्रम के लिए
निकलते है लेकिन मंझले बाबू को छोटी बहू पर शक हो जाता है इसलिए वह अपने गुर्गों
से भूतनाथ को पिटवा कर बुरी तरह घायल कर देता है. उसके बाद छोटी बहू लापता हो जाती
है.
फिल्म
फ्लेशबेक से वापस वर्तमान में आती है. भूतनाथ उसी हवेली में नवनिर्माण के लिए काम
करवा रहा है. अचानक एक मजदूर आकर बताता है कि खुदाई के दौरान उसे एक नरकंकाल मिला
है. भूतनाथ वहां जाकर उस नरकंकाल को देखता है. नरकंकाल के हाथों में वही सोने का
कंगन था जो छोटी बहू पहनती थी. भूतनाथ दुखी मन से उस हवेली के खंडहर से बाहर निकल
आता है उस बग्घी में अपनी पत्नी जबा के साथ बैठ कर चला जाता है. फिल्म समाप्त हो
जाती है.
अगर
उपन्यास को पढ़ा जाए तो उसमें तत्कालीन बंगाल का वृहद् इतिहास, भूगोल और सामाजिक
परिस्थितियों का वर्णन है और मानवीय व्यवहार का गंभीर विवेचन भी. उस वृहद कथानक को
एक चलचित्र की सीमा में समेटना असंभव था. उपन्यास इतना रोचक है कि पढ़ते समय हाथ से
छूटता नहीं और पाठक को अन्दर तक हिला देता है. मूल कथानक के उन कुछ अंशों को पटकथा
के रूप में तैयार किया गया जिसके माध्यम से उस समय के सामंती परिवारों के रहन-सहन
और रीति-रिवाज़ को आधार बनाकर स्त्री-उपेक्षिता के दर्द को उकेरा जा सके.
छोटी
बहू सौंदर्य की प्रतिमा है, ऐश्वर्यशाली है, सद्चरित्र है लेकिन अपने
पथच्युत पति की उपेक्षा से दुखी है. वह कामातुर नहीं है, केवल पति का अनवरत साथ चाहती
है, उसे अपने घर और खुद से जोड़कर
रखना चाहती है. पति तवायफों के चक्कर में शराब और परस्त्रीगमन का आदी हो चुका है
और उनकी गिरफ्त में जकड़ा हुआ है. पत्नी के पास सुन्दरता है लेकिन वह अदाएं नहीं है
जो बाजारू तवायफ को सिद्ध होती हैं. अपने पति का साथ पाने के लिए वह अपने
तौर-तरीके बदलने का प्रयास करती है, खुद शराब पीती है और उसे पिलाती है लेकिन
दुश्चरित्र पति फिर से गलत रास्ते में मुड़ जाता है और अपनी सुसंस्कृत पत्नी को
शराब का आदी बना देता है. दुखी छोटी बहू शराब के नशे को अपना दुःख दूर करने का
माध्यम बना लेती है.
मीनाकुमारी
ने अपने अभिनय से छोटी बहू के पात्र को इतनी
सजीवता से जिया कि 'साहिब बीबी गुलाम' को अपने कंधे पर रख कर अकेले
चल पड़ी. सभी कलाकारों ने लाजवाब अभिनय किया लेकिन जब भी 'साहिब बीबी गुलाम' का ज़िक्र होता है तो 'न जाओ सैंया, छुड़ा के बैंय्या, कसम तुम्हारी मैं रो पडूँगी' वाला दृश्य हर दर्शक के
मष्तिष्क में अनायास तैरने लगता है. ऐसा लगता है कि छोटी बहू ऐसी ही सुकोमल रही
होगी, वैसी ही सुन्दर रही होगी, इतनी ही दयालु रही होगी और
इतने ही दर्द से सराबोर रही होगी.
मीनाकुमारी
ने कई फिल्मों में शानदार अभिनय किया लेकिन 'साहिब बीबी गुलाम' का अभिनय उनकी अभिनय कला का
सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शन था, वैसा ही जैसा नर्गिस ने 'मदर इण्डिया' में किया था या 'मुग़ल-ए-आज़म' में मधुबाला ने निभाया था.
अन्जाने में, यह फिल्म मीनाकुमारी की
फिल्म बन गयी, बिमल मित्र की छोटी बहू जैसे
परदे पर साकार हो उठी.
आश्चर्य
की बात यह है कि छोटी बहू के रोल के लिए गुरुदत्त ने मशहूर छायाकार जीतेन्द्र
आर्य की पत्नी छाया आर्य का चयन किया गया था जो उस समय अपने पति के साथ इंग्लैण्ड
में रहती थी. वे फिल्म की शूटिंग के लिए भारत आयी. उनके फोटोग्राफ्स लिए गए लेकिन
उनका चेहरा छोटी बहू के मनोभाव व्यक्त करने के लिए उपयुक्त नहीं लगा क्योंकि चेहरे
के अनुपात से उनका जबड़ा कुछ ज्यादा उभरा हुआ लग रहा था. गुरुदत्त चाहते थे कि छोटी
बहू सुन्दर और चंचल तो हो ही, साथ ही उसके व्यक्तित्व में विनय और ममता का
संगम भी हो.
फिर, अगले विकल्प के रूप में
मीनाकुमारी से संपर्क किया गया. मीनाकुमारी को फिल्म में काम करने के लिए तैयार
करना बहुत कठिन था क्योंकि वे अपने पति कमाल अमरोही की गिरफ्त में थी और कमाल
चाहते थे कि मीना उनके अलावा किसी और की फिल्म में काम न करे. निर्देशक अबरार
आल्वी ने फिल्म की स्क्रिप्ट और संवाद के टेप चुपके से मीनाकुमारी को दिए और उनकी
सहमति का इंतज़ार करने लगे. मीनाकुमारी स्क्रिप्ट सुनते ही छोटी बहू की रूह में समा
गई और फिल्म में काम करने के लिए राज़ी हो गयी. कमाल अमरोही को समझाने की
ज़िम्मेदारी उन्होंने अपने ऊपर ले ली. इस प्रकार मीनाकुमारी का छोटी बहू के
रोल के लिए पदार्पण हुआ.
फिल्म
के अन्य दृश्यों की शूटिंग कलकत्ता में चलती रही, लेकिन मीनाकुमारी एक साल बाद
बम्बई में खासतौर से उनके लिए बनाए गए सेट पर आयी और लगातार शूटिंग में भाग लिया. गंभीर दृश्यों की शूटिंग के
समय केवल ज़रुरत के लोग उनके आसपास होते, अन्य किसी को भी अनुमति नहीं थी, यहाँ तक कि फिल्म के
निर्माता गुरुदत्त भी आसपास नहीं होते थे. एक दृश्य में छोटी बहू को अत्यंत दुखी
होकर रोते हुए धड़ाम से नीचे गिरना था, मीनाकुमारी ने स्वाभाविक ढंग से गिरकर उस दृश्य
को अभिनीत किया. सीन उम्दा रहा. वे छोटी बहू की आत्मा में इस कदर समा गयी थी कि
सीन समाप्त होने के बाद भी उनकी आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बहती रही. वहां
उपस्थित लोगों ने उन्हें सांत्वना दी लेकिन वे रोती रही, बामुश्किल वे छोटी बहू की
आत्मा से निकल कर सामान्य हो सकी. मीनाकुमारी ने अपनी निजी डायरी में लिखा, 'मुझसे छोटी बहू का दुःख अब
और नहीं सहा जाता.'
फिल्म
में कैमरा अधिकतर छोटी बहू (मीनाकुमारी) और भूतनाथ (गुरुदत्त) पर केन्द्रित था.
जबा (वहीदा) और छोटे बाबू (रहमान) पर उनसे कम; मंझले बाबू (सप्रू), बड़ी बहू, घरेलू नौकरों और घड़ीसाज
(हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय) पर उससे कम. रोल छोटा रहा हो, या बड़ा, हर पात्र कहानी को बढ़ाने और
उसका प्रभाव उत्पन्न करने के लिए मुफीद था. भूतनाथ का रोल चुनौती पूर्ण था, एक भोलेभाले ग्रामीण का. बात
शशिकपूर से चल रही थी, अचानक गुरु दत्त ने घोषणा की
कि इस रोल को वे स्वयं करेंगे. दरअसल यह घोषणा गुरु दत्त की पत्नी गीतादत्त की
सलाह थी. गुरु दत्त इस फिल्म के पहले भी 'प्यासा', 'कागज़ के फूल' और 'चौदहवी का चाँद' में नायक की सफल भूमिका निभा चुके थे. उनके खुद
काम करने से फिल्म का बजट कम हो गया और एक सुस्थापित हीरो का इंतज़ार करने में
बर्बाद होने वाला समय भी बच गया.
गुरुदत्त
के चेहरे पर बारीक सी मूंछ स्थायी रूप से रहती थी, निर्देशक अबरार आल्वी ने उनसे कहा, 'नायक एक भोलाभाला घबराया सा
देहाती है जिसमें आत्मविश्वास की कमी है. आपका उसके जैसा जैसा दिखना आवश्यक है.
आपकी मूंछ आपके चेहरे को एक अलग गरिमा देती हैं. अगर आपको एक देहाती, डगमगाते विश्वास वाले पात्र
की भूमिका सार्थकता से निभानी है तो अपनी मूंछ साफ़ करनी होगी.' चूँकि मूंछ भूतनाथ के भोलेपन
की राह में बाधक बन रही थी, गुरु दत्त ने अपनी मूंछ
मुंडवा ली, वे मूंछ जो अब तक उनकी पहचान
थी, फिर उन्होंने कभी नहीं रखी.
फिल्म
का एक दृश्य था, छोटी बहू अपने विश्वस्त नौकर
के माध्यम से भूतनाथ को अपने कमरे में बुलाती है.
सिमटा, सकुचाया सा भूतनाथ, हवेली की भव्यता से सहमा, भयभीत क़दमों से छोटी बहू के
कमरे में प्रवेश करता है और उसके समक्ष गाँव के किसी भोलेभाले इंसान की तरह जमीन
पर बैठ जाता है. भूतनाथ की आँखें सामने बैठी छोटी बहू के चरणों पर केन्द्रित होती
है. छोटी बहू का मखमली स्वर उससे
पूछता है, 'क्या नाम है तुम्हारा?'
'भूतनाथ.' उसने बताया.
जिस
नाम को सुनकर लोग हंसते थे, अचरज करते थे, वह मधुर स्वर कहता है, 'बड़ा अच्छा नाम है!'
अपने
नाम की प्रशंसा सुनकर भूतनाथ आश्चर्यचकित हो जाता है और उसका संकोच दूर हो जाता
है. वह अपनी नज़रें उठाकर छोटी बहू की ओर देखता है और उसकी सुंदरता देखता ही रह
जाता है. उस दृश्य में तमाम तामझाम के बीच एक बिछा हुआ खाली पलंग था जो छोटी बहू के जीवन का प्रतीक
जैसा था.
शाट
पूरा हो गया. अगले दिन जब शूट की गयी कच्ची रील आयी तो उसे देखकर अबरार अल्वी का
चेहरा फक हो गया. गुरुदत्त ने पूछा, 'क्या हो गया? इतने उदास क्यों हो?'
'आपने
इतना बढ़िया अभिनय किया है कि आप छोटी बहू की सुन्दरता में आप वैसे ही खो गये जैसे
कोई पुरुष किसी अत्यंत सुन्दर नारी के रूप में खो जाता है.'
'तो, इसमें आपत्ति क्या है?
'दर्शक
यह चाहेगा कि छोटी बहू सुन्दरता से इतनी
ओतप्रोत हो कि उसे जो देखे, देखता ही रह जाए लेकिन
मीनाकुमारी सुन्दर नहीं, भद्दी दिख रही हैं.' अबरार ने कहा. गुरुदत्त इस
बात को सुनकर अवाक रह गये. 'मीनाकुमारी और भद्दी?'
कच्ची
रीलें देखने के बाद उन्होंने कहा, 'तुम सच कह रहे हो अबरार, कुछ तो गड़बड़ है. चलो, देखता हूँ कि क्या किया जा
सकता है.' गुरु दत्त ने कहा.
गुरुदत्त
को फोटोग्राफी का अच्छी जानकारी थी, वे कैमरों के पुर्जे-पुर्जे से वाकिफ थे, और किसी कैमरे को फटाफट
खोलकर सुधार देना उनके बाएँ हाथ का खेल था. वे फोटोग्राफी से सम्बंधित किताबों में डूब कर
कैमरा का दोष को खोजने में भिड़ गये. गड़बड़ी क्लोज-अप कैमरे के लेंस चयन में थी. उस
दृश्य को सही लेंस लगाकर फिर से शूट किया गया. तब जाकर छोटी बहू की सुन्दरता
मीनाकुमारी के चेहरे पर वैसी उतरी जैसी दर्शक देखना चाहते थे.
रहमान
ने छोटे बाबू का अभिनय अपने निराले अंदाज़ में किया, वे सच में किसी अय्याश और बिगड़े-दिल ज़मींदार की
तरह पूरी फिल्म में हावी रहे. दर्शकों के मन में वे छोटी बहू को नाहक दुःख देने
वाले खलनायक की तरह उभरने में कामयाब रहे. मंझले बाबू की भूमिका में सप्रू ने अपनी
भावाभिव्यक्ति और खनकदार आवाज़ का कामयाब उपयोग किया. वे संवाद बोलते समय साँसों के
उतार-चढ़ाव का उपयोग करते थे ताकि संवाद का त्वरित प्रभाव उत्पन्न हो. फिल्म में
उनका रोल हवेली के मालिक का था, रोब-दाब वाले मालिक का, जिसे उन्होंने बहुत कम
शब्दों में निभाया क्योंकि उनके राजसी व्यक्तित्व में कम बोलना अधिक असर पैदा करता
था. जब वे छोटी बहू को मौत के घाट पर उतारने का फैसला लेते हैं तब जल्लाद जैसे
दिखने वाला उनका चेला कहता है, 'हथियारों में जंग लग गया है, सरकार.' तब सप्रू अपनी अंगूठी उतारकर
उसे दे देते हैं जो छोटी बहू की हत्या कर देने का सांकेतिक मूक आदेश था. उस दृश्य
को देखकर डर की अनुभूति होने लगती है.
वहीदा
रहमान के जिम्मे जितना रोल था, उन्होंने सादगी से निभाया. दो गाने, 'भंवरा बड़ा नादान है' और 'मेरी बात रही मेरे मन में', शायद वहीदा की उपस्थिति के
लिए जोड़े गए थे, मधुर और दर्शनीय थे. उनकी
जैसी अद्भुत अदाकारा के लिए जबा का पात्र बहुत छोटा था. कौन जानता है कि यदि
उन्हें छोटी बहू का रोल मिला होता, तो वे क्या कमाल कर दिखाती?
फिल्म
के असली हीरो थे, फोटोग्राफर वी.के.मूर्ति
जिन्होंने उत्कृष्ट फोटोग्राफी के माध्यम से बिमल मित्र के उपन्यास को चलती-फिरती
सजीव जैसी छाया में अवतरित कर दिया. वे गुस्सैल व्यक्ति थे, निर्देशक का दखल पसंद नहीं
करते थे लेकिन निर्देशक उनकी बात इस कान से सुनते थे, उस कान से निकाल देते और
अपनी मर्जी का काम उनसे करवा लेते थे. मूल रूप में ब्लेक-एंड-व्हाइट में बनी इस
फिल्म में मीनाकुमारी की ख़ूबसूरती को उभारना और अँधेरे के माध्यम से छोटी बहू की
पीड़ा को अर्थ देना, उनके जैसा सिद्ध फोटोग्राफर
ही कर सकता था.
एस.डी.बर्मन
के स्थान पर ऐसे संगीतकार की ज़रुरत थी जो बंगाल के संगीत की समझ रखता हो और गुणी
भी हो. हेमंतकुमार मुखोपाध्याय को संगीत देने के लिए चुना गया. चयन सही सिद्ध हुआ, उन्होंने अत्यंत कर्णप्रिय
संगीत का संयोजन किया. फिल्म के सभी गीत आज भी आकर्षित करते हैं और उन गीतों को
बार-बार सुनने का दिल करता है. पार्श्व संगीत भी उच्च-स्तरीय है, कथानक की विचित्र घटनाओं को
संगीत के माध्यम से व्यक्त करने में समर्थ है.
साहिर
की जगह शकील बदायूँनी ने गीत लिखे. शकील ने कथानक को गीतों में व्यक्त करने का
अनोखा कारनामा कर दिखाया. हर गीत कथानक के उल्लास और पीड़ा को शब्द देकर गहरे से छू गया.
'साहिब
बीबी और गुलाम' एक समग्र फिल्म की तरह हिंदी
सिनेमा में याद की जाती है, यह हर दृष्टि से 'क्लासिक' फिल्म थी, अभिनय, निर्देशन, छायांकन, गीत, संगीत, नृत्य, संवाद और संवादों की अदायगी, सब कुछ दोषरहित और निष्कलंक
है.
फिल्म 'साहिब बीबी और गुलाम' हिन्दी सिनेमा की यादगार
कृति के रूप में सदा स्थापित रहेगी.
=============
क्लासिक फिल्म :
======================
निर्माता-निर्देशक बिमल रॉय की फिल्म 'बंदिनी' (१९६३ ) हिंदी सिनेमा की अनोखी फिल्म थी. जरासंध के बांग्ला उपन्यास 'तामसी' पर आधारित इस फिल्म की पटकथा नबेंदु घोष ने लिखी थी और संवाद पाल महेंद्र ने. कहानी उस समय की है जब देश में आज़ादी की लड़ाई चल रही थी. सब तरफ वन्दे मातरम का घोष था. तब ही जेल का एक दृश्य उभरता है और पुलिस की गाड़ी से कुछ महिला कैदी उतरती हैं, उनमें से एक थी कल्याणी (नूतन). वह हत्या के आरोप में सजा काटने आई है.
जेल में किसी महिला कैदी को तपेदिक नामक बीमारी हो जाती है. उसकी तीमारदारी के लिए कोई महिला कैदी के लिए तैयार नहीं होती क्योंकि तपेदिक संसर्गजन्य बीमारी थी. डाक्टर देवेन्द्र (धर्मेन्द्र) उस महिला के इलाज़ के लिए जेल में आते हैं. कल्याणी अपने जीवन की परवाह न करते हुए उस मरीज़ की सेवा में खुद को झोंक देती है. डाक्टर धर्मेन्द्र उसकी सेवा भावना से प्रभावित होते हैं और बिना जाने कि कल्याणी किस आरोप की सजा भुगत रही है, उससे प्रेम करने लगते हैं. वे कल्याणी से अपना प्रेम प्रगट करते हैं तथा विवाह का प्रस्ताव रखते हैं लेकिन कल्याणी स्वयं को उसके अयोग्य मानते हुए इन्कार कर देती है. जेलर को कल्याणी के इन्कार पर आश्चर्य होता है इसलिए वह कल्याणी के अतीत के बारे में पूछता है. कल्याणी अपनी लिखित डायरी जेलर को दे देती है जिसमें उसके जीवन का इतिहास लिखा होता है.
कल्याणी का भाई स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी था, वह पुलिस से छिप रहा था. एक जरूरी गोपनीय सन्देश एक दूसरे नज़रबंद सेनानी बिकास बाबू (अशोक कुमार) तक पहुँचाने के लिए वह कल्याणी को तैयार करता है क्योंकि कल्याणी के पिता शासकीय सेवक थे इसलिए पुलिस को कल्याणी पर शक की गुंजाइश नहीं थी. कल्याणी सन्देश पहुंचा देती है लेकिन बिकास बाबू को देखकर उनके प्रेम में पड़ जाती है. दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं. बिकाश बाबू कल्याणी के घर आने-जाने लगते हैं. एक रात अकेले रह रहे बिकास बाबू तीव्र ज्वर से पीड़ित होकर कल्याणी के घर आ जाते हैं रात भर कल्याणी उनकी सेवा करती है. अचानक पुलिस पहुँच जाती है और बिकास बाबू को गिरफ्तार कर लेती है. जाते समय बिकास बाबू कल्याणी के पिता को वचन देते हैं कि वे जेल से लौट कर आएँगे और कल्याणी से विवाह कर लेंगे. पर वे नहीं लौटते. कल्याणी बिकास बाबू को खोजने शहर जाती है वहां एक मनोरोगी अस्पताल में उसे नर्स की नौकरी मिल जाती है. वहां एक बदमिजाज़ महिला रोगी को सहते हुए मालूम होता है कि वह बिकास बाबू की पत्नी है. उसे बहुत ख़राब लगता है और अपने पिता की मृत्यु के मानसिक दबाव के चलते वह उस महिला को जहर देकर मार डालती है. बिकास बाबू उसे बचाने की कोशिश करते हैं लेकिन कल्याणी पुलिस के समक्ष अपना गुनाह कबूल कर लेती है. इस प्रकार कल्याणी जेल की सलाखों के पीछे पहुँच जाती है. कल्याणी को जेल में पता चलता है कि बिकास बाबू ने देशहित में एक पुलिस अफसर की लड़की से मजबूरी में शादी की थी तो उसे बहुत पीड़ा होती है.
कल्याणी की रिहाई के दिन जेलर उसे डाक्टर देवेन्द्र की मां का एक पत्र देते हैं जिसमें उन्होंने कल्याणी को अपनी बहू के रूप में स्वीकार करने की बात लिखी थी. कल्याणी भरे दिल से अपनी ज़िन्दगी की नयी शुरुआत करने के लिए निकल पड़ती है लेकिन कहते हैं कि एक बार जिससे दिल लग जाए, वह डोर टूटती नहीं है. मनिहारी जाने के लिए वह घाट पर गाड़ी का इंतज़ार करती बैठी थी अचानक तपेदिक रोग से जूझ रहे बिकास बाबू उसे दिख जाते हैं. वह डाक्टर देवेन्द्र के खुशहाल ज़िंदगी के प्रस्ताव को त्याग कर बिकास बाबू के साथ हो जाती है क्योंकि बिकास बाबू को उसकी जरूरत थी और वह बिकास बाबू से अब भी प्रेम करती थी.
इस त्रिकोण प्रेमकथा को बिमल रॉय ने फिल्म 'बंदिनी' में बहुत शिद्दत से चित्रांकित किया है, खास तौर से जेल में निरुद्ध महिलाओं के मनोभावों को गीतों के माध्यम से. 'अबकी बरस भेज भैया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाय रे, लौटेंगी जब मेरे बचपन की सखियाँ दीजो संदेसा भेजाय रे ', जेल में चक्की चलाती कैदी का अपने एकाकीपन में पिता और भाई की उपस्थिति का अहसास कराती आशा भोसले की दर्द भरी आवाज़ सायास दर्शकों की आँखें गीली कर जाती हैं. एक अन्य दृश्य में जेल में कल्याणी कपड़े धो रही है तब ही एक कैदी डाल पर बैठे एक पक्षी को देखकर गा उठती है, 'ओ पंछी प्यारे , सांझ सकारे, बोले तू कौन सी बोली, बता रे' का मार्मिक चित्रांकन है.
'जोगी जब से आया तू मेरे द्वारे, मेरे रंग गए सांझ सकारे' और 'मोरा गोरा रंग लइ ले, मोहे श्याम रंग दइ दे, छुप जाऊंगी रात में ही, मोहे पी का रंग दइ दे.' गीतों को गाते समय नूतन ने प्रेम से परिपूर्ण युवती का अनोखा अभिनय किया है. मुकेश का गाया गीत "ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना' कल्याणी के गाँव छोड़ने के वक्त की पीड़ा व्यक्त करने में समर्थ है. मन्ना डे का गया गीत 'मत रो माता, लाल तेरे बहुतेरे' फांसी के फंदे में चढ़ने के लिए जाते हुए स्वंतत्रता संग्रान सेनानी के साहस का प्रदर्शन है. फिल्म के अंत के पूर्व एस.डी.बर्मन का गाया 'ओ रे मांझी, मेरे साजन हैं उस पार, मैं मनमार, हूँ इस पार, ओ मेरे मांझी, अबकी बार, ले चल पार' ऐसा प्रभावपूर्ण गीत है जो फिल्म के कथानक के समापन को व्यक्त करने की सटीक अभिव्यक्ति के रूप में उभरा है.
फिल्म का अंत छायाकार कमल बोस को पसंद नहीं था. वे चाहते थे कि कल्याणी डाक्टर देवेन्द्र के साथ अपना शेष जीवन बिताए, न कि बिकास बाबू के साथ. बिमल रॉय ने उनकी सलाह का सम्मान करते हुए फिल्म के अंत को 'रीशूट' किया जिसमें कल्याणी बीमार बिकास बाबू को अनदेखा करते हुए वह डाक्टर देवेन्द्र के साथ चली जाती है. उन्होंने इस परिवर्तित और पूर्व निर्मित दोनों अंशों को अपनी पूरी यूनिट को दिखाया और उनकी राय माँगी. बहुमत की राय थी कि कल्याणी का बिकास बाबू के साथ जाना अधिक असरदार है. यही बात मूल कथानक में भी थी इसलिए कल्याणी को बिकास बाबू के साथ जाने वाला दृश्य फिल्म में रखा गया.
इस श्वेत-श्याम फिल्म में दमदार कथानक, शैलेन्द्र और गुलज़ार के असरदार गीत, सचिनदेव बर्मन का मधुर संगीत और मन को छू लेने वाले बिमल रॉय के निर्देशन ने अपने समय की नायाब फिल्म बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, भले ही आर्थिक दृष्टि से उतनी कामयाब सिद्ध नहीं हुई. नूतन ने कम संवाद और अधिक भावाभिव्यक्ति के माध्यम से कल्याणी के पात्र को सजीव करने में समर्थ रही हैं. फिल्म के अंतिम दृश्य में जब कल्याणी बिकास बाबू को बीमार देखकर उनके पास जाती है, उनके घुटनों के नीचे बैठ जाती है और उनके गले लगती है, उस मर्मस्पर्शी दृश्य को बिना किसी संवाद के नूतन और अशोक कुमार ने केवल चेहरे के भाव से इस कदर निभाया है कि वाह-वाह कहने का दिल होता है. अशोक कुमार और धर्मेन्द्र अपने-अपने छोटे से रोल में अपना प्रभाव छोड़ते हैं.
वर्ष १९६३ का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में फिल्म 'बंदिनी' को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म घोषित किया गया था. उस वर्ष के फिल्म फेयर पुरस्कार में इस फिल्म को छः श्रेणियों में पुरस्कृत होने का सौभाग्य मिला, सर्वश्रेष्ठ फिल्म का 'बंदिनी', निर्देशन का बिमल रॉय, अभिनेत्री का नूतन, छायाकार का कमल बोस, ध्वन्यांकन का डी. बिलमोरिया और कहानी का जरासंध; इस फिल्म की झोली में आये.
बिमल रॉय के जीवन की अंतिम फिल्म 'बंदिनी' उनके फ़िल्मी कैरियर की महत्वपूर्ण फिल्म साबित हुई. 'दो बीघा जमीन', 'परिणीता', 'विराज बहू', 'देवदास', 'मधुमती', 'सुजाता' और 'परख' के बाद यह फिल्म उनकी बनाई फिल्मों की फेहरिस्त में हीरे की चमक की तरह हमेशा जगमगाएगी.
= = = = = = =
क्लासिक फिल्म : 'गाइड' :
-------------------------------------------
कुछ फिल्में ऐसी होती है जो जनमानस में गहरी पैठ बनाती हैं, उनमें से एक है, 'गाइड' (१९६५). यह फिल्म प्रदर्शन
की शुरुआत में पिटने लगी, फिर धीरे से उठने लगी और खूब
चली, अब तक चल रही है.
आर.के.नारायण की लिखी, साहित्य अकादमी से पुरस्कृत कहानी 'द गाइड' को कुछ उलट-फेर के साथ 'गाइड' के नाम से इस फिल्म को नवकेतन इंटरनेशनल के बैनर
तले बनाया गया, निर्देशक थे विजय आनंद. राजू
गाइड और रोजी के इर्द-गिर्द घूमती इस कहानी पर फिल्म बनाने का निर्णय अत्यंत
साहसिक था क्योंकि इसकी कहानी का स्वाद उस समय की सामाजिक सोच के अनुरूप नहीं था.
कहानी जबरदस्त थी, रोजी नाम की लडकी जिसकी पति से नहीं पटती. वह अपने पति को किसी अन्य स्त्री के साथ रंगरेलियां करते देख कर पति से नाराज हो जाती है और राजू गाइड से प्रेम करने लगती है. राजू का परिवार रोजी को स्वीकार नहीं करता क्योंकि रोजी एक वेश्या की बेटी थी. घर से विद्रोह करके राजू अपनी रोजी के साथ अलग रहने लगता है. राजू रोज़ी को नृत्यांगना बनने के लिए प्रोत्साहित करता है और उसकी नृत्य प्रतिभा को समाज के समक्ष प्रस्तुत करके स्थापित करता है. वह लोकप्रिय होकर 'स्टार' बन जाती है. इस बीच राजू को जुए और नशे की लत लग जाती है. एक दिन अचानक रोजी का पूर्व पति रोजी से मिलने के लिए आता है, राजू को डर था कि रोजी कहीं उसे छोड़कर चली न जाए इसलिए वह उसे मिलने नहीं देता और झूठ बोलकर एक जालसाजी कर बैठता है. रोजी और राजू के संबंधों में खटास आ जाती है. जालसाजी के अपराध में उसे दो वर्ष की सजा हो जाती है. जेल से रिहाई होने के बाद राजू अभाव और अकेलेपन के कारण अनाश्रित इधर-उधर भटकते रहता है. एक दिन वह एक गाँव के मंदिर के अहाते में सो जाता है और अगली सुबह एक साधु ठण्ड से ठिठुरते हुए राजू के ऊपर पीला वस्त्र ओढ़ा देता है. गाँव वाले राजू को भी साधु समझने लगते हैं. एक ग्रामीण की पारिवारिक समस्या का समाधान कर देने के कारण उसकी लोकप्रियता बढ़ जाती है. उसी समय गाँव में अवर्षा के कारण अकाल की नौबत आ जाती है. गाँव वाले राजू को वर्षा के लिए उपवास करने का आग्रह करते हैं. राजू उनका मन रखने के लिए मजबूरन उपवास करता है और उनके विश्वास की रक्षा करते-करते अपने प्राण त्याग देता है.
एक
विवाहित स्त्री की दुनियावी आज़ादी का साहसिक चित्रण उस समय भारतीय जनमानस के गले
उतरना असंभव था लेकिन विजय आनन्द के कसे हुए निर्देशन, वहीदा रहमान के अभूतपूर्व अभिनय व नृत्य, फली मिस्त्री की मनभावन फोटोग्राफी, शैलेन्द्र के हृदयस्पर्शी गीत तथा सचिनदेव
बर्मन के संगीत ने ऐसी कलाकृति को साकार कर दिया जो सिनेमा के परदे से लोगों के
दिल में उतरकर आज भी प्रकाशित है.
फिल्म की कहानी के एक दृश्य में नायिका को अपना गुस्सा, दुःख और आज़ादी की चाहत
व्यक्त करनी थी. इसे दिखाने के लिए कुछ नया करने का विचार विजय आनंद के दिमाग में
आया. तय यह हुआ कि एक सर्पिणी-नृत्य के माध्यम से नायिका के मनोभावों को अंकित
किया जाए. सपेरों की बस्ती का सेट लगाया गया जहाँ वहीदा रहमान को नृत्य करके नायिका
के भावों को व्यक्त करना था. केवल नृत्य, नृत्य के साथ संगीत लेकिन कोई शब्द नहीं.
बेक-ग्राउंड संगीत रचने की ज़िम्मेदारी बर्मन दादा पर थी. संगीत में 'इफेक्ट' पैदा करने के लिए सामान्य
साजों के अतिरिक्त बहुत कुछ जोड़ा गया, जैसे, ताल में प्रभाव के लिए तबला, ढोलक, ढोल, चेंदा और ढपली का अलग-अलग
मूड के अनुसार उपयोग किया गया. अतिरिक्त प्रभाव उत्पन्न करने के लिए घुँघरू, झांझरी, कब्बस और रेजो-रेजो की मदद
ली. सितार, बेन्जो, मेंडोलिन और क्ले-वायलिन आदि
वाद्य-यन्त्रों का सहारा लेकर सर्पिणी नृत्य का पार्श्व संगीत तैयार किया
गया. सचिन दा ने वहीदा से कहा, 'देखो, इस कम्पोजीशन में शब्द नहीं हैं, केवल म्यूजिक है. अब मौक़ा है
तुम्हें अपना हुनर दिखाने का.' सचिनदेव बर्मन खुश थे लेकिन सोच रहे थे कि क्या
यह दर्शकों को पसंद आएगा?
शूटिंग
चालू हुई तब वे भी वहां वहीदा की प्रस्तुति देखने के लिए खुद मौजूद थे. वहीदा
रहमान काली और लाल रंग की साड़ी पहनकर आई, साथ में सह-नर्तकियां भी ग्रामीण वेशभूषा में
आकर खड़ी हो गयी. वहीदा विश्वास भरी मुस्कुराहट के साथ सेट पर खड़ी होकर
बेक-ग्राउंड-म्यूजिक को ध्यान से सुनने लगी. अचानक उसके चेहरे की रंगत और शरीर की
भाषा बदलने लगी. क्रोध, मायूसी और निर्भीकता का भाव
उभरने लगे. कई शाट्स के बाद नृत्य निर्देशक हीरालाल और सोहनलाल के मार्गदर्शन में
नृत्य का फिल्मांकन संपन्न हुआ. उस प्रस्तुति में वह वहीदा 'रोजी' बन गयी थी.
सचिन
दा ने खुश होकर कहा, 'वहीदा, मैंने सोचा नहीं था कि ऐसा
होगा. मुझे तो बहुत डर लग रहा था
मगर लगता है तुम्हारा गुस्सा, तुम्हारा दुःख, सब कुछ उसमें निकल आया.' उस वर्ष के 'फिल्म फेयर अवार्ड्स' में फिल्म गाइड को सात
श्रेणियों में पुरस्कार मिले जिनमें से एक था, वर्ष की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री, वहीदा रहमान.
यह तय
करना मुश्किल है कि फिल्म 'गाइड' का कौन सा पक्ष अधिक मज़बूत
है. 'गाइड' को क्लासिक फिल्म का दर्जा
देने के अनेक कारण हैं. क्लासिक की हैसियत उसे नसीब होती है जिस फिल्म का हर पहलू
नायाब हो. कहानी से लेकर संगीत तक, सब लाजवाब था. देवआनंद ने इस फिल्म को तसल्ली
से बनाया, हर दृश्य की कल्पना को
वास्तविकता से जोड़ने की भरपूर कोशिश की. एक प्रयोगवादी कहानी के उतार-चढ़ाव को गीत-संगीत के साथ सजा कर
लोकप्रिय फिल्म की शक्ल में पेश करना निर्देशक विजय आनन्द के लिए निःसंदेह
चुनौतीपूर्ण रहा होगा. अदायगी की चर्चा करें तो
वहीदा के अलावा गाइड के रोल में देवआनंद और रोजी के पति के रूप में किशोर साहू ने
अपनी भूमिका के साथ न्याय किया, वहीँ पर अनवर हुसैन ने राजू के मित्र की छोटी
सी भूमिका में पूरा मज़मा लूट लिया.
फिल्म
समीक्षक प्रह्लाद अग्रवाल की मान्यता है, 'देवआनंद इस बात को मानने के लिए कभी तैयार नहीं
हो सकते की 'गाइड' उनसे पहले विजयआनंद की फिल्म
है, और, जो शैलेन्द्र ने कथा के
फलसफे को करिश्माई गीतों में अवाम के दिलों में गंगा-जमुनी रसधारा की तरह न उतार
दिया होता तो देवआनंद की अदाकारी किसी काम न आती.'
विजयआनंद का निर्देशन व संवाद, फली मिस्त्री की नयनाभिराम फोटोग्राफी और शैलेन्द्र द्वारा लिखे व सचिनदेव बर्मन द्वारा संगीतबद्ध दस सुमधुर गीतों ने इस फिल्म को एक क्लासिक फिल्म का दर्जा दे दिया.
एक और
सच्ची घटना है, 'गाइड' के लिए शैलेन्द्र लिखित गीत 'मोसे छल किए जाए, सैंया बेईमान...' का संगीत तैयार किया जा रहा
था. प्रेक्टिस के दौरान सचिनदा के नियमित तबलावादक मारुतीराव कीर उस समय उपस्थित
नहीं थे इसलिए संतूरवादक पंडित शिवकुमार शर्मा ने तबला सम्हाल लिया. दादा ने
शिवकुमार का तबलावादन सुनकर आदेश दिया, 'इस गाने की रिकार्डिंग में तबला तुम बजाएगा.'
'दादा, मैंने तबला बजाना छोड़ दिया
है, मैं तो केवल संतूर बजाता
हूँ.' शिवकुमार शर्मा ने कहा.
'वो सब
ठीक है पर इस गाने पर तबला तुम ही बजाएगा.' दादा ने अपना अंतिम फैसला सुनाया.
'मोसे
छल किए जाए, सैंया बेईमान...' को आपने कई बार सुना होगा.
लताजी की शिकायत भरी मीठी आवाज का असर ऐसा है कि इस गीत के संगीत पर ध्यान ही नहीं
जाता. एक बार आप इस गीत को फिर से सुनिए और तबले की थाप पर अपना ध्यान केन्द्रित
करिएगा, ताल के कितने रंग है, इस गीत में! तबले की थाप को
सुनो तो ऐसा लगता है जैसे आकाश में कोई पतंग लहरा रही हो, बल खा रही हो और गर्वोन्मत्त
होकर आसमान को भेद रही हो. यह संतूरवादक पंडित शिवकुमार शर्मा का तबलावादन
था.
सात 'फिल्म फेयर अवार्ड' हासिल करने वाली इस फिल्म को
सर्वश्रेष्ठ संगीत का पुरस्कार न मिलना आश्चर्यजनक है जबकि बालीवुड की सर्वश्रेष्ठ
पार्श्व संगीत की सूची में 'गाइड' का ग्यारहवें स्थान पर प्रतिष्ठित है.
'गाइड' जैसी फिल्म का निर्माण हिंदी
सिनेमा के लिए अभूतपूर्व प्रयास था. सिनेमा तो कल्पना को वास्तविकता में परावर्तित
करने का कलात्मक विधा है. 'गाइड' का हर फ्रेम दर्शक को इस तरह
बांधता है जैसे दर्शक स्वयं कहानी का हिस्सा हो. इसे ही तो नाट्यशास्त्र के
प्रवर्तक भरत मुनि कहते हैं, 'दर्शक का कथा से तादात्म्यीकरण.'
==========
क्लासिक फिल्म : 'शोले' :
-------------------------
'शोले' हिंदी फिल्म के इतिहास की सर्वाधिक लोकप्रिय फिल्म होने का दावा कर सकती है. १४ अगस्त १९७५ को मुंबई के मिनर्वा सिनेमा गृह में रिलीज हुई फिल्म लगातार पांच साल चली. यद्यपि इससे भी अधिक समय तक 'मुग़ल-ए-आज़म', 'हम आपके कौन हैं' और 'दिल वाले दुल्हनियां ले जाएंगे' के चलने का रिकार्ड है लेकिन आम दर्शक के मन को सबसे अधिक लुभाने वाली फिल्म यही रही है. पूरे देश में जहाँ भी यह फिल्म प्रदर्शित हुई, भरपूर चली. जय और वीरू की जोड़ी, बसंती तांगेवाली, अंग्रेजों के जमाने के जेलर, सूरमा भोपाली, गब्बर सिंह, साम्भा, ठाकुर बलदेव सिंह और मौसी के पात्रों को आज भी दर्शक भूले नहीं हैं जबकि इस फिल्म को बने आधी शताब्दी बीत चुकी है.
जापानी फिल्मकार अकीरा कुरोसोवा की फिल्म 'सेवेन समुराई' की कहानी पर आधारित फिल्म 'शोले' के अतिरिक्त हिंदी भाषा में राज खोसला ने 'मेरा गाँव मेरा देश', नरेन्द्र बेदी ने 'खोटे सिक्के', प्रकाश मेहरा ने 'मेला' और राजकुमार संतोषी ने 'चाइना गेट' का निर्माण किया लेकिन ये फ़िल्में वैसी सफलता प्राप्त न कर सकी, जैसी 'शोले' को मिली. यह कमाल सलीम खान और जावेद अख्तर के लेखन का था जिन्होंने इस कहानी में ऐसे रंग भरे, ऐसे संवाद लिखे कि जिसने देखा, वह फिल्म को बार-बार देखता. प्रदर्शन के शुरुआती हप्ते कमजोर रहे लेकिन उसके बाद जो फिल्म चली तो आज तक हिट है.
सलीम-जावेद ने इस प्रस्तावित फिल्म का संक्षिप्त प्लाट एक-दो अन्य निर्माताओं को सुनाया था लेकिन उनके इन्कार के बाद वे निर्माता जी.पी. सिप्पी के पास पहुंचे, जी.पी. सिप्पी को आयडिया पसंद आया तो उन्होंने अपने बेटे रमेश सिप्पी के पास उन्हें भेज दिया. उसके बाद बैठकों और बातों के कई दौर चले तब जाकर एक फिल्म लांच करने की बात ने अंतिम आकार ले लिया जिसका नाम रखा गया, 'शोले'.
प्रस्तावित फिल्म की मोटे तौर पर पटकथा लिखी गयी. उर्दू लिपि में संवाद लिखे गए जिन्हें बाद में देवनागरी लिपि में परिवर्तित किया गया. पात्रों का नामकरण किया गया, जैसे, जय और वीरू सलीम खान के कालेज के दो दोस्तों के नाम हैं. कलाकारों के चयन के लिए मुख्य भूमिका में धर्मेन्द्र तय हो गए थे उनके दोस्त की भूमिका के लिए शत्रुघ्न सिन्हा का चयन किया जाना था. रमेश सिप्पी ने अपने घर में एक पार्टी दी जिसमें शत्रुघ्न सिन्हा और अमिताभ बच्चन को भी आमंत्रित किया गया था. उस शाम अमिताभ को १०२ डिग्री बुखार थे लेकिन इस फिल्म में काम मिलने की आशा में वे उस हालत में भी पार्टी में पहुंचे. अमिताभ की कई फ़िल्में फ्लॉप हो चुकी थी, उनके सामने काम मिलने की समस्या आ रही थी. फिल्म 'जंजीर' के नायक के रूप में उन्हें काम मिला था लेकिन फिल्म रिलीज नहीं हुई थी. फिल्म जंजीर भी सलीम-जावेद की लिखी कहानी पर बन रही थी. सलीम-जावेद ने जंजीर में अमिताभ के अभिनय को देखा हुआ था, वे अमिताभ की अभिनय प्रतिभा से अत्यधिक प्रभावित थे, फिर, उनकी जबरदस्त सिफारिश पर धर्मेन्द्र के दोस्त का रोल अमिताभ बच्चन को मिल गया. दो नायिकाओं के लिए हेमा मालिनी और जया बच्चन को लिया गया और ठाकुर बलदेव सिंह के पात्र को निभाने के लिए संजीव कुमार को. समस्या फिल्म के खलनायक गब्बर सिंह के लिए उस समय आ गयी जब फिल्म की शूटिंग के दौरान इस रोल के लिए चयनित डैनी डोंग्जोप्पा फिल्म 'महात्मा' की शूटिंग के लिए अफगानिस्तान चले गए तब प्रेम चोपड़ा, रणजीत और प्रेमनाथ के नामों पर विचार किया गया. तब ही अचानक सलीम खान ने अभिनेता जयंत के बेटे अमज़द खान का नाम प्रस्तावित किया. अमज़द खान को दाढ़ी बढ़ाकर स्क्रीन टेस्ट के लिए स्टूडियो बुलाया गया. अमज़द चार दिन की दाढ़ी बढ़ाकार, अपने दांतों को काला करके टेस्ट के लिए पहुंचे. स्क्रीन टेस्ट हुआ और गब्बर के रोल के लिए अमज़द खान को रमेश सिप्पी ने ओके कर दिया.
रामगढ़ गाँव के निवासी ठाकुर बलदेव सिंह (संजीव कुमार), जो कि एक सेवानिवृत पुलिस अधिकारी हैं, ने उन दो चोरों को अपने पास बुलाया जिन्हें कभी उन्होंने चोरी के आरोप में गिरफ्तार किया था. बलदेव सिंह को यकीन था कि ये दोनों चोर जय (अमिताभ बच्चन) और वीरू (धर्मेन्द्र) कुख्यात डकैत गब्बर सिंह (अमज़द खान) को पकड़ने में उनकी मदद कर सकते हैं. ठाकुर उन दोनों चोरों को उनके मुंह मांगी रकम देने का वायदा करते हैं लेकिन वे शर्त रखते हैं कि वे गब्बर को ज़िंदा पकड़ कर ठाकुर को सौंपेंगे.
गब्बर सिंह की तीन डकैत साथी रामगढ़ ग्रामीणों से जबरिया अनाज वसूल करने आते हैं लेकिन ठाकुर द्वारा गब्बर के विरोध में तैनात जय और वीरू के कड़े प्रतिरोध के कारण वे खाली हाथ लौट जाते हैं. गब्बर उन तीनों साथियों को गुस्से में अपनी पिस्तौल की गोलियों से भून देता है. उसके बाद गब्बर अन्य साथियों के साथ रामगढ़ में होली के दिन आक्रमण करता है और लम्बी लड़ाई के बाद जय और वीरू को बंधक बना लेता है. जय और वीरू किसी प्रकार गब्बर के चंगुल से बच निकलते हैं और गाँव छोड़ने का मन बना लेते हैं क्योंकि जब मदद की जरूरत थी तब ठाकुर ने उन्हें बन्दूक उठाकर नहीं दिया था. तब ठाकुर उन्हें बताता है कि किस तरह कुछ समय पहले जब ठाकुर ने पुलिस अधिकारी के रूप में गब्बर को गिरफ्तार किया था, गब्बर जेल से भाग गया और उसके बाद ठाकुर बलदेव सिंह से प्रतिशोध लेने के लिए उसके घर में आकर पूरे परिवार की सामूहिक हत्या कर देता है और ठाकुर के दोनों हाथ काट लेता है. हाथ कटे होने के कारण ठाकुर उसे शाल ओढ़कर छुपा कर रखते थे इसीलिए वे जय और वीरू को बन्दूक उठाकर नहीं दे पाए थे. इस घटना की जानकारी के बाद जय और वीरू का ह्रदय परिवर्तन होता है और वे ठाकुर के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए रामगढ़ में ही रहने का निर्णय लेते हैं और गब्बर के खिलाफ ठाकुर बलदेव सिंह का साथ देते हैं.
इस बीच ठाकुर की विधवा बहू राधा (जया भादुड़ी) से जय को प्यार हो जाता है और तांगा चलने वाली बसंती (हेमा मालिनी) से वीरू को. गब्बर और वीरू के बीच हुई एक और मुठभेड़ में गब्बर के साथी वीरू और बसंती को पकड़ कर अपने अड्डे में ले जाते हैं. जय उनको बचाने वहां पहुंचता है और गोलीबारी के बीच तीनों वहां से बच निकलने की कोशिश करते हैं. इस मुठभेड़ में जय की मौत हो जाती है. जय की मौत से गुस्साया वीरू अकेले गब्बर का मुकाबला करता है, दोनों के बीच जबरदस्त हाथापाई होती है जिसमें वीरू गब्बर को मारने के लिए जैसे ही उद्यत होता है, ठाकुर वहां आकर वीरू को 'गब्बर ज़िंदा सौंपने' का वायदा याद दिलाता है. वीरू गब्बर को ठाकुर को सौंप देता है. ठाकुर अपने जूतों की नुकीले कीलों से गब्बर का हाथ कुचलता है और उसे जान से मारने की कोशिश करता है तब ही वहां अचानक पुलिस आ जाती है और गब्बर को गिरफ्तार कर लेती है.
वीरू रामगढ़ छोड़कर जाने के लिए स्टेशन पहुंचता है जहाँ बसन्ती उसका इंतज़ार करती हुई मिलती है लेकिन राधा एक बार फिर से अकेली ही रह जाती है.
अनेक घटनाओं और कई प्रहसनों के बीच फिल्म 'शोले' दर्शकों में लगातार उत्सुकता बनाए रखने में सफल रही है. हिंसक दृश्यों की तीव्रता को हल्का करने के लिए फिल्म के कथानक में अनेक मनोरंजक घटनाएं पिरोई गयी हैं जो फिल्म के 'मूड' को संतुलित करने का काम करते हैं. जेल में 'हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं' वाले दृश्य अभिनेता असरानी के द्वारा प्रस्तुत प्रकरण निर्मल हास्य को जन्म देता है. लकड़ी बेचने वाले सूरमा भोपाली के रूप में हास्य कलाकर जगदीप ने अविस्मरणीय अभिनय किया है. रेलवे स्टेशन से रामगढ़ जाने के रास्ते के बीच तांगेवाली बसंती और वीरू-जय के मध्य हुए संवाद अत्यंत रोचक सिद्ध हुए हैं. इसी प्रकार जय और मौसी के बीच वीरू के रिश्ते को लेकर हुआ वार्तालाप अमिताभ बच्चन के बहुमुखी अभिनेता होने का परिचय देता है. वीरू के रोल में धर्मेन्द्र ने जांबाज़ योद्धा का जानदार अभिनय किया है साथ ही अपने हास्य कलाकार होने का भी परिचय दिया है. बन्दूक से बसंती को आम तोड़ना सिखाना, भगवान की मूर्ति के पीछे खड़े होकर भगवान की आवाज में बसंती से बातचीत, पानी टंकी के ऊपर चढ़कर आत्महत्या करने की धमकी आदि दृश्यों में धर्मेन्द्र ने किसी स्थापित हास्य अभिनेता से बेहतर अभिनय किया है. ये सभी दृश्य विभिन्न देशी-विदेशी फिल्मों से उठाए गए थे लेकिन ये सब सलीम-जावेद के चुस्त संवादों और अभिनेता-अभिनेत्रियों के दुरुस्त अभिनय के चलते मनभावन बन गयी और दर्शकों के स्मृति कोष में स्थायी रूप से से अंकित हो गये.
रमेश सिप्पी इस फिल्म की शूटिंग छः माह में पूरी करने की योजना बना कर शुरू हुए थे लेकिन सात माह बीत जाने के बाद केवल एक तिहाई फिल्म बन पाई. दो माह तो कर्णाटक के रामनगरम को रामगढ़ बनाने में लग गए. दो माह ट्रेन डकैती के फिल्मांकन में लगे. गब्बर सिंह द्वारा ठाकुर के परिवार की हत्या में २३ दिन, 'ये दोस्ती, हम नहीं भूलेंगे' गीत में २१ दिन, जय के माउथऑर्गन बजाने और राधा के दीप जलाने के दृश्य को शूट करने में २० दिन लगे थे. फिल्म के हर एक दृश्य को 'परफेक्ट टच' देने का रमेश सिप्पी का आग्रह फिल्म निर्माण के समय को बढ़ाता गया और ४ घंटे की इस ७० एम.एम.-सिक्स ट्रेक स्टीरियोफ़ोनिक फिल्म को तैयार करने में लगभग डेढ़ साल लगे. फिल्म सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म पर अपनी निर्मम कैंची चलाई और केवल ३ घंटे २० मिनट की फिल्म प्रदर्शन के लिए तैयार हो गयी.
फिल्म के गीत आनंद बक्शी ने लिखे थे तथा संगीत राहुल देव बर्मन ने तैयार किया था. गाने साधारण थे लेकिन फिल्म की सफलता के चलते लोकप्रिय हो गए. एक कव्वाली भी रिकार्ड की गयी थी लेकिन फिल्म की लम्बाई अधिक होने के कारण उसे फिल्म से हटा दिया गया.
फिल्म 'शोले' के संवाद आमजन में इतने लोकप्रिय हो गए कि फिल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' के संवादों के रेकार्ड की तरह इस फिल्म के संवादों का एक एल.पी. रेकार्ड बनाया गया जिसकी रिकार्डतोड़ बिक्री हुई. गली-गली में इस संवादों की गूँज फैलती गयी और फिल्म को बार-बार देखने के लिए दर्शकों को मजबूर करते रही.
'शोले' के सफलता ने सलीम-जावेद की जोड़ी को बालीवुड में सातवें आसमान में चढ़ा दिया. इसी फिल्म की शूटिंग के समय जया बच्चन गर्भवती हुई और उन्होंने अभिषेक बच्चन को जन्म दिया, इसी फिल्म की शूटिंग के दौरान धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी के बीच प्यार हुआ जो पांच वर्ष बाद विवाह के रूप में परिवर्तित हुआ. इसी फिल्म के कारण अमज़द खान जैसा अनजान कलाकार एक दमदार खलनायक के रूप में उभरा और लोगों की नज़र में चढ़ गया. अमज़द खान की संवाद कहने की शैली जन-जन में लोकप्रिय हो गयी, 'कितने आदमी थे...', 'जो डर गया समझ लो मर गया...', 'अपने हाथ दे दे ठाकुर...', 'बहुत याराना लगता है...' आदि संवाद आम हिन्दुस्तानी की बातचीत में शामिल हो गए थे.
सन २००५ में आयोजित पचासवें फिल्म फेयर अवार्ड में इस फिल्म को 'पचास वर्षों में बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म' घोषित किया गया. फिल्म 'शोले' हिंदी फिल्मों के इतिहास में एक सफल और प्रभावशाली फिल्म के रूप में सदा अंकित रहेगी. यह हिंदी सिनेमा की एक क्लासिक फिल्म थी.
= = = = = = = =
क्लासिक फिल्म : 'गाँधी' :
--------------------------
फिल्म की शुरुआत ३० जनवरी १९४८ की एक शाम से होती है जिसमें गाँधी एक प्रार्थना सभा को संबोधित करने जा रहे हैं, तब ही एक दर्शनार्थी नाथूराम गोडसे उनकी खुली छाती में अपनी पिस्तौल से गोलियां उतार देता है. गांधी 'हे राम' कहते हुए धराशायी होकर अपने प्राण त्याग देते हैं. उनकी अंतिम यात्रा निकल रही है, लाखों लोगों का हुजूम उनको अश्रुपूरित विदाई दे रहा है और एक रेडिओ उद्घोषक गांधी के जीवन के बारे में विस्तार से बता रहा है.
-------------------------------
फिल्म : दंगल : (२०१७)
-----------------
ऐसा सबके साथ होता है कि मनुष्य की जो बनने या करने की ख़्वाहिश होती है, वह पूरी नहीं होती। दोष खुद का हो या हालात का, मंज़िल तक पहुँचते-पहुँचते अचानक उसके पैर पथरा से जाते हैं, आखिरी चार कदम भी चलना मुश्किल हो जाता है और वहाँ तक न पहुँच पाने का अफसोस एक बोझ की तरह ज़िंदगी भर उसे सालता है। यह अफसोस घुन की तरह उसे अंदर ही अंदर खोखला बना देता है, ऊपर से मुस्कुराती आँखों के पीछे उसकी असफलता का दर्द झलकता है लेकिन साफ-साफ दिखता नहीं, ऐसा सबके साथ होता है।
यह कसक दिल में आयुपर्यन्त चुभती है क्योंकि उस चाही गई उपलब्धि की कमी उसके हर पल को बेचैन बनाए रखती है। दिल उस फ्रेम को अपने हाथों में थामे उस तस्वीर को खोजता है जिस पर वह उसे चढ़ा सके। सबसे आसान होता है, अपनी संतान से उम्मीद करना। कलेक्टरेट में क्लर्क की नौकरी करने वाला अपनी संतान को कलेक्टर इसलिए बनाना चाहता है ताकि वह अपनी मानसिक गुलामी से मुक्त हो सके और अपनी नौकरी के दौरान हुए अपमान का बदला ले सके। मनुष्य की संतानें ऐसी ही किसी शतरंजी चाल का मोहरा बनाई जाती हैं, कई वज़ीर पिट कर मैदान के बाहर सिर पकड़ कर बैठ जाते हैं तो कुछ पैदल बढ़ते-बढ़ते वज़ीर बन जाते हैं। पैदल के वज़ीर बन जाने की कहानी है, फिल्म- दंगल।
जिस दंपत्ति की संतान नहीं होती, उसका दुख वही जानता है लेकिन जिनके यहाँ लड़के नहीं होते और लड़कियों की 'लाइन' लग जाती है वे दंपत्ति अपने दुख से ऊपर उठकर सबकी दया के पात्र बन जाते हैं। हमारे समाज में पुत्रहीन होना संतानहीन होने से कम दुर्भाग्य नहीं माना जाता है। वैसे, पुत्रहीन या संतानहीन दंपत्तियों को समाज यूं ही बेसहारा नहीं छोड़ता। सभी जान-पहचान वाले मदद के लिए अपने हाथ बढ़ाते हैं, किसिम-किसिम के उपाय बताते हैं, दावा करते हैं कि उनके द्वारा बताया गया उपाय सौ परसेंट काम करेगा और उम्मीद भी करते हैं कि उनकी सलाह काम कर जाए। यहाँ तक कि सशरीर सहयोग तक के लिए भी उतावले रहते हैं, भले ही मुंह से कह नहीं पाते।
फिल्म- दंगल में मुख्य पात्र पहलवान महाबीरसिंह फौगाट के घर में लगातार लड़कियों के बाद एक लड़के के जन्म की आस में गाँव वालों के सार्वजनिक योगदान को इतनी खूबसूरती से फिल्माया गया है कि देखते बनता है। फिल्म के स्क्रिप्ट-राइटर नीतीश तिवारी को सलाम करने का जी करता है।
ऐसा कहाँ होता है कि आपकी ख़्वाहिश कोई दूसरा पूरी कर दे? पहलवान महाबीर सिंह का सपना था कि उसका बेटा देश के लिए कुश्ती लड़े और देश का नाम ऊंचा करे लेकिन लड़के की प्रतीक्षा में उसकी चार लड़कियां हो गई। किसी लड़के के अभाव में उसका सपना अधूरा रह गया तब ही एक घटना ने उसे अपनी सीमा से बाहर निकलकर नई सोच की तरफ मोड़ा और उसने अपनी लड़कियों को पहलवानी सिखाने का संकल्प लिया। उन्हें अपने लक्ष्य का साधन बनाया जबकि गाँव का मौजूदा माहौल इस निर्णय के सर्वथा विरुद्ध था। पहलवान और उसकी दो लड़कियां, गीता व बबीता कुमारी, सबकी हंसी और उलाहने के पात्र बन गये। लड़कियों का बचपन पिता के सपनों की कैद में फंस गया, सुबह पाँच बजे उठना, दौड़ना, कसरत करना और कुश्ती लड़ना सीखना उनके लिए मानसिक और शारीरिक बोझ बन गया। पिता का आतंक इतना अधिक था कि वे विरोध नहीं कर सकती थी, बल्कि सही तो यह था कि पिता ने उन्हें विरोध करने का मौका ही नहीं दिया। पिता की ज़िद के आगे असहाय लड़कियां अपने वर्तमान से लड़ते हुए खुद को मजबूत बनाने की कोशिश करती रही। बेशक, उनका शरीर मजबूत होता गया लेकिन मन कमजोर पड़ता गया, दोनों अनिच्छुक हो गयी लेकिन एक सहेली के वैवाहिक कार्यक्रम में कुछ ऐसा हुआ जिसने न सिर्फ गीता व बबीता वरन भारत के भविष्य की नई संभावना का सूत्रपात कर दिया। फिल्म 'दंगल' में कथा के इन दृश्यों को बखूबी दर्शाया गया है। मध्यांतर तक इतनी सी कहानी है जो कहानी नहीं, सच्चाई पर आधारित पटकथा है। गीत-संगीत और संवादों के माध्यम से इसका फिल्मांकन उच्चस्तरीय है, मनमोहक है और प्रभावशाली भी।
आमिरखान का कहना है- '' फिल्म 'दंगल' केवल कुश्ती पर आधारित फिल्म नहीं हैं वरन एक ऐसे पिता की भावनात्मक यात्रा है जो हमें अपनी लड़कियों को शक्ति सम्पन्न करने के लिए प्रेरित करती है।' सत्यता पर आधारित यह फिल्म एक निराश पिता की आशाओं को पुनर्जीवित करने की गाथा है जो माता-पिता के द्वारा उनकी संतानों की परवरिश के लिए किये गये प्रयासों और अपने सपने साकार करने की सफलता का प्रामाणिक दस्तावेज़ है।
टीवी के एंकर किशोर आजमानी ने एक साक्षात्कार में आमिर खान से पूछा- 'आपकी फिल्म 'थ्री ईडियट्स' में बच्चों के साथ माता-पिता के 'ट्रीटमेंट' पर जो संदेश था और फिल्म 'दंगल' के जो संदेश है, उसमें इतना विरोधाभास क्यों है?'
'फिल्म 'दंगल' सत्यकथा है, उसमें मैं परिवर्तन नहीं कर सकता था। जैसा हुआ, वैसा बताया। मेरी निजी राय 'थ्री ईडियट्स' के साथ है।' आमिरखान ने उत्तर दिया।
ग्रामीण परिवेश में बच्चों की परवरिश आज भी परंपरागत हो सकती है क्योंकि वहाँ सम्बन्धों का आदर बना हुआ है। महाबीरसिंह की बड़ी बेटी गीता ने बताया- 'केवल बापू हानिकारक नहीं थे वरन हमारी माँ भी बहुत कड़क थी। हम उनसे कभी कुछ कहें तो बोलती थी- ''जो बापू कहे, वह करो।'' उस समय हमें बहुत खराब लगता था लेकिन आज ऐसा लगता है कि जैसे माता-पिता हमें मिले, वैसे सबको मिलें।'
अब आधुनिक विचारों के कारण परवरिश के तरीके बदल गये हैं। बच्चों की सोच पर गौर किया जाए तो वे अभिभावक को अपना 'दयालु फायनेंसर' समझते हैं। वे माता-पिता की बात सुन तो लेते हैं लेकिन मानते नहीं। बच्चों को डांट-डपट कर या दबाव डाल कर काम करवाने का युग समाप्ति के कगार पर है। माता-पिता ने जो सपने देखे या टूटे, वे बच्चों के सपनों से सर्वथा अलग हैं। क्या आज कोई सोच सकता है कि माता-पिता का सपना पूरा करने के लिए कोई संतान अपने सपने का बलिदान कर देगी? फिल्म 'दंगल' ने इस विषय पर विचार करने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न भारतीय समाज की ओर उछाला है।
जानकार बताते हैं कि धन कमाने के लिए दूरदृष्टि आवश्यक है, इसका एक मज़ेदार उदाहरण 'दंगल' में फिल्माया गया है। पहलवान महाबीरसिंह अपनी दो बेटियों को साथ लेकर शहर में होने वाली दंगल प्रतियोगिता में भाग लेने पहुंच गये। आयोजकों ने लड़कियों से लड़कों की कुश्ती करवाने से साफ इंकार कर दिया। उसी समय आयोजकों में से एक ने अपना दिमाग लगाया कि यदि लड़कियों से लड़कों की कुश्ती करवाई जाये तो दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ेगी और तगड़ी कमाई होगी। होशियार व्यापारी बहुत आगे की सोच रखता है। क्या बिकेगा, कब बिकेगा, कैसे बिकेगा, इन बातों पर दूरगामी दृष्टि रखने वाले सदैव सफल होते हैं और मोटी कमाई करते हैं। संभावित कमाई ने आयोजकों की अक्ल के दरवाजे खोले, निर्णय तुरंत बदला और नई शैली की कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन हुआ जिसमें हरयाणा के इतिहास में पहली बार 'यूनीसेक्स' मुक़ाबला हुआ। रिक्शे में मुनादी करवाई गई। शहर के शोहदों का हुजूम मुक़ाबला देखने के लिए उमड़ पड़ा। लड़कियों का शरीर और उनकी दुर्दशा देखने के लिए लालायित भीड़ उस समय सन्न रह गई जब लड़कियों ने लड़कों को उठा-उठाकर पटका। भीड़ हमेशा जीतने वाले के साथ होती है, दर्शक लड़कियों की तरफ चले गये और हरयाणा जैसे परंपरावादी प्रदेश में लड़कियों में अंतर्निहित शक्ति को सामाजिक मान्यता मिलने की खुशनुमा शुरुआत हुई। फिल्म 'दंगल' में इन दृश्यों को इतनी खूबसूरती से पिरोया गया है कि फिल्म देखते हुए सीट से उछल कर हिप-हिप-हुर्रे करने का दिल करता है।
महाबीर पहलवान की सभी लड़कियां आम लड़कियों जैसी थी, संकोची, छुई-मुई और अपने भविष्य के लिए अंजान सी। ओशो ने कहा है- 'हर पुरुष में स्त्रैण होता है और हर स्त्री में पुरुषत्व।' सद्गुरु जग्गी वासुदेव भी इसकी पुष्टि करते हैं और कहते हैं- 'मनुष्य का जन्म स्त्री और पुरुष के संयोग से हुआ है इस कारण इन दोनों का मिश्रित स्वभाव संतानों को प्राकृतिक प्रक्रिया के अनुरूप अंतरित हो जाता है।'
इसी कारण जो पुरुष स्त्रियोचित व्यवहार करते हैं, उन पर उनकी माँ का आनुवांशिक प्रभाव अधिक मात्रा में होता होगा, उसी प्रकार जो स्त्रियाँ पुरुषोचित व्यवहार करती हैं, उन पर उनके पिता का। फिल्म 'दंगल' की दो किशोरियाँ जब छेड़खानी के विरोध में एक लड़के की जमकर ठुकाई करती हैं तो डरी-सहमी लड़कियां के भीतर छुपा पुरुषत्व अपना सिर उठाकर हिम्मत के साथ बाहर आता है और गाँव वालों के साथ-साथ घर वालों को भी इन लड़कियों के साहस का परिचय मिल जाता है। अब उस प्रदर्शित साहस में शक्ति को भरने का काम शेष था जिसे उन लड़कियों के पिता महाबीर पहलवान ने बखूबी किया। पिता के दबाव में लड़कियां अवश थी लेकिन अनिच्छा से अपने पिता की इच्छा पूरी करती रही। फिल्म के एक दृश्य में गीता बबीता से कहती है- 'छोरे को पीटना बहुत मंहगा पड़ गया।'
ऐसा अक्सर होता है कि घर वालों की बात का असर बच्चों पर कम पड़ता है, वे उनकी अनसुनी करते हैं और कालांतर में अवज्ञा भी, लेकिन वही बात कोई बाहर का व्यक्ति समझा दे तो वे सहज ही मान लेते हैं। 'दंगल' में अपने पिता के अनुशासन और शारीरिक अभ्यास से त्रस्त दोनों लड़कियां अपनी सहेली के विवाह कार्यक्रम में अपने पिता की गैर-जानकारी में जाकर जमकर नाचती हैं। अचानक पिता के वहाँ पहुँच जाने से भयभीत लड़कियां दुखी हो जाती हैं और लड़कियों की उस उम्र की मस्ती के अवरोध से बुरी तरह आहत हो जाती हैं तब उनकी सहेली उन दोनों को जो समझाती है, वह समझाइश गजब की है। फिल्म में इस दृश्य को देखकर महसूस होता है कि सार्थक शब्दों में किसी को बदलने की कितनी शक्ति होती है!
गीता फौगाट ने कहा है- 'हमारा बचपन बहुत ही तकलीफदेह था, कुश्ती के चलते बर्बाद हो गया। बचपन में कई बार लगा कि मैं सब कुछ छोड़कर भाग जाऊं। कई बार मेरे बापू भी गुस्से में मुझे अखाड़े से भगा देते थे। उसके बाद मां से बोलते कि अब तुम घर का कोई काम नहीं करोगी, सारा काम गीता से करवाओ। हालांकि आज लोगों का इतना प्यार मिल रहा, जिसे देखते हुए लगता है कि जो हुआ अच्छा ही था।'
गीता का यह व्यक्तव्य हर इंसान के लिए काम का है। हर सफलता अपनी कीमत वसूल करती है। संसार में कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता। जो मुफ्त दिखता है, एक दिन उसकी कीमत भी देनी होगी। जिन्होंने जीवन की शुरुआत में तकलीफ़ों का सामना किया, वे उत्तरार्द्ध में सुखी रहे और जिन्होंने शुरू में मज़े कर लिये, वे बाद में भुगते।
महावीरसिंह फौगाट का कहना है- 'सबके जीवन में एक दौर आता है जब इंसान को निराशा का सामना करना पड़ता है, लेकिन उस निराशा के दौर में कमजोर होने से बेहतर है खुद को मजबूत करना। मैंने हमेशा यही किया। अगर मैं कभी निराश होता था तो अपनी बेटियों पर पहले से ज्यादा मेहनत करने लगता और उनसे भी मेहनत करवाता।'
निरंतर अभ्यास और प्रयास से ही लक्ष्य साधा जा सकता है। फिल्म 'दंगल' में दोनों लड़कियों के बचपन से युवावस्था तक का संघर्ष निर्देशक नीतीश तिवारी ने बखूबी फिल्माया है। उस पर पिता महाबीरसिंह फोगट के रूप में आमिरखान ने उत्कृष्ट अभिनय किया है। उनका शारीरिक सौष्ठव, चाल-ढाल, भाव-भंगिमा और संवादों का लहज़ा शर्तिया पहलवानी है। सच पूछिए तो आमिरखान का कहीं अता-पता नहीं है जबकि पूरी फिल्म में पहलवान महाबीरसिंह फौगाट स्वयं छाए हुए हैं।
मध्यांतर के बाद की फिल्म असल कहानी का फिल्मी संस्करण है जिसमें एक कोच को नकारात्मक नज़रिये से पिरोया गया है फिर भी गीता के पिता और उसके कोच के बीच उपजा विरोधाभास स्वाभाविक लगता है। घटनाक्रम दो पीढ़ियों की प्रशिक्षण शैली के अंतर और उनके अंतर्विरोध को भलीभाँति उभारता है। कामनवेल्थ गेम्स में गीता को मिले स्वर्णपदक का श्रेय कोच लेना चाहता है जबकि गीता स्वर्णपदक अपने पिता को अर्पित करती है। संगीत और खेल में अभी भी गुरु का मान बना हुआ है अन्यथा अन्य क्षेत्रों में गुरु का उल्लेख करना लोग जानबूझकर भूल जाते हैं। आपको याद है, फिल्म 'गाइड'? बे-आसरा रोजी को राजू गाइड अपनी माँ के आदेश की अवज्ञा करके अपने घर में आसरा देता है, उसकी नृत्य-प्रतिभा को बढ़ावा देता है और जन-जन में लोकप्रिय बनाता है। रोजी के 'स्टार' बन जाने के बाद वही राजू गाइड रोजी की उपेक्षा का शिकार होकर बोझ लगने लगता है। आज की राजनीति में भी ऐसे उदाहरण सर्वत्र बिखरे हुए हैं। पद मिल जाने के बाद अपने प्रेरक का नाम लेना भी पाप समझा जाता है और गुरु को ठिकाने लगाने के स्थाई उपाय खोजे जाते हैं। फिल्म 'दंगल' में गीता ने अपने असली गुरु को उसका न्यायोचित सम्मान दिया। वह दृश्य अत्यंत मार्मिक बन पड़ा है, उस दृश्य में दोनों की अश्रुधार बह रही थी और उनके साथ दर्शक भी रो रहे थे।
यह ज़रूरी नहीं है कि जो फिल्म टिकट खिड़की पर सफल हुई हो, वह अच्छी है; या, जो असफल हुई हो, वह बुरी है. हिन्दुस्तानी सिनेमा में उन असफल फिल्मो का अक्सर ज़िक्र होता है जो उच्च-स्तरीय थी लेकिन बुरी तरह पिटी, जैसे गुरुदत्त की 'कागज़ के फूल', सुनील दत्त की 'यादें' और 'रेशमा और शेरा', राजकपूर की 'बूटपालिश', 'जागते रहो', और शैलेंद्र की 'तीसरी कसम' आदि। कुछ ऐसी फ़िल्में भी थी जो जितनी तेजी से उठी, उतनी ही तेजी से गिरी जैसे 'मुग़ल-ए-आज़म'. दर्शकों ने लाइन लगाकर टिकट ली क्योंकि शीशमहल के चर्चे गली-गली में थे. मधुर संगीत और लाजवाब अदाकारी के बावजूद जब खालिस उर्दू में बोले गए संवाद लोग नहीं समझ पाए तो हाल खाली होते गए. बॉक्स-ऑफिस पर फिल्म असफल रही लेकिन जब वह पुरानी शराब की तरह हो गई तो फिर से 'हिट' हो गई. यही चढ़ाव-उतार-चढ़ाव फिल्म 'मेरा नाम जोकर' के साथ भी हुआ. आम तौर पर माना जाता है कि सितारा कलाकार, अच्छी पटकथा, तीखे संवाद, मीठे गीत और मधुर संगीत के 'काम्बिनेशन' से फिल्म हिट होती है.
फिल्म 'दंगल' में भी इन टोटकों को आज़माया गया लेकिन सितारा कलाकारों को न लेकर नए कलाकारों को अवसर दिया गया। आमिरखान ने इस फिल्म में अपने 'स्टारडम' के प्रतिकूल उसने एक मोटे-ताजे पहलवान का अभिनय किया। पहलवान महाबीरसिंह की पत्नी दया शोभा कौर के रोल के लिए मल्लिका शेरावत सहित 70 अभिनेत्रियों के 'आडिशन' हुए जिसमें से साक्षी तंवर का चयन किया गया। महाबीरसिंह की बड़ी लड़की का रोल फातिमा साना शेख और छोटी बेटी बबीता कुमारी का सान्या मल्होत्रा ने किया। इन दोनों के बचपन का रोल क्रमशः ज़ाइरा वासिम और सुहानी भटनागर ने किया। इन सभी को कुश्ती के दाँवपेंच पहलवान कृपाशंकर पटेल बिश्नोई ने सिखाये।
मेरा अनुमान है कि निर्मातागण आमिर खान, किरण राव और सिद्धार्थ रॉय कपूर को इस फिल्म की सफलता पर उतना भरोसा न था इसलिए उन्होंने फिल्म में नामी कलाकारों को न लेकर अपनी लागत घटाई और फिल्म के बजट को सीमित रखा। अनुमान है कि इस फिल्म को बनाने में लगभग तीस करोड़ की लागत आई है जो आजकल बन रही बड़ी फिल्मों की लागत के अनुपात में बहुत कम है। सवाल यह है कि इतनी कमजोर 'स्टार-कास्ट' पर यह फिल्म इस कदर सफल क्यों हुई?
फिल्म वह चलती है जो बहुसंख्यक दर्शकों को पसंद आती है। फिल्म की सफलता के मर्म जानने का दावा करने वाले भी जब कोई फिल्म बनाते रहते हैं तो उनका जी भी धुक-धुक करते रहता है। 'शोले' के बाद रमेश सिप्पी जैसे फ़िल्मकार असफलता के गर्त में चले गए, अब 'शोले' का च्युइंग-गम अपने मुंह में घुमाकर उसी के मज़े ले रहे हैं। जब भी हिट फिल्मों का ज़िक्र होता है तो पुरानी फिल्म 'रतन' से लेकर नई फिल्म 'दंगल' तक सैकड़ों फिल्मों के नाम याद आते हैं लेकिन मेरी नज़र में तीन ऐसी फिल्मों हैं जो केवल हिट नहीं हुई वरन इन फिल्मों ने प्रत्येक आयु-वर्ग के दर्शकों को अपने नज़दीक कई बार बुलाया और कहा- 'बार-बार देखो, हज़ार बार देखो ...' ये थी- 'संगम', 'शोले' और 'हम आपके हैं कौन"। इन तीनों फिल्म के निर्माताओं ने ऐसी सफलता के बारे में कभी नहीं सोचा रहा होगा। सफल फिल्मों के कारकों पर चर्चा करेंगे तो चर्चा लंबी खिंच जाएगी इसलिए वापस लौटते हैं फिल्म 'दंगल' की ओर।
फिल्म 'दंगल' ने यह साबित किया है कि कहानी की पटकथा यदि रोचक हो तो वह दर्शक को पसंद आती है। राजकुमार हीरानी ने अपनी फिल्मों में गंभीर संदेश देने के लिए मनोरंजक घटनाओं को जोड़कर सार्थक शुरुआत की थी, यह फिल्म उसी तरीके से प्रेरित लगती है। किसी 'डाक्यूमेंटरी' फिल्म की तरह इसकी कथा छोटी सी है लेकिन इसका निर्वहन इतनी खूबसूरती से किया गया है कि दर्शक बंधा हुआ सा बैठा रह जाता है। सधी हुई पटकथा, चुटीले संवाद, मज़ेदार गीत, मधुर संगीत और कलाकारों के स्वाभाविक अभिनय के कारण यह फिल्म सबकी पसंद बन गई।
मध्यांतर के पहले के अधिकतर दृश्य गाँव में शूट किये गये हैं। इन दृश्यों में मिट्टी की सोंधी खुशबू का अहसास होता है लेकिन मध्यांतर के बाद जब कहानी शहर की ओर निकलती है तब प्रदूषण की शिकार हो जाती है, यहाँ तक कि कहानी भी प्रदूषित हो जाती है। पहलवान महाबीरसिंह को कमरे में बंद करके मुक़ाबला देखने से वंचित करने का 'आइडिया' किसी बुद्धिहीन की सलाह है, मुझे उम्मीद है कि यह मूर्खता पटकथा लेखक नीतीश तिवारी के दिमाग की उपज नहीं होगी।
दया शोभा कौर की छोटी सी भूमिका में साक्षी तंवर ने आँखों ही आँखों में बहुत कुछ कह दिया। उनकी आँखों की गहराई में मधुबाला की जज़्बाती झलक है और नूतन जैसी निश्छलता। पहलवानी के करतब दिखाने के लिए बाप और बेटियों ने खुद को तैयार करने के लिए जबर्दस्त मेहनत की है, काबिल-ए-तारीफ़ है। फिल्म के गीत और संगीत फिल्म के साथ इस तरह हौले-हौले घुल-मिल गये कि उनका होना पता ही नहीं चलता।
स्त्रियों की शक्ति को शक्ति प्रदान करने का अभूतपूर्व कारनामा है, फिल्म 'दंगल'।
==========
फिल्म : बाजीराव मस्तानी : (२०१७)
---------------------------
158 मिनट का मनोरंजन, 'बाजीराव मस्तानी', निर्माता-निर्देशक-संगीतकार संजय लीला भंसाली का रोचक और मनभावन प्रयास है। संजय भंसाली इस समय के अनोखे फ़िल्मकार हैं जो अपनी फिल्मों को बड़े केनवास में बनाते हैं और अविश्वसनीय भव्यता से जोड़ते हैं।
जो भी मरा नहीं है, उसे धीरे-धीरे बुढ़ापा आता ही है. कई लोग बहुत जल्दी बुढ़ा जाते हैं, तो कुछ शरीर से भले अशक्त हो जाएं लेकिन बुढ़ाते नहीं. जल्दी बुढ़ापे के शिकार वे होते हैं जो अपनी जवानी में लगातार असफलताओं से जूझते रहते हैं, आर्थिक कष्टों से घिरे रहते हैं, घरेलू समस्याओं से त्रस्त रहते हैं, गंभीर बीमारियों से ग्रस्त रहते हैं या स्वभाव से चिड़चिड़े होते हैं. शरीर का शिथिल होना और मन का निराश होना जब एक साथ हो जाए तो बुढ़ापा असहनीय हो जाता है. कुछ भाग्यशाली होते हैं जिनकी घर में पूछ होती है, देखरेख होती है, शेष बूढ़े अपना बोरिया-बिस्तर बांधे हर पल यमदूत की प्रतीक्षा में दरवाजे पर टकटकी लगाए देखते रहते हैं.
दत्तात्रय १०२ वर्ष के जिंदादिल इंसान हैं. उनका दिल जवान है और वे जीवन को मस्ती से जीते हैं. उनका विधुर लड़का बाबूलाल जो ७५ वर्ष का बूढ़ा है, उनसे उल्टा है, कड़क, गंभीर, उसूलों का पक्का. दत्तात्रय का इरादा १६ वर्ष और जीने का है ताकि सबसे अधिक जीने वाले एक चीनी व्यक्ति का रिकार्ड ध्वस्त कर सकें. इसके लिए उन्हें १६ वर्ष और जीवित रहना होगा लेकिन उनके बेटे बाबूलाल की नकारात्मक सोच उन्हें पसंद नहीं है इसलिए वे बाबूलाल को घर से निकालकर वृद्ध आश्रम भेजने का निर्णय लेते हैं. बाबूलाल घर नहीं छोड़ना चाहता क्योंकि वह घर को अपना घर मानता है और अपने घर से बाहर नहीं रह सकता. जब वह विरोध करता है तो उसके पिता उसे घर में बने रहने के लिए कुछ शर्तें पेश करते है जो इस फिल्म की आगे की मनोरंजक कहानी है.
बच्चों की भूल को माफ़ करने की जगह उनको सबक सिखाने का सबक लाजवाब है. जरूरी सन्देश देती हुई कहानी दर्शक के कान में कहती है, 'जब बच्चा 'प्रेक्टिकल' हैं तो तुम क्यों 'इमोशनल' हो रहे हो डैडी ?' कहानी छुपा रहा हूँ ताकि आपके देखने का मज़ा ख़राब न हो. फिल्म के संवाद चुटीले हैं, उन्हें भी उजागर नहीं कर रहा हूँ ताकि आप उनका 'फर्स्ट हैण्ड' आनंद लें.
दत्तात्रय की भूमिका में अमिताभ बच्चन खूब जमे हैं, खास तौर से उनका मकबूल फ़िदा हुसैन जैसा 'मेकप'. बाबूलाल वखारिया के रोल में ऋषि कपूर इस कदर खो गए कि पूरी फिल्म में उस ऋषि कपूर को खोजता रह गया जिसे मैं पिछले ४५ साल से पहचानता हूँ. हर समय अमिताभ पहचाने से लगे और ऋषि कपूर अपरिचित. धीरू की भूमिका में निखिल त्रिवेदी ने स्वयं को स्थापित किया, उनका भविष्य उज्जवल है, लड़का तरक्की करेगा.
==========
जंग जंग होती है, बेमुरव्वत और वाहियात. किसी जान की कोई कीमत नहीं होती. जान दे दी या ले ली. ऐसी जंग आदिम युग से चली आ रही है. कभी जमीन के लिए, कभी मान-सम्मान की रक्षा के लिए. जंग में शामिल लोग सही या गलत नहीं समझते, केवल किसी को मारना या किसी के लिए मर जाना जानते हैं. जंग में केवल वे शामिल नहीं होते जो सामने दिखाई पड़ते हैं, बहुत से ऐसे होते हैं जो परदे के पीछे काम करते हैं लेकिन बेहद खतरनाक परिस्थितियों में अपना काम अंजाम देते हैं, इन्हें गुप्तचर कहते हैं जो दुश्मन की गतिविधियों को गोपनीय रूप से अपने देश तक पहुंचाते हैं.
कश्मीर का एक देशभक्त परिवार अपनी नाजुक सी बेटी को जासूसी के लिए भेज देता है, पाकिस्तान के एक सेनाधिकारी के परिवार में, उनकी बहू बनाकर. शानदार कथानक है, खुद देखिए और उस लडकी के मनोभावों को समझने की कोशिश कीजिए. प्रमुख भूमिका में हिन्दुस्तानी जासूस के रूप में आलिया भट्ट ने अभिनय के नए प्रतिमान स्थापित किए हैं. सलाम आलिया. अन्य भूमिकाओं में विक्की कौशल, जयदीप अहलावत, राजित कपूर, शिशिर शर्मा और निखिल बक्शी ने जबरदस्त काम किया है.
पूरी फिल्म का कथानक पाकिस्तान का है, जबकि शूटिंग भारत में ही हुई है लेकिन ऐसा लगता है, जैसे हम पाकिस्तान में हों. कुछ दृश्य पाकिस्तान-भारत सीमा क्षेत्र के भी हैं जो मनभावन लगते हैं.
फिल्म 'राजी' देशभक्ति का राग अलापने वाली पाखंडी कृति नहीं है, देश के प्रति कर्तव्य निभाने वाली लड़की के दुस्साहस की कथा है. 'राजी' ऐसी फिल्म है जो कई दिनों तक दिमाग से उतरने के लिए राजी नहीं होती.
सृष्टि के सभी जीव दैहिक समागम की इच्छा रखते हैं। शरीर वैज्ञानिकों कहना है कि जब दिमाग में 'हार्मोन्स' का असर होता है तब कामेक्षा स्वयं जागृत होती है। क्या करना, कैसे करना, यह सभी जीव बिना किसी प्रशिक्षण के सीख जाते हैं और सफलतापूर्वक सम्पन्न भी कर लेते हैं, मुझे इस बात पर बहुत आश्चर्य भी होता है। आश्चर्य इसलिए होता है कि विवाह के बाद इसकी तकनीकी समस्या का मैंने सामना किया था और मैं घनघोर मानसिक संकट से होकर गुजरा क्योंकि अनुभवहीनता मनुष्य को लज्जित करने में कोई कसर नहीं छोड़ती। खैर, जल्दी समाधान हो गया लेकिन समागम की क्रिया सदैव चुनौतीपूर्ण रही है, इसके बहुत से प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं क्योंकि इस विषय पर खुल कर चर्चा करना हम भारतीयों के लिए सदैव लज्जा का विषय रहा है। समागम की अजीब समस्याओं से प्रौढ़जनों और वृद्धजनों का भी सामना होता है कि इसे कब तक जारी रखा जाए, कैसे दोनों का उत्साह कायम रहे और किस उम्र तक संतानोत्पत्ति जायज़ है ? फिल्म "बधाई हो" में इस विषय को लेकर मनोरंजक प्रस्तुति देखने को मिली।
फिल्म "बधाई हो" की कहानी पारिवारिक मनोरंजक है, सपरिवार देखी जा सकती है लेकिन मूल विषय सेक्स पर आधारित हमारी सामाजिक सोच है। 'दूसरे क्या सोचेंगे?' की हमारी मानसिकता का गंभीर चिंतन है और चुटीले संवादों के माध्यम से खुलकर हंसने का खुला आमंत्रण है।
जितेंद्र कौशिक रेल्वे में टिकट निरीक्षक है, उनकी पत्नी प्रियंवदा, माँ और दो वयस्क बेटों का 'टिपिकल' मध्यमवर्गी परिवार है। एक रूमानी रात्रि-विहार में प्रियंवदा गर्भवती हो जाती है। बड़े-बड़े बच्चे हैं और उनकी माँ गर्भवती हो, 'लोग क्या कहेंगे' सोचकर पति गर्भपात करवाना चाहता है लेकिन पत्नी बच्चे को जन्म देने के लिए जिद करती है, पत्नी के आग्रह के आगे पति की नहीं चलती और यहीं से फिल्म की कहानी शुरू हो जाती है।
'लोग क्या कहेंगे', यह हम हिंदुस्तानियों की शाश्वत समस्या है। हम संसार में हैं तो अनेक अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों से हमारा सामना होता है। परिवार एक चारदीवारी की तरह होता है जहां सब कुछ होता है लेकिन गोपनीय। घर में धन हो या गरीबी, गोपनीय। आपसी प्रेम हो या अशांति, गोपनीय। स्वस्थ हों या बीमार हों, गोपनीय। ज़िंदगी के मज़े ले रहे हों या भुगत रहे हों, गोपनीय। यहाँ तक कि पति पत्नी के बीच भी बहुत-कुछ गोपनीय रहता है। घर की बात घर के बाहर न जाए, इसके पर्याप्त प्रयास किए जाते हैं लेकिन जब बात बढ़ जाती है तो वह घर की सीमा रेखा को लांघ कर स्वयमेव बाहर आ जाती है।
हमारी ज़िंदगी में हमारे होने का महत्व कम है, दूसरे की राय का महत्व अधिक है। मैं अच्छा हूँ लेकिन यदि मेरे बारे लोगों की राय अच्छी नहीं है तो यह मेरे लिए चिंता का विषय है। मैं भला व्यक्ति नहीं हूँ, दुष्ट हूँ, अत्याचारी हूँ लेकिन यदि मेरे बारे लोगों की राय अच्छी है तो मैं खुश हूँ, चिंता की कोई बात नहीं। आप भी ऐसे अनेक लोगों को जानते हैं जिन्होने अन्यायपूर्वक जीवनयापन किया है, वे धार्मिक और सामाजिक मंचों पर बहुत सक्रिय रहते हैं ताकि लोगों के बीच उनकी छबि अच्छी बनी रहे। मानव स्वभाव की विचित्रता यह है कि स्वयं को अच्छा बनाने की बजाय लोगों की नज़र में अच्छा बनने का प्रयास करता है। इसी मनोविज्ञान की उपज है, 'लोग क्या कहेंगे?'
अधिक उम्र में स्त्री का गर्भवती होना क्या पाप है? कोई अपराध है? फिल्म में माँ साहस दिखाती है, बच्चे को जन्म देने का निर्णय लेती है लेकिन उसकी सास, उसका पति, उसके बच्चे, पास-पड़ोसी, रिश्तेदार और समाज के लोग इस तरह चिंतित हो जाते हैं जैसे कोई राष्ट्रीय आपदा आन पड़ी हो ! ऐसा उपहास करते हैं जैसे प्रौढ़ दंपत्ति ने अनर्थ कर दिया हो। माँ साहस के साथ खड़ी रहती है लेकिन उसके वयस्क बच्चे असहज हो जाते हैं और उनके लिए मुंह छिपाने की स्थिति हो जाती है और वे लोगों के बीच उपहास का पात्र बन जाते हैं।
कथानक महानगरीय जीवन का है इसलिए महानगरों की बातें हैं लेकिन फ़िल्में केवल महानगरों में प्रदर्शित नहीं की जाती, पूरे देश में दिखाई जाती है. यहाँ पर कथानक की कुछ बातों का ज़िक्र जरूरी है.
नायिका रेने (सान्या मल्होत्रा) वैभवशाली परिवार से है, शानदार बंगला है, आधुनिक विचारों वाली उसकी माँ (शीबा चड्ढा) है, जो पति के न होने के बावजूद बिंदास जी रही है लेकिन माँ-बेटी को साथ में शराब पीते हुए बताना ज़रूरी था क्या? कैसे समाज की रचना करवाना चाहते हैं आप लोग? क्या आपको मालूम नहीं कि शराब कितनी हानिकारक है? यह सही किया आपने कि फिल्म शुरू होने के पहले आपने वैधानिक चेतावनी 'लिख' दी कि 'शराब और सिगरेट स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है', क्या इतना ही आपका सामाजिक दायित्व है? क्या आप यह नहीं जानते कि सिनेमा का समाज पर असर कितना व्यापक है? एक चौथाई हिंदुस्तान शराब के नशे में झूम रहा है, क्या शेष लोग भी हो जाएँ, क्या तब आपकी आत्मा को शांति मिलेगी ? कितना अच्छा होता कि 'पीने' को 'ग्लैमराइज़' करने के बदले इसके सेवन से होने वाले नुकसान को कहानी में जोड़ते। और तो और, कहानी में बताया गया कि नायक शराब नहीं पीता लेकिन जब नायक का दिल टूटा तो शराब न पीने का उसका संकल्प भी टूट गया. फिर प्याले में नहीं, पूरी बोतल ही उसके गले से उतरवा दी ! गर्भाधान जांचने व कंडोम का विज्ञापन तो आपने किया, चलेगा, लेकिन 'शराब-सेवन आज की जीवन शैली में सामान्य बात है' बताने का आपका प्रयास नयी पीढ़ी को दिग्भ्रमित करने वाला है.
एक और दृश्य है, नायिका ऑफिस से घर जा रही है, नायक से घर चलने के लिए कहती है, नायक काम की अधिकता के कारण उसे मना करता है लेकिन जब नायिका बताती है कि उसकी मम्मी घर में नहीं है, तो सूनेपन की बात सुनकर नायक फटाफट उसके साथ चल पड़ता है, उसके साथ मार्केटिंग करता है, कंडोम खरीदता है और घर के सूनेपन का दोनों लाभ उठाते हैं. यह ठीक है, 'ओपन सेक्स' अब चलन में आ रहा है लेकिन क्या आम हिन्दुस्तानी की सोच में इतना खुलापन आ गया है कि उसके परिवार की अविवाहित लड़की के साथ कोई सेक्स करे तो वह सहन कर लेगा? फिल्म निर्माण में सामाजिक संकोच और मर्यादा का भी कुछ ध्यान रखो यार.
नायक आयुष्मान खुराना और नायिका सान्या मल्होत्रा का अभिनय औसत है। इन दोनों कलाकारों को भावाभिव्यक्ति का हुनर गजराज राव से सीखना चाहिए। गजराज राव ने जितेंद्र कौशिक की भूमिका में शर्मिंदा पति व आज्ञाकारी पुत्र के रोल को एकदम जीवंत बना दिया है, इस अभिनेता में भविष्य की अनेक संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। गर्भवती प्रियम्वदा की भूमिका में नीना गुप्ता ने अपनी ख्याति के अनुरूप काम किया है। सबसे अधिक प्रभावित किया, छोटे से रोल में, नायक की दादी के रूप में सुरेखा सीकरी ने। केवल सुरेखा सीकरी के प्रभावी अभिनय को देखकर टिकट का पैसा वसूल हो जाता है, गजब का रोल। शीबा चड्ढा, अलका कौशल, अलका अमीन, विमी मेहता, राहुल तिवारी और अमित अपनी छोटी-छोटी भूमिकाओं से न्याय करते हैं। तीन गाने हैं, 'बधाइयाँ तैनूँ', 'मोरनी बन के' और 'नैन न जोड़ें'; ठीक-ठाक हैं। अमित रवीन्द्रनाथ का निर्देशन कसा हुआ है।
========


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें