सिनेमची : दिल की बात :
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फिल्म देखना सरल है लेकिन उसे बनाना बेहद कठिन होता है. फिल्म बनाना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कुछ दिमाग लगते हैं, कुछ कार्यकुशल लगते हैं, कुछ श्रमिक लगते हैं लेकिन उसे देखने के लिए बहुत बड़ी संख्या में दर्शक लगते हैं. दरअसल फ़िल्म दर्शकों के देखने के लिए बनाई जाती है. जो फ़िल्में रिलीज हो जाती हैं, वे तो दर्शकों तक पहुँच जाती हैं लेकिन जो अधूरी रह गयी या जिन्हें वितरक नहीं मिले, वे फ़िल्में डिब्बों में बंद होकर आंसू बहाती रह जाती हैं. अनेक रिलीज फिल्मों को दर्शक नसीब नहीं होते, कुछ ही फ़िल्में हैं जो दर्शकों को पसंद आती हैं और वे ही चर्चित होती हैं. भारत में बनी हिंदी फिल्मों की यह स्थिति वर्षों से चली आ रही है और इसी तरह से चलती रहेगी.
भारत में फिल्म का आगमन यहाँ प्रचलित नाटक, राम एवं कृष्णलीला का सफ़ेद परदे पर अवतरण जैसा था. पहले मूक और बाद में सवाक. पहले धार्मिक फ़िल्में बनी, उसके बाद स्टंट और फिर समाजिक सरोकार की बनने लगी. सिनेमा ने आम जनता पर जादू किया और अपने आगोश में ले लिया. सिनेमाघरों में भीड़ उमड़ने लगी और जन-जन में सिनेमा की चर्चा होने लगी. जिन्होंने देखा वे खुद को भाग्यशाली मानने लगे और जिन्होंने नहीं देखा वे इसे देखने को तरसने लगे. इसके बाद देश के छोटे-छोटे शहरों में सिनेमाघर बनने-खुलने लगे और दर्शकों की संख्या कई गुना बढ़ गयी. बम्बई के अलावा मद्रास और कलकत्ता में भी सीमित तकनीकी साधनों के बावजूद फ़िल्में बनने लगी और एक से बढ़कर एक फ़िल्में बनी. पूरा भारत फिल्मों की पटकथा और उसके संगीत की गिरफ्त में आ गया. टिकट खिड़कियों पर लम्बी कतारें लगने लगी, टिकट पाने के लिए उठा-पटक होने लगी और सिनेमा घरों में 'हाउस फुल' के बोर्ड लगने लगे.
एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि हर भारतीय फिल्म में किसी न किसी तरह से 'रोमांस' का पुट अवश्य रहा है क्योंकि जो आमजन को हासिल नहीं है, वह यदि परदे पर दिखाई दे जाता है तो दर्शक को 'फील गुड' होता है. संभवतः इसीलिए लगभग सभी फिल्मों के कथानक में प्रेमप्रसंग अनिवार्य रूप से पिरोये गए. हंसी-ख़ुशी की घटनाओं के साथ आंसुओं के सैलाब भी बहाए गए. खलनायकी डाली गयी और मारपीट भी. प्रेम, वात्सल्य, ईर्ष्या, घृणा आदि सभी मानवीय भावनाओं को फिल्मों की कहानी में नृत्य और गीतों के साथ पिरोया गया ताकि दर्शकों की साधारणीकरण की क्रिया तीव्र रूप से जागृत किया जा सके.
हर दौर में हर किस्म की फ़िल्में बनती और प्रदर्शित होती रही हैं, कुछ तो घटिया, कुछ मध्यम तो कुछ उत्कृष्ट. इस पुस्तक में एक अध्याय क्लासिक फिल्मों पर है. यहाँ क्लासिक फिल्म का मेरा आशय उस फिल्म से है जो कला और तकनीक की दृष्टि से उत्कृष्ट और अन्य कृतियों की तुलना में श्रेष्ठ हो. बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में बनी फिल्मों को इस कसौटी पर कसा जाए तो अनेक कृतियों के नाम उभर कर आते हैं. इनमें से कुछ तो सर्वकालिक महत्व की है, उन्हें जब देखो, जितनी बार देखो, वे तर-ओ-ताज़ा हैं. सूची बहुत लम्बी है, भेद-मतभेद भी संभव है लेकिन कुछ तो निर्विवाद हैं जैसे मुग़ल-ए-आजम, मदर इण्डिया, दो आँखें बारह हाथ, श्री 420, जागते रहो, गाइड, मेरा नाम जोकर, गंगा जमना, तीसरी कसम, साहब बीबी गुलाम, प्यासा, कागज के फूल, आनंद. इनमें से कई फिल्म ऐसी हैं जो प्रदर्शन के समय दर्शकों को आकर्षित करने में सफल या असफल रही हैं लेकिन आज भी चर्चित हैं.
यह सूची लम्बी है, और बढ़ सकती है क्योंकि हिंदी सिनेमा में अनेक फिल्मकारों ने बेहतरीन काम किया है, शानदार फ़िल्में बनी हैं. इतनी सारी फिल्मों पर लिखना संभव नहीं था, फ़िलहाल कुछ फिल्मों की चर्चा इस पुस्तक 'सिनेमची' में की गयी है, शेष पर चर्चा अगली पुस्तक में होगी. इक्कीसवीं शताब्दी में आई कुछ अच्छी फिल्मों की समीक्षा भी इस कृति में है, इसकी सूची भी लम्बी है लेकिन सीमाबद्ध कारणों से अभी इतनी ही चर्चा हो सकी है.
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