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जनवरी, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्लासिक फिल्म : गंगा जमना

जब कोई कलाकार अपनी अभिनय प्रतिभा से दर्शक के दिल में स्थायी जगह बना ले तो वह यादगार कहानी बन जाती है. दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला को बी.आर.चोपड़ा की फिल्म 'नया दौर' में देखा था लेकिन यह जोड़ी फिल्म 'गंगा जमना' में गज़ब कर गयी. भोले-भाले ग्रामीण गंगा की भूमिका में दिलीपकुमार और उसकी प्रेमिका धन्नो धोबन के रूप में वैजयंतीमाला को भुला पाना असंभव है. गाँव में होने वाली हंसी-ठिठोली से लेकर प्रेम के उच्चतम शिखर तक ले जाने वाली इस रोमांचक कथा को स्वयं दिलीपकुमार ने रचा था. गरीब और अमीरी का जीवन, गरीबी का निबाह और अमीरी का आतंक, कर्तव्य और अपराध के द्वंद्व को फिल्म 'गंगा जमना' में ईस्टमेनकलर में फिल्माया गया था. इसके फिल्मांकन के लिए गाढ़े रंगों को चुना गया जिसने अत्याचार और उसके विरुद्ध संघर्ष को अधिक असरदार बना दिया. एक समय था जब मध्यप्रदेश के चम्बल का इलाका डाकुओं के आतंक से त्रस्त था. इनमें डाकू मानसिंह, तहसीलदार सिंह, सूबेदार सिंह, लुक्का, पन्ना बाई, तुलसी बाई, पानसिंह तोमर, पंचम सिंह, मोहर-माधो, माखन-चिड्डा, बाबा-मुस्तकिल, फूलन-विक्रम, श्रीराम-लालाराम, ददुआ आदि डा...

क्लासिक फिल्म : दो आँखें बारह हाथ :

हिंदी फिल्म निर्माण के सन्दर्भ में जिन फिल्मकारों का नाम शिद्दत से याद किया जाता है, उनमें एक हैं, वी.शांताराम, पूरा नाम, शांताराम राजाराम वणकुद्रे (१९०१-१९९०). मराठी और हिंदी फिल्मों की कतार में उन्होंने सन १९५७ में एक फिल्म बनाई 'दो ऑंखें बारह हाथ' जो हिंदी फिल्म के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गयी. पुणे के पास स्थित औंध रियासत में वहां के प्रगतिशील शासक ने एक आयरिश मनोवैज्ञानिक को जेल में निरुद्ध खतरनाक अपराधियों को खुली जेल में रखकर उन पर प्रयोग करने की सुविधा दी थी. वी.शांताराम ने उसी घटना को अपनी फिल्म 'दो ऑंखें बारह हाथ' का आधार बनाकर पटकथा तैयार की और इस फिल्म का निर्माण किया. मुख्य भूमिका में वे स्वयं थे. उनकी तीसरी पत्नी संध्या, फिल्म की स्त्री-पात्र के रूप में थी. फिल्म का गीत 'ऐ मालिक तेरे बन्दे हम, ऐसे हों हमारे करम, नेकी पर चलें और बड़ी से लड़ें ताकि हंसते हुए निकले दम' आज भी प्रत्येक संस्कार-केंद्र में उच्च स्वर में गाया जाता है और भलाई के रास्ते पर चलने के लिए आज भी सबको प्रेरित करता है. भरत व्यास के भावपूर्ण गीत और वसंत देसाई का मध...

क्लासिक फिल्म : साहिब बीबी और गुलाम

वसंतकुमार शिवशंकर पादुकोण जिसे हम गुरुदत्त कहते हैं, यह उस अद्भुत फिल्मकार का नाम है जिसने 'बाज़ी' (१९५१), 'जाल'(१९५२), 'राज' (१९५३), 'आरपार'(१९५४), 'मिस्टर एंड मिसेज ५५' (१९५५), 'सैलाब (१९५६), 'सी आई डी' (१९५६), 'गौरी' (१९५७), 'प्यासा' (१९५७), 'कागज़ के फूल'(१९५९), 'चौदहवीं का चाँद'(१९६०), 'साहिब बीबी और गुलाम (१९६२) और 'बहारें फिर भी आयेंगी' (१९६६) जैसी फ़िल्में हिंदी फिल्म के दर्शकों को दी. ९ जुलाई १९२५ को जन्मे गुरुदत्त ने मात्र ३९ वर्ष की आयु में जीवन त्याग दिया. मस्तमौला गुरुदत्त ने 'चौदहवीं का चाँद' की अपार सफलता के बाद बिमल मित्र के बांग्ला उपन्यास 'शाहेब बीबी गोलाम' पर फिल्म बनाने की सोची. गुरुदत्त ने बिमल मित्र को कलकत्ता से बम्बई बुलवाया और अपने पुराने सहयोगी अबरार अल्वी के साथ बैठकर फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार की और निर्देशन का भार अबरार अल्वी को सौंपा. उन्नीसवी और बीसवीं शताब्दी में बंगाल की सामन्ती व्यवस्था पर आधारित इस कथा में उनकी अय्याश जीवन शैली का रोचक बयान था...