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क्लासिक फिल्म : साहिब बीबी और गुलाम

वसंतकुमार शिवशंकर पादुकोण जिसे हम गुरुदत्त कहते हैं, यह उस अद्भुत फिल्मकार का नाम है जिसने 'बाज़ी' (१९५१), 'जाल'(१९५२), 'राज' (१९५३), 'आरपार'(१९५४), 'मिस्टर एंड मिसेज ५५' (१९५५), 'सैलाब (१९५६), 'सी आई डी' (१९५६), 'गौरी' (१९५७), 'प्यासा' (१९५७), 'कागज़ के फूल'(१९५९), 'चौदहवीं का चाँद'(१९६०), 'साहिब बीबी और गुलाम (१९६२) और 'बहारें फिर भी आयेंगी' (१९६६) जैसी फ़िल्में हिंदी फिल्म के दर्शकों को दी. ९ जुलाई १९२५ को जन्मे गुरुदत्त ने मात्र ३९ वर्ष की आयु में जीवन त्याग दिया.

मस्तमौला गुरुदत्त ने 'चौदहवीं का चाँद' की अपार सफलता के बाद बिमल मित्र के बांग्ला उपन्यास 'शाहेब बीबी गोलाम' पर फिल्म बनाने की सोची. गुरुदत्त ने बिमल मित्र को कलकत्ता से बम्बई बुलवाया और अपने पुराने सहयोगी अबरार अल्वी के साथ बैठकर फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार की और निर्देशन का भार अबरार अल्वी को सौंपा. उन्नीसवी और बीसवीं शताब्दी में बंगाल की सामन्ती व्यवस्था पर आधारित इस कथा में उनकी अय्याश जीवन शैली का रोचक बयान था. कहानी एक सामंत, उसकी पत्नी और एक नौकर पर केन्द्रित थी.

घरेलू नौकर भूतनाथ के रोल के लिए शशिकपूर का चयन हुआ लेकिन वे व्यस्तता के कारण उपलब्ध न हो सके. शशिकपूर के बाद बिश्वजीत से बात चली लेकिन नहीं बनी तब उस रोल को खुद गुरुदत्त ने किया. ऐसा फिल्म 'प्यासा' में भी हुआ था जब नायक की भूमिका के लिए दिलीपकुमार को साइन किया गया था लेकिन वे शूटिंग के दिन सेट पर आये ही नहीं इसलिए नायक की भूमिका गुरुदत्त को करनी पड़ी. सामंत की पत्नी 'छोटी बहू' के लिए वहीदा रहमान ने कुछ शाट्स दिए लेकिन फोटोग्राफर वी.के.मूर्ति ने राय दी कि छोटी बहू के रोल के लिए जो गंभीरता चाहिए वह कम उम्र वहीदा के चेहरे में उभर कर सामने नहीं आ रही है, तब मीनाकुमारी से संपर्क किया गया. फिल्म की शूटिंग कलकत्ता स्थित 'धन्कुरिया मेंशन' में होने वाली थी, मीनाकुमारी ने शूटिंग के लिए कलकत्ता जाने से इंकार कर दिया, मजबूरन बम्बई के स्टूडियो में ही एक उसी तरह का सेट बनवाया गया जिसमें मीनाकुमारी ने अपने दृश्य फिल्मांकित करवाए. जमींदार की भूमिका में 'चौदहवीं का चाँद' के हिट अभिनेता रहमान को लिया गया. वहीदा को भूतनाथ की प्रेयसी सबा का रोल दिया गया जो सहनायिका का था, इस रोल को वहीदा ने हिचकते हुए स्वीकार किया था क्योंकि वह दरअसल लीड रोल चाहती थी.

'शाहेब बीवी और गोलाम' को बिमल मित्र ने सन १९४० में लिखना शुरू किया था, चौदह वर्ष के अथक परिश्रम के पश्चात यह बांग्ला भाषा में पुस्तक की शक्ल में प्रकाशित हुआ. उपन्यास इतना लोकप्रिय हुआ कि कुछ ही समय में बंगाल के घर-घर में पहुँच गया. बांग्ला भाषा में इस पर फिल्म भी बनी और खूब चली. नाटक भी खेले गये जिसमें भूतनाथ की भूमिका बिश्वजीत निभाते थे. उसी बांग्ला उपन्यास पर बन रही हिंदी फिल्म 'साहिब बीबी और गुलाम' की शूटिंग १ जनवरी १९६१ को शुरू हुई. बिमल मित्र उस दिन को याद करते हैं और लिखते हैं, 'उसी कहानी का नायक, भूतनाथ, मेरी नज़रों के सामने साक्षात हाज़िर था, यह मानो (मेरे) विश्वास के बाहर था. मुझे आज भी याद है कि इस उपन्यास के लिए मुझे अकथनीय निंदा और कल्पनातीत प्रशंसा नसीब हुई थी. अचरज से मुंह बाए, मैं गुरुदत्त की तरफ एकटक देख रहा था.'

बात तब की है जब फिल्म 'कागज़ के फूल' की आरंभिक तैयारी चल रही थी. संगीत दे रहे थे, एस.डी. बर्मन. बर्मन दा के साथ साहिर लुधियानवी की जोड़ी ने एक-से-बढ़कर-एक गीत दी थे, उनकी ट्यूनिंग बहुत अच्छी थी लेकिन उन्होंने साहिर के साथ काम करने के लिए इंकार कर दिया. कारण यह था कि साहिर ने शर्त रखी थी कि वे अपने गीतों के लिए एस.डी. बर्मन से 'एक रूपया' अधिक पारिश्रमिक लेंगे. बर्मन दा का स्वाभिमान चोट खा गया और गुरुदत्त से कहा कि वे साहिर के साथ काम नहीं करेंगे, अपमान नहीं सहेंगे. उसके बदले किसी और को लाओ तब कैफ़ी आज़मी को बुलाया गया और 'वक्त ने किया क्या हसीं सितम, तुम रहे न तुम, हम रहे न हम' और 'देखी ज़माने की यारी, बिछड़े सभी बारी बारी' जैसे यादगार गीत तैयार हुए.

फिल्म 'साहिब बीबी गुलाम' में भी गुरुदत्त एस.डी. बर्मन और साहिर की जोड़ी को फिर से चाहते थे लेकिन बात नहीं बनी क्योंकि सचिन दा की तबीयत खराब हो गयी थी और साहिर ने इस फिल्म के गीत लिखने से इंकार कर दिया. इस फिल्म में संगीत दिया हेमंतकुमार ने और गीत लिखे थे शकील बदायूँनी ने. यह अपूर्व संयोग उन सात गीतों की श्रृंखला को लेकर आया जिन्हें लोग आज भी गुनगुनाते है.

वैसे आठ गीत थे फिल्म में लेकिन एक गीत 'साहिल की तरफ कश्ती ले चल', जिसे हेमंत कुमार ने गाया था, को फिल्म रिलीज होने के बाद काट दिया गया था क्योंकि दर्शकों में उस दृश्य की प्रतिकूल प्रतिक्रिया हुई थी क्योंकि फिल्म के अंत में जब यह गीत नेपथ्य में बज रहा था, छोटी बहू अपने घरेलू नौकर भूतनाथ की गोद में अपना सिर रखे हुए थी. यह उस समय के दर्शकों ने पसंद नहीं किया. परिणामस्वरूप उस गीत के स्थान पर अबरार अल्वी ने कुछ संवाद लिखे और उस दृश्य को 'रीशूट' किया गया. बाद में इसी धुन का उपयोग फिल्म 'अनुपमा' में किया गया, गीत के बोल थे, 'या दिल की सुनो दुनिया वालों, या मुझको अभी चुप रहने दो, मैं गम को ख़ुशी कैसे कह दूं, जो कहते हैं उनको कहने दो'.

'साहिब बीबी और गुलाम' के गीत बेहद अर्थपूर्ण, कर्णप्रिय और मदमस्त थे. फिल्म के आरम्भ में गीता दत्त का गूंजता स्वर 'कोई दूर से आवाज़ दे चले आओ' जब उभरता है तो ऐसा लगता है जैसे कोई दसों दिशाओं से कोई आपको पुकार कर अपने पास बुला रहा हो. 'न जाओ सैंया, छुड़ा के बैंया, कसम तुम्हारी मैं रो पडूँगी' और 'पिया ऐसो जिया में समय गयो रे, कि मैं तन-मन की सुध बुध भुला बैठी', इन दोनों गीतों में मीनाकुमारी ने अभिनय के ऐसे शिखर को छुआ कि छोटी बहू का पात्र और गीता दत्त की आवाज़, दोनों गुम हो गए, केवल मीनाकुमारी का चेहरा स्मृति-कोष में संचित रह गया. 'भंवरा बड़ा नादान है' और 'मेरी बात रही मेरे मन में', इन दोनों गीतों को वहीदा रहमान पर फिल्माया गया, आशा भोसले ने अपनी अल्हड़ आवाज में इन्हें गाया था जो आज भी श्रोताओं मन मोहता है. 'मेरी जां, ओ मेरी जां, अच्छा नहीं इतना सितम' और 'साकिया आज मुझे नींद नहीं आएगी', ये दोनों गीत मुज़रे के दृश्य के लिए तैयार किए गए थे, आशा भोसले की खनकती आवाज़ में थे.

'साकिया आज मुझे नींद नहीं आएगी' वाले दृश्य में गुरु दत्त ने फोटोग्राफर वी.के. मूर्ति को निर्देश दिया कि नर्तकी मीनू मुमताज़ अन्य नर्तकियों के साथ नृत्य करेगी लेकिन रोशनी सिर्फ मीनू मुमताज़ के शरीर पर होगी, अन्य नर्तकियों के शरीर छाया की तरह काले दिखने चाहिये. फोटोग्राफर वी.के. मूर्ति ने वह कमाल अपनी फोटोग्राफी में कर दिखाया. बताने लायक बात यह है कि फिल्म 'साहिब बीबी और गुलाम' का निर्देशन यद्यपि अबरार अल्वी ने किया था लेकिन सभी गानों की शूटिंग गुरुदत्त के निर्देशन में हुई थी.

बिमल मित्र ने 'बिछड़े सभी बारी बारी' में लिखा है, 'सुविनय बाबू के घर का दृश्य फिल्माया गया, उसके बाद लंच हो गया.
(भोजन के समय) गीतादत्त के चेहरे का भाव देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा. वहीदा और गीता को एक ही मेज पर देखकर मुझे बहुत भला लगा. मैंने गौर किया कि दोनों में काफी सद्भाव था. वहीदा रहमान गीत दत्त को 'गीता जी' कहकर संबोधित कर रही थी; गीता भी वहीदा को 'वहीदा जी' कहकर बातें कर रही थी. दोनों को आपस में बातें करते देखकर मुझे ऐसा लगा मानो वे दोनों एक ही परिवार की दो बहनें हैं.'
'खाने के बाद शूटिंग की घंटी बज उठी. गुरुदत्त और वहीदा स्टूडियो में चले गये. मैं और गीता वहीँ रह गये. मैंने पूछा, "आपको शूटिंग कैसी लग रही है?"
"अच्छी लगी. किसी दिन मैंने ही इस फिल्म को बनाने के लिए मना किया था.''
"क्यों?"
"क्योंकि 'साहिब बीबी और गुलाम' हमारी ही ज़िन्दगी की कहानी है."
"यह आप क्या कह रही हैं?"
"मैंने उनसे पूछा भी था, 'आप इस फिल्म को क्यों बना रहे हैं?' सिर्फ मैं ही नहीं, बहुत से लोग इस फिल्म के लिए उन्हें मना करते रहे." गीता दत्त ने बताया.'

सबने मना किया लेकिन गुरुदत्त को  'साहिब बीबी और गुलाम' बनाने के लिए धुन सवार हो गयी थी, इस फिल्म को बनाने की. समस्या यह थी कि फिल्म 'चौदहवी का चाँद' अपने अंतिम चरण में थी, उसे रिलीज करना था. वे 'कागज़ के फूल' की असफलता से आर्थिक कष्ट में थे और बचा-खुचा 'चौदहवी का चाँद' में विनियोजित हो गया था. पैसे की बहुत तंगी थी लेकिन इन सबसे ऊपर गुरुदत्त की जिद थी.
इस बीच 'चौदहवी का चाँद' रिलीज हो गयी और गुरुदत्त की आलमारियाँ नोट की गड्डियों से भर गयी, 'चौदहवी का चाँद' सुपर हिट हो गयी थी और 'साहिब बीबी और गुलाम' के सहज निर्माण का रास्ता खुल गया. गुरुदत्त के उसी जुनूनी पागलपन का नमूना है 'साहिब बीबी और गुलाम'.

'साहिब बीबी और गुलाम' की कहानी बीसवी शताब्दी के सामंती रहन-सहन से जुड़ी थी जहाँ ऐश्वर्य था, अहंकार था और उनका भसकता हुआ साम्राज्य लेकिन ठसक जस-की तस.
अधेड़ उम्र का अतुल चक्रवर्ती उर्फ़ भूतनाथ जो कि वास्तुकार है, अपने मातहतों के साथ एक हवेली के खंडहरों को गिराकर नयी इमारत का निर्माण करवा रहा है. उस हवेली को देखकर उसे अपने पुराने दिनों की याद आ जाती है. फिल्म फ्लैशबेक में चली जाती है. भूतनाथ अपने गाँव से नौकरी की तलाश में अपने रिश्तेदार के यहाँ कलकत्ता आता है और एक हवेली के अन्य मुलाजिमों के साथ रहता है. यह हवेली शहर के नामी चौधरी खानदान की है जिसमें तीन भाई रहते हैं, बड़े बाबू, मंझले बाबू और छोटे बाबू. भूतनाथ को यह देखकर आश्चर्य होता है कि रोज रात को मंझले बाबू घर में तवायफों की महफ़िल जमाते हैं और छोटे बाबू एक बग्घी में बैठकर किसी तवायफ के घर चले जाते हैं. भूतनाथ को सुबिनय बाबू के 'मोहिनी सिन्दूर' बनाने के कारखाने में नौकरी मिल जाती है. एक दिन सुबिनय बाबू उसे एक विज्ञापन पढने के लिए देते हैं जिसमें यह दावा किया गया था कि उनके द्वारा निर्मित मोहिनी सिन्दूर को जो स्त्री अपने मांग में भरती है, उसका पति उसके वश में हो जाता है. 
एक रात छोटे बाबू का नौकर बंशी भूतनाथ को कहता है कि छोटी बहू उसे बुला रही हैं. भूतनाथ डरते-डरते वहां जाता है. छोटी बहू भूतनाथ को एक डिब्बी देती है और कहती है कि वह उसमें वही 'मोहिनी सिन्दूर' भर कर ला दे ताकि वह अपने पति को वश में कर सके. भूतनाथ सुबिनय बाबू से सिन्दूर के प्रभाव की सत्यता जानने की कोशिश करता है लेकिन सुबिनय बाबू बात को टाल देते हैं. भूतनाथ फिर भी डिब्बी में सिन्दूर भरकर छोटी बहू को दे देता है. इस बीच सुबिनय बाबू की लड़की जबा और भूतनाथ के बीच प्रेम पनपने लगता है. 
छोटी बहू को मोहिनी सिन्दूर लगाने से कोई लाभ न हुआ. एक रात जब छोटी बहू ने अपने पति से अपनी उपेक्षा का कारण पूछा तो छोटे बाबू ने उससे कहा कि यदि वह तवायफों की तरह व्यवहार करे, साथ में शराब पिए तो वह घर में रुकने के लिए तैयार हो जाएगा. छोटी बहू अपने पति की बात मानकर वैसा ही करने लगती है लेकिन यह सिलसिला कम समय तक चल पाया, छोटे बाबू फिर से तवायफ के कोठे में जाने लगे. 
भूतनाथ किसी आर्किटेक्ट के साथ काम करने लगता है और उसका संपर्क बहुत समय के लिए छोटी बहू और सबा से टूट जाता है. कई दिनों बाद जब भूतनाथ हवेली वापस आता है तब उसे मालूम पड़ता है कि छोटे बाबू बिस्तर पर अपंग होकर पड़े हैं और छोटी बहू को शराब पीने की लत लग गयी है. अपने पति को स्वस्थ करने की इच्छा से छोटी बहू भूतनाथ के साथ बग्घी में किसी सिद्ध पुरुष के आश्रम के लिए निकलते है लेकिन मंझले बाबू को छोटी बहू पर शक हो जाता है इसलिए वह अपने गुर्गों से भूतनाथ को पिटवा कर बुरी तरह घायल कर देता है. उसके बाद छोटी बहू लापता हो जाती है.
फिल्म फ्लेशबेक से वापस वर्तमान में आती है. भूतनाथ उसी हवेली में नवनिर्माण के लिए काम करवा रहा है. अचानक एक मजदूर आकर बताता है कि खुदाई के दौरान उसे एक नरकंकाल मिला है. भूतनाथ वहां जाकर उस नरकंकाल को देखता है. नरकंकाल के हाथों में वही सोने का कंगन था जो छोटी बहू पहनती थी. भूतनाथ दुखी मन से उस हवेली के खंडहर से बाहर निकल आता है उस बग्घी में अपनी पत्नी जबा के साथ बैठ कर चला जाता है. फिल्म ख़त्म हो जाती है. 

अगर उपन्यास को पढ़ा जाए तो उसमें तत्कालीन बंगाल का वृहद् इतिहास, भूगोल और सामाजिक परिस्थितियों का वर्णन है और मानवीय व्यवहार का गंभीर विवेचन भी. उस वृहद कथानक को एक चलचित्र की सीमा में समेटना असंभव था. उपन्यास इतना रोचक है कि पढ़ते समय हाथ से छूटता नहीं और पाठक को अन्दर तक हिला देता है. मूल कथानक के उन कुछ अंशों को पटकथा के रूप में तैयार किया गया जिसके माध्यम से उस समय के सामंती परिवारों के रहन-सहन और रीति-रिवाज़ को आधार बनाकर स्त्री-उपेक्षिता के दर्द को उकेरा जा सके. 

छोटी बहू सौंदर्य की प्रतिमा है, ऐश्वर्यशाली है, सद्चरित्र है लेकिन अपने पथच्युत पति की उपेक्षा से दुखी है. वह कामातुर नहीं है, केवल पति का अनवरत साथ चाहती है, उसे अपने घर और खुद से जोड़कर रखना चाहती है. पति तवायफों के चक्कर में शराब और परस्त्रीगमन का आदी हो चुका है और उनकी गिरफ्त में जकड़ा हुआ है. पत्नी के पास सुन्दरता है लेकिन वह अदाएं नहीं है जो बाजारू तवायफ को सिद्ध होती हैं. अपने पति का साथ पाने के लिए वह अपने तौर-तरीके बदलने का प्रयास करती है, खुद शराब पीती है और उसे पिलाती है लेकिन दुश्चरित्र पति फिर से गलत रास्ते में मुड़ जाता है और अपनी सुसंस्कृत पत्नी को शराब का आदी बना देता है. दुखी छोटी बहू शराब के नशे को अपना दुःख दूर करने का माध्यम बना लेती है. 

मीनाकुमारी ने अपने अभिनय से छोटी बहू के पात्र को इतनी सजीवता से जिया कि 'साहिब बीबी गुलाम' को अपने कंधे पर रख कर अकेले चल पड़ी. सभी कलाकारों ने लाजवाब अभिनय किया लेकिन जब भी 'साहिब बीबी गुलाम' का ज़िक्र होता है तो 'न जाओ सैंया, छुड़ा के बैंय्या, कसम तुम्हारी मैं रो पडूँगी' वाला दृश्य हर दर्शक के मष्तिष्क में अनायास तैरने लगता है. ऐसा लगता है कि छोटी बहू ऐसी ही सुकोमल रही होगी, वैसी ही सुन्दर रही होगी, इतनी ही दयालु रही होगी और इतने ही दर्द से सराबोर रही होगी. 

मीनाकुमारी ने कई फिल्मों में शानदार अभिनय किया लेकिन 'साहिब बीबी गुलाम' का अभिनय उनकी अभिनय कला का सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शन था, वैसा ही जैसा नर्गिस ने 'मदर इण्डिया' में किया था या 'मुग़ल-ए-आज़म' में मधुबाला ने निभाया था. अन्जाने में, यह फिल्म मीनाकुमारी की फिल्म बन गयी, बिमल मित्र की छोटी बहू जैसे परदे पर साकार हो उठी. 

आश्चर्य की बात यह है कि छोटी बहू के रोल के लिए गुरु दत्त ने मशहूर छायाकार जीतेन्द्र आर्य की पत्नी छाया आर्य का चयन किया गया था जो उस समय अपने पति के साथ इंग्लैण्ड में रहती थी. वे फिल्म की शूटिंग के लिए भारत आयी. उनके फोटोग्राफ्स लिए गए लेकिन उनका चेहरा छोटी बहू के मनोभाव व्यक्त करने के लिए उपयुक्त नहीं लगा क्योंकि चेहरे के अनुपात से उनका जबड़ा कुछ ज्यादा उभरा हुआ लग रहा था. गुरु दत्त चाहते थे कि छोटी बहू सुन्दर और चंचल तो हो ही, साथ ही उसके व्यक्तित्व में विनय और ममता का संगम भी हो.  

फिर, अगले विकल्प के रूप में मीनाकुमारी से संपर्क किया गया. मीनाकुमारी को फिल्म में काम करने के लिए तैयार करना बहुत कठिन था क्योंकि वे अपने पति कमाल अमरोही की गिरफ्त में थी और कमाल चाहते थे कि मीना उनके अलावा किसी और की फिल्म में काम न करे. निर्देशक अबरार आल्वी ने फिल्म की स्क्रिप्ट और संवाद के टेप चुपके से मीनाकुमारी को दिए और उनकी सहमति का इंतज़ार करने लगे. मीनाकुमारी स्क्रिप्ट सुनते ही छोटी बहू की रूह में समा गई और फिल्म में काम करने के लिए राज़ी हो गयी. कमाल अमरोही को समझाने की ज़िम्मेदारी उन्होंने अपने ऊपर ले ली. इस प्रकार मीनाकुमारी का छोटी बहू के रोल के लिए पदार्पण हुआ. 

फिल्म के अन्य दृश्यों की शूटिंग कलकत्ता में चलती रही,  लेकिन मीनाकुमारी एक साल बाद बम्बई में खासतौर से उनके लिए बनाए गए सेट पर आयी और लगातार शूटिंग में भाग लिया. गंभीर दृश्यों की शूटिंग के समय केवल ज़रुरत के लोग उनके आसपास होते, अन्य किसी को भी अनुमति नहीं थी, यहाँ तक कि फिल्म के निर्माता गुरु दत्त भी आसपास नहीं होते थे. एक दृश्य में छोटी बहू को अत्यंत दुखी होकर रोते हुए धड़ाम से नीचे गिरना था, मीनाकुमारी ने स्वाभाविक ढंग से गिरकर उस दृश्य को अभिनीत किया. सीन उम्दा रहा. वे छोटी बहू की आत्मा में इस कदर समा गयी थी कि सीन समाप्त होने के बाद भी उनकी आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बहती रही. वहां उपस्थित लोगों ने उन्हें सांत्वना दी लेकिन वे रोती रही, बामुश्किल वे छोटी बहू की आत्मा से निकल कर सामान्य हो सकी. मीनाकुमारी ने अपनी निजी डायरी में लिखा, 'मुझसे छोटी बहू का दुःख अब और नहीं सहा जाता.' 

फिल्म में कैमरा अधिकतर छोटी बहू (मीनाकुमारी) और भूतनाथ (गुरु दत्त) पर केन्द्रित था. जबा (वहीदा) और छोटे बाबू (रहमान) पर उनसे कम; मंझले बाबू (सप्रू), बड़ी बहू, घरेलू नौकरों और घड़ीसाज (हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय) पर उससे कम. रोल छोटा रहा हो, या बड़ा, हर पात्र कहानी को बढ़ाने और उसका प्रभाव उत्पन्न करने के लिए मुफीद था. भूतनाथ का रोल चुनौती पूर्ण था, एक भोलेभाले ग्रामीण का. बात शशिकपूर से चल रही थी, अचानक गुरु दत्त ने घोषणा की कि इस रोल को वे स्वयं करेंगे. दरअसल यह घोषणा गुरु दत्त की पत्नी गीता दत्त की सलाह थी. गुरु दत्त इस फिल्म के पहले भी 'प्यासा', 'कागज़ के फूल' और 'चौदहवी का चाँद' में नायक की सफल भूमिका निभा चुके थे. उनके खुद काम करने से फिल्म का बजट कम हो गया और एक सुस्थापित हीरो का इंतज़ार करने में बर्बाद होने वाला समय भी बच गया. 

गुरुदत्त के चेहरे पर बारीक सी मूंछ स्थायी रूप से रहती थी, निर्देशक अबरार आल्वी ने उनसे कहा, 'नायक एक भोलाभाला घबराया सा देहाती है जिसमें आत्मविश्वास की कमी है. आपका उसके जैसा जैसा दिखना आवश्यक है. आपकी मूंछ आपके चेहरे को एक अलग गरिमा देती हैं. अगर आपको एक देहाती, डगमगाते विश्वास वाले पात्र की भूमिका सार्थकता से निभानी है तो अपनी मूंछ साफ़ करनी होगी.' चूँकि मूंछ भूतनाथ के भोलेपन की राह में बाधक बन रही थी, गुरु दत्त ने अपनी मूंछ मुंडवा ली, वे मूंछ जो अब तक उनकी पहचान थी, फिर उन्होंने कभी नहीं रखी. 

फिल्म का एक दृश्य था, छोटी बहू अपने विश्वस्त नौकर के माध्यम से भूतनाथ को अपने कमरे में बुलाती है. सिमटा, सकुचाया सा भूतनाथ, हवेली की भव्यता से सहमा, भयभीत क़दमों से छोटी बहू के कमरे में प्रवेश करता है और उसके समक्ष गाँव के किसी भोलेभाले इंसान की तरह जमीन पर बैठ जाता है. भूतनाथ की आँखें सामने बैठी छोटी बहू के चरणों पर केन्द्रित होती है. छोटी बहू का मखमली स्वर उससे पूछता है, 'क्या नाम है तुम्हारा?'
'भूतनाथ.' उसने बताया. 
जिस नाम को सुनकर लोग हंसते थे, अचरज करते थे, वह मधुर स्वर कहता है, 'बड़ा अच्छा नाम है!'
अपने नाम की प्रशंसा सुनकर भूतनाथ आश्चर्यचकित हो जाता है और उसका संकोच दूर हो जाता है. वह अपनी नज़रें उठाकर छोटी बहू की ओर देखता है और उसकी सुंदरता देखता ही रह जाता है. उस दृश्य में तमाम तामझाम के बीच एक बिछा हुआ खाली पलंग था जो छोटी बहू के जीवन का प्रतीक जैसा था. 

शाट पूरा हो गया. अगले दिन जब शूट की गयी कच्ची रील आयी तो उसे देखकर अबरार आल्वी का चेहरा फक हो गया. गुरु दत्त ने पूछा, 'क्या हो गया? इतने उदास क्यों हो?'
'आपने इतना बढ़िया अभिनय किया है कि आप छोटी बहू की सुन्दरता में आप वैसे ही खो गये जैसे कोई पुरुष किसी अत्यंत सुन्दर नारी के रूप में खो जाता है.'
'तो, इसमें आपत्ति क्या है?
'दर्शक यह चाहेगा कि छोटी बहू सुन्दरता से इतनी ओतप्रोत हो कि उसे जो देखे, देखता ही रह जाए लेकिन मीनाकुमारी सुन्दर नहीं, भद्दी दिख रही हैं.' अबरार ने कहा. गुरु दत्त इस बात को सुनकर अवाक् रह गये. 'मीनाकुमारी और भद्दी?'
कच्ची रीलें देखने के बाद उन्होंने कहा, 'तुम सच कह रहे हो अबरार, कुछ तो गड़बड़ है. चलो, देखता हूँ कि क्या किया जा सकता है.' गुरु दत्त ने कहा. 
गुरुदत्त को फोटोग्राफी का अच्छी जानकारी थी, वे कैमरों के पुर्जे-पुर्जे से वाकिफ थे, और किसी कैमरे को फटाफट खोलकर सुधार देना उनके बाएँ हाथ का खेल था. वे फोटोग्राफी से सम्बंधित किताबों में डूब कर कैमरा का दोष को खोजने में भिड़ गये. गड़बड़ी क्लोज-अप कैमरे के लेंस चयन में थी. उस दृश्य को सही लेंस लगाकर फिर से शूट किया गया. तब जाकर छोटी बहू की सुन्दरता मीनाकुमारी के चेहरे पर वैसी उतरी जैसी दर्शक देखना चाहते थे. 

रहमान ने छोटे बाबू का अभिनय अपने निराले अंदाज़ में किया, वे सच में किसी अय्याश और बिगड़े-दिल ज़मींदार की तरह पूरी फिल्म में हावी रहे. दर्शकों के मन में वे छोटी बहू को नाहक दुःख देने वाले खलनायक की तरह उभरने में कामयाब रहे. मंझले बाबू की भूमिका में सप्रू ने अपनी भावाभिव्यक्ति और खनकदार आवाज़ का कामयाब उपयोग किया. वे संवाद बोलते समय साँसों के उतार-चढ़ाव का उपयोग करते थे ताकि संवाद का त्वरित प्रभाव उत्पन्न हो. फिल्म में उनका रोल हवेली के मालिक का था, रोब-दाब वाले मालिक का, जिसे उन्होंने बहुत कम शब्दों में निभाया क्योंकि उनके राजसी व्यक्तित्व में कम बोलना अधिक असर पैदा करता था. जब वे छोटी बहू को मौत के घाट पर उतारने का फैसला लेते हैं तब जल्लाद जैसे दिखने वाला उनका चेला कहता है, 'हथियारों में जंग लग गया है, सरकार.' तब सप्रू अपनी अंगूठी उतारकर उसे दे देते हैं जो छोटी बहू की हत्या कर देने का सांकेतिक मूक आदेश था. उस दृश्य को देखकर डर की अनुभूति होने लगती है. 

वहीदा रहमान के जिम्मे जितना रोल था, उन्होंने सादगी से निभाया. दो गाने, 'भंवरा बड़ा नादान है' और 'मेरी बात रही मेरे मन में', शायद वहीदा की उपस्थिति के लिए जोड़े गए थे, मधुर और दर्शनीय थे. उनकी जैसी अद्भुत अदाकारा के लिए जबा का पात्र बहुत छोटा था. कौन जानता है कि यदि उन्हें छोटी बहू का रोल मिला होता, तो वे क्या कमाल कर दिखाती?

फिल्म के असली हीरो थे, फोटोग्राफर वी.के.मूर्ति जिन्होंने उत्कृष्ट फोटोग्राफी के माध्यम से बिमल मित्र के उपन्यास को चलती-फिरती सजीव जैसी छाया में अवतरित कर दिया. वे गुस्सैल व्यक्ति थे, निर्देशक का दखल पसंद नहीं करते थे लेकिन निर्देशक उनकी बात इस कान से सुनते थे, उस कान से निकाल देते और अपनी मर्जी का काम उनसे करवा लेते थे. मूल रूप में ब्लेक-एंड-व्हाइट में बनी इस फिल्म में मीनाकुमारी की ख़ूबसूरती को उभारना और अँधेरे के माध्यम से छोटी बहू की पीड़ा को अर्थ देना, उनके जैसा सिद्ध फोटोग्राफर ही कर सकता था. 

एस.डी.बर्मन के स्थान पर ऐसे संगीतकार की ज़रुरत थी जो बंगाल के संगीत की समझ रखता हो और गुणी भी हो. हेमंतकुमार मुखोपाध्याय को संगीत देने के लिए चुना गया. चयन सही सिद्ध हुआ, उन्होंने अत्यंत कर्णप्रिय संगीत का संयोजन किया. फिल्म के सभी गीत आज भी आकर्षित करते हैं और उन गीतों को बार-बार सुनने का दिल करता है. पार्श्व संगीत भी उच्च-स्तरीय है, कथानक की विचित्र घटनाओं को संगीत के माध्यम से व्यक्त करने में समर्थ है.

साहिर की जगह शकील बदायूँनी ने गीत लिखे. शकील ने कथानक को गीतों में व्यक्त करने का अनोखा कारनामा कर दिखाया. हर गीत कथानक के उल्लास और पीड़ा को शब्द देकर गहरे से छू गया. 

'साहिब बीबी और गुलाम' एक समग्र फिल्म की तरह हिंदी सिनेमा में याद की जाती है, यह हर दृष्टि से 'क्लासिक' फिल्म थी, अभिनय, निर्देशन, छायांकन, गीत, संगीत, नृत्य, संवाद और संवादों की अदायगी, सब कुछ दोषरहित और निष्कलंक है. 

फिल्म 'साहिब बीबी और गुलाम' हिन्दी सिनेमा की यादगार कृति के रूप में सदा स्थापित रहेगी. 

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हिंदी फिल्म निर्माण के सन्दर्भ में जिन फिल्मकारों का नाम शिद्दत से याद किया जाता है, उनमें एक हैं, वी.शांताराम, पूरा नाम, शांताराम राजाराम वणकुद्रे (१९०१-१९९०). मराठी और हिंदी फिल्मों की कतार में उन्होंने सन १९५७ में एक फिल्म बनाई 'दो ऑंखें बारह हाथ' जो हिंदी फिल्म के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गयी. पुणे के पास स्थित औंध रियासत में वहां के प्रगतिशील शासक ने एक आयरिश मनोवैज्ञानिक को जेल में निरुद्ध खतरनाक अपराधियों को खुली जेल में रखकर उन पर प्रयोग करने की सुविधा दी थी. वी.शांताराम ने उसी घटना को अपनी फिल्म 'दो ऑंखें बारह हाथ' का आधार बनाकर पटकथा तैयार की और इस फिल्म का निर्माण किया. मुख्य भूमिका में वे स्वयं थे. उनकी तीसरी पत्नी संध्या, फिल्म की स्त्री-पात्र के रूप में थी. फिल्म का गीत 'ऐ मालिक तेरे बन्दे हम, ऐसे हों हमारे करम, नेकी पर चलें और बड़ी से लड़ें ताकि हंसते हुए निकले दम' आज भी प्रत्येक संस्कार-केंद्र में उच्च स्वर में गाया जाता है और भलाई के रास्ते पर चलने के लिए आज भी सबको प्रेरित करता है. भरत व्यास के भावपूर्ण गीत और वसंत देसाई का मध...

सिनेमची : दिल की बात

सिनेमची : दिल की बात : =============== फिल्म देखना सरल है लेकिन उसे बनाना बेहद कठिन होता है. फिल्म बनाना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कुछ दिमाग लगते हैं, कुछ कार्यकुशल लगते हैं, कुछ श्रमिक लगते हैं लेकिन उसे देखने के लिए बहुत बड़ी संख्या में दर्शक लगते हैं. दरअसल फ़िल्म दर्शकों के देखने के लिए बनाई जाती है. जो फ़िल्में रिलीज हो जाती हैं, वे तो दर्शकों तक पहुँच जाती हैं लेकिन जो अधूरी रह गयी या जिन्हें वितरक नहीं मिले, वे फ़िल्में डिब्बों में बंद होकर आंसू बहाती रह जाती हैं. अनेक रिलीज फिल्मों को दर्शक नसीब नहीं होते, कुछ ही फ़िल्में हैं जो दर्शकों को पसंद आती हैं और वे ही चर्चित होती हैं. भारत में बनी हिंदी फिल्मों की यह स्थिति वर्षों से चली आ रही है और इसी तरह से चलती रहेगी.   भारत में फिल्म का आगमन यहाँ प्रचलित नाटक, राम एवं कृष्णलीला का सफ़ेद परदे पर अवतरण जैसा था. पहले मूक और बाद में सवाक. पहले धार्मिक फ़िल्में बनी, उसके बाद स्टंट और फिर समाजिक सरोकार की बनने लगी. सिनेमा ने आम जनता पर जादू किया और अपने आगोश में ले लिया. सिनेमाघरों में भीड़ उमड़ने लगी और जन-जन में सिनेमा की चर्चा होने...

क्लासिक फिल्म : गंगा जमना

जब कोई कलाकार अपनी अभिनय प्रतिभा से दर्शक के दिल में स्थायी जगह बना ले तो वह यादगार कहानी बन जाती है. दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला को बी.आर.चोपड़ा की फिल्म 'नया दौर' में देखा था लेकिन यह जोड़ी फिल्म 'गंगा जमना' में गज़ब कर गयी. भोले-भाले ग्रामीण गंगा की भूमिका में दिलीपकुमार और उसकी प्रेमिका धन्नो धोबन के रूप में वैजयंतीमाला को भुला पाना असंभव है. गाँव में होने वाली हंसी-ठिठोली से लेकर प्रेम के उच्चतम शिखर तक ले जाने वाली इस रोमांचक कथा को स्वयं दिलीपकुमार ने रचा था. गरीब और अमीरी का जीवन, गरीबी का निबाह और अमीरी का आतंक, कर्तव्य और अपराध के द्वंद्व को फिल्म 'गंगा जमना' में ईस्टमेनकलर में फिल्माया गया था. इसके फिल्मांकन के लिए गाढ़े रंगों को चुना गया जिसने अत्याचार और उसके विरुद्ध संघर्ष को अधिक असरदार बना दिया. एक समय था जब मध्यप्रदेश के चम्बल का इलाका डाकुओं के आतंक से त्रस्त था. इनमें डाकू मानसिंह, तहसीलदार सिंह, सूबेदार सिंह, लुक्का, पन्ना बाई, तुलसी बाई, पानसिंह तोमर, पंचम सिंह, मोहर-माधो, माखन-चिड्डा, बाबा-मुस्तकिल, फूलन-विक्रम, श्रीराम-लालाराम, ददुआ आदि डा...