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नवंबर, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सिनेमची : दिल की बात

सिनेमची : दिल की बात : =============== फिल्म देखना सरल है लेकिन उसे बनाना बेहद कठिन होता है. फिल्म बनाना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कुछ दिमाग लगते हैं, कुछ कार्यकुशल लगते हैं, कुछ श्रमिक लगते हैं लेकिन उसे देखने के लिए बहुत बड़ी संख्या में दर्शक लगते हैं. दरअसल फ़िल्म दर्शकों के देखने के लिए बनाई जाती है. जो फ़िल्में रिलीज हो जाती हैं, वे तो दर्शकों तक पहुँच जाती हैं लेकिन जो अधूरी रह गयी या जिन्हें वितरक नहीं मिले, वे फ़िल्में डिब्बों में बंद होकर आंसू बहाती रह जाती हैं. अनेक रिलीज फिल्मों को दर्शक नसीब नहीं होते, कुछ ही फ़िल्में हैं जो दर्शकों को पसंद आती हैं और वे ही चर्चित होती हैं. भारत में बनी हिंदी फिल्मों की यह स्थिति वर्षों से चली आ रही है और इसी तरह से चलती रहेगी.   भारत में फिल्म का आगमन यहाँ प्रचलित नाटक, राम एवं कृष्णलीला का सफ़ेद परदे पर अवतरण जैसा था. पहले मूक और बाद में सवाक. पहले धार्मिक फ़िल्में बनी, उसके बाद स्टंट और फिर समाजिक सरोकार की बनने लगी. सिनेमा ने आम जनता पर जादू किया और अपने आगोश में ले लिया. सिनेमाघरों में भीड़ उमड़ने लगी और जन-जन में सिनेमा की चर्चा होने...

तीसरी कसम

तीसरी कसम  : ======== 'दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई....' हसरत जयपुरी द्वारा रचित इस मधुर गीत को यदि भगवान से एक प्रश्न के रूप में लिया जाए तो जवाब ये हो सकता है कि यह दुनिया उसने इसलिए बनाई ताकि इस दुनिया में 'तीसरी कसम' (१९६६) जैसी कलात्मक और पवित्र प्रेम से सराबोर फिल्म बन सके. निश्छल प्रेम की गहराइयों को छूती इस फिल्म को हीरामन और हीरा बाई के मिलन और विछोह को जिस शिद्दत से पेश किया गया है, वह हिंदी फिल्म के इतिहास में लम्बे समय तक रेखांकित होता रहेगा. फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास 'मारे गए गुलफाम' के कथानक पर आधारित इस फिल्म को देखकर उसे महसूस करने का सुख अनुपम है. हीरामन (राजकपूर) एक गाड़ीवान है जिसकी गाड़ी में कालाबाजारी का अनाज लदा हुआ है और वह इस बात से अनजान अपनी मस्ती में एक गीत गाता हुआ जा रहा है, 'सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है, वहां हाथी है न घोड़ा है, वहां पैदल ही जाना है...', पुलिस के हत्थे चढ़ जाता है. पुलिस के हत्थे पड़ने और जेल जाने से बचने के लिए वह अपनी बैलगाड़ी से अपने दोनों बैलों को खोल कर भाग निकलता ...

3इडियट्स

फिल्म : 3 इडियट्स =============  शिक्षा का तात्पर्य ज्ञान अर्जित करना है या केवल पढ़ कर रटना है? यह प्रश्न फिल्म '3इडियट्स' (२००९) में बखूबी उठाया गया है. साथ ही यह सवाल भी उछाला गया है कि क्या पढ़ाई करना सबके लिए ज़रूरी है? इन दो प्रश्नों के साथ इस फिल्म को बेहद मनोरंजक शैली में पिरोया गया है जिसमें रोचक कथानक है, कलाकारों का दक्ष अभिनय है, मधुर गीत-संगीत है और संग-साथ में विचार मंथन की सार्थक प्रक्रिया भी.  निर्देशक राजकुमार हिरानी ने चेतन भगत के उपन्यास 'फाइव पॉइंट समवन' की कथा पर आधारित घटनाक्रम को इस फिल्म में इतनी खूबसूरती से पिरोया है कि यह दर्शकों के दिमाग से होती हुई उसके दिल में उतर जाती है. वर्तमान प्रचलित शिक्षा प्रणाली की खाल उधेड़ते हुए उन तथ्यों को उजागर किया गया है जो सामने दिखाई नहीं पड़ते लेकिन परदे के पीछे खड़े हुए झाँक रहे हैं. आज पढ़ाई का महत्व इतना बढ़ गया है कि हर बच्चे को पढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है, वह पढ़ना चाहे या न चाहे. छात्रों को जो कुछ पढ़ाया जाता है उसका  व्यवहारिक जीवन से कोई लेना-देना समझ में नहीं आता, इसी वज़ह से अनेक छात्रों में पढ़ाई के प्रति...