फिल्म : 3 इडियट्स
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शिक्षा का तात्पर्य ज्ञान अर्जित करना है या केवल पढ़ कर रटना है? यह प्रश्न फिल्म '3इडियट्स' (२००९) में बखूबी उठाया गया है. साथ ही यह सवाल भी उछाला गया है कि क्या पढ़ाई करना सबके लिए ज़रूरी है? इन दो प्रश्नों के साथ इस फिल्म को बेहद मनोरंजक शैली में पिरोया गया है जिसमें रोचक कथानक है, कलाकारों का दक्ष अभिनय है, मधुर गीत-संगीत है और संग-साथ में विचार मंथन की सार्थक प्रक्रिया भी.
निर्देशक राजकुमार हिरानी ने चेतन भगत के उपन्यास 'फाइव पॉइंट समवन' की कथा पर आधारित घटनाक्रम को इस फिल्म में इतनी खूबसूरती से पिरोया है कि यह दर्शकों के दिमाग से होती हुई उसके दिल में उतर जाती है. वर्तमान प्रचलित शिक्षा प्रणाली की खाल उधेड़ते हुए उन तथ्यों को उजागर किया गया है जो सामने दिखाई नहीं पड़ते लेकिन परदे के पीछे खड़े हुए झाँक रहे हैं. आज पढ़ाई का महत्व इतना बढ़ गया है कि हर बच्चे को पढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है, वह पढ़ना चाहे या न चाहे. छात्रों को जो कुछ पढ़ाया जाता है उसका व्यवहारिक जीवन से कोई लेना-देना समझ में नहीं आता, इसी वज़ह से अनेक छात्रों में पढ़ाई के प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाती है और वे पढ़ाई के अलावा अन्य क्षेत्रों में प्रविष्ट होना चाहते हैं लेकिन हमारी व्यवस्था उन्हें प्रोत्साहित करने के बजाय परम्परागत पढ़ाई करने के लिए उसके पीछे पड़ जाती है. बच्चों पर उनके अभिभावकों के अपने बच्चे के भविष्य के लिए देखे गए सपनों का दबाव इतना अधिक होता है कि वे उनके द्वारा सुझाए गए सुझावों को मानने के लिए बाध्य हो जाते हैं क्योंकि धन-आपूर्ति अभिभावकों के हाथ में रहती है. आम तौर पर वे अपने बच्चों से यह अपेक्षा करते हैं कि उनका बच्चा पढ़ाई में तेज हो, सर्वप्रथम रहे लेकिन हर कोई तो ऐसा नहीं हो सकता. कोई बच्चा नहीं पढ़ना चाहता तो उसके पास अनेक विकल्प होते हैं, वह गायक या संगीतकार बन सकता है, चित्रकार या फोटोग्राफर बन सकता है, नाटक या फिल्म में अभिनय कर सकता है, व्यापारी या कृषक बन सकता है. परन्तु वह नहीं कर पता क्योंकि उस पर परिवार का दबाव इतना अधिक होता है कि अंततः वह अपना मन मार कर पढ़ाई की वायलिन बजाते रहता है, भले ही वायलिन से सुर निकले या न निकले. कई छात्र पढ़ाई से विरक्त होकर अपने घर लौट जाते हैं तो कई निराश होकर आत्महत्या कर लेते हैं. यह एक व्यापक समस्या है जिसका निदान खोजना अत्यंत आवश्यक है.
निर्माता विधु विनोद चोपड़ा दरअसल मुन्ना भाई सीरीज की अगली फिल्म 'मुन्नाभाई चले अमेरिका' शुरू करने की योजना बना रहे थे किन्तु उसी फार्मेट में काम करने की ऊब की वज़ह से किसी नयी कहानी की तलाश में थे, अचानक चेतन भगत ने अपना उपन्यास उन्हें पढ़ने के लिए दिया, आयडिया पसंद आया और उसके कथानक पर शुरू हुआ. इस फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार करने के पूर्व निर्माता विधु विनोद चोपड़ा, निर्देशक राजकुमार हिरानी, पटकथा लेखक अभिजात जोशी तथा अभिनेता आमिर खान ने आई.आई,टी.मुंबई और दिल्ली आदि कई शिक्षण संस्थानों में छात्रों से बातचीत की, उनके अध्ययन से जुड़ी घटनाओं पर गौर किया, फिर, एक स्क्रिप्ट तैयार की गयी जो मूल उपन्यास से हट कर थी. इस संवर्धित और परिवर्तित स्क्रिप्ट को उपन्यासकार चेतन भगत को दिखाया गया और उनकी सहमति ली गयी, तब फिल्म का निर्माण शुरू हुआ. इम्पीरियल कालेज ऑफ़ इंजीनियरिंग के दृश्यों की शूटिंग इन्स्टीटयूट ऑफ़ मेनेजमेंट बंगलौर में की गयी. अस्पताल के दृश्य की फोर्टिस हास्पिटल दिल्ली में तथा पहाड़ी दृश्यों का दृश्यांकन लद्दाख में किया गया.
फिल्म में मुख्य भूमिका के लिए शाहरुख़ खान पर विचार किया गया लेकिन अन्य फिल्मों में व्यस्त होने के कारण उन्होंने मना कर दिया तब रणवीर कपूर से संपर्क साधा गया. रणवीर को वह रोल समझ में नहीं आया, उसने भी मना कर दिया तब आमिर खान को रणछोड़दास चांचड़ का रोल मिला. सहायक भूमिकाओं में आर. माधवन को फरहान कुरैशी और शर्मन जोशी को राजू का रोल मिला. डा.वीरू सहस्त्रबुद्धे "वायरस' का रोल संजय दत्त को ऑफर हुआ था लेकिन कुछ कारणों से अंततः वह बोमन ईरानी को मिला. डा.वीरू सहस्त्रबुद्धे की बेटी बनी करीना कपूर, 'असली' रणछोड़दास चांचड़ का जावेद जाफरी और चतुर रामालिंगम का रोल मिला अमेरिकन अभिनेता ओमी वैद्य को.
चरित्र अभिनेता कैसे खलनायक बन जाता है और अचानक खलनायक कैसे चरित्र अभिनेता बन जाता है इसका उदाहरण इम्पीरियल कालेज ऑफ़ इंजीनियरिंग कालेज के सर्वेसर्वा डा.वीरू सहस्त्रबुद्धे के पात्र की निर्मिति से बोध होता है जिसका निर्वहन बोमन ईरानी ने बेहद कुशलता से किया है. देश में १८वें स्थान से उठाकर पहले स्थान पर अपने कालेज को स्थापित करने का मुश्किल काम डा.सहस्त्रबुद्धे ने अपनी नेतृत्व क्षमता के बल पर कर दिखाया था उसे रणछोड़दास चांचड़ नामक एक छात्र ने चुनौती दे दी, जिसे वे बर्दास्त नहीं कर पाए. वे चीखे, 'तुम मुझे पढ़ाना सिखाओगे?' दरअसल रणछोड़दास चांचड़ किताबी ज्ञान के विरोध में था, वह व्यवहारिक शिक्षा का पक्षधर था जिसे डा.सहस्त्रबुद्धे समझ नहीं पा रहे थे. डा.सहस्त्रबुद्धे पढ़ाई के परम्परागत तरीकों को जानते-समझते थे और उसी को छात्रों के उज्जवल भविष्य का एक मात्र उपाय मानते थे. उनके कालेज का एक छात्र उनकी वज़ह से फांसी के फंदे में झूल गया लेकिन उन्हें उसका अपराधबोध तक नहीं हुआ. उनका मानना था कि वे सही, उनका पढ़ाने का तरीका सही, उनका कालेज सही, बस. बोमन ईरानी ने अपनी अभिनय क्षमता से इस पात्र को जीवंत बना दिया और पात्र के खिसियाये खलनायकत्व को उभारने में सफल रहे. फिल्म में उनको हीरो के बराबर का रोल मिला जिसे उन्होंने बड़ी शिद्दत से निभाया.
'नकली' रणछोड़दास चांचड़ के रूप में आमिर खान ने एक खिलंदड़ छात्र की भूमिका में स्वयं को वैसा ही ढाल लिया. दुबला-पतला छोकरा, पहली बार जब कालेज में आता है तो नवोदित छात्रों की रेगिंग देखकर घबराता नहीं, वरन अपनी व्यवहारिक बुद्धि से रेगिंग लेने वाले को ऐसा मज़ा चखाता है कि वह वहां से भाग जाने में ही अपनी भलाई समझता है. कालेज के होस्टल में दोस्ती, दोस्त के सही अर्थ, दोस्तों का उत्साहवर्धन, दोस्ती निभाने का ज़ज्बा, दोस्त के दर्द को समझना आदि भावनाओं को विभिन्न घटनाओं के माध्यम से आमिर खान ने जैसे जान डाल दी है. जब भी सामने कोई विपरीत स्थिति हो, अपने दिल को समझाना कि 'आल इज वेल' यह विचार सच में असर पैदा करने वाला है. हर समय मुस्कुराते हुए इस 'नकली' रणछोड़दास चांचड़ की भूमिका में आमिर को देखते रहना फिल्म '3इडियट्स' का खास आकर्षण है.
सहायक भूमिकाओं में आर. माधवन. शर्मन जोशी और ओमी वैद्य ने प्रभावशाली अभिनय किया है. खास तौर से ओमी वैद्य ने गज़ब कर दिया. कालेज के एक कार्यक्रम में उसका भाषण इतना मजेदार और रोचक रहा कि उसके साथ फिल्म के पटकथा लेखक की भी तारीफ़ करनी पड़ेगी. फिल्म के अंतिम दृश्यों में उसका संवाद प्रेषण और अभिनय उम्दा रहा. हीरोइन करिश्मा कपूर को बस खूबसूरत दिखना था, वे खूबसूरत दिखीं.
सी.के. मुरलीधरन को फोटोग्राफी की जिम्मेदारी दी गयी क्योंकि उन्होंने मुन्नाभाई सीरीज की दोनों फिल्मों में इस काम को बखूबी अंजाम दिया था. फिल्म में ६ गीत थे, सब के सब युवा पीढ़ी की पसंद को ध्यान में रखकर लिखे गए थे, इस वज़ह से आसानी से लोगों की जुबान पर चढ़ गए.
१७१ मिनट की इस फिल्म पर पुरस्कारों की झड़ी लग गयी और देश-विदेश में इस फिल्म ने दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित करने में अभूतपूर्व सफलता अर्जित की. इस फिल्म ने देश में ५८ पुरस्कार प्राप्त किए जिसमें ६ फिल्म फेयर अवार्ड और ३ नेशनल फिल्म अवार्ड मुख्य थे. इसके अतिरिक्त बीजिंग इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में 'सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म' का पुरस्कार हासिल किया. इस फिल्म के रीमेक तमिल और तेलुगु भाषा में बने और मेक्सिकन भाषा में 3idiotas के नाम से फिल्म बनी.
शिक्षा व्यवस्था पर तगड़ी चोट करने वाली इस फिल्म ने प्रचलित प्रणाली पर अनेक प्रश्न खड़े किए हैं. किताबी शिक्षा की जगह व्यवहारिक शिक्षा देने के द्वार खोले हैं. इस फिल्म ने यह सिद्ध किया कि किसी नए विषय का प्रस्तुतीकरण यदि अच्छा हो तो दर्शक उसे अपने सर-माथे पर लगाते हैं, अपना प्यार देते हैं.
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