तीसरी कसम :
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'दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई....' हसरत जयपुरी द्वारा रचित इस मधुर गीत को यदि भगवान से एक प्रश्न के रूप में लिया जाए तो जवाब ये हो सकता है कि यह दुनिया उसने इसलिए बनाई ताकि इस दुनिया में 'तीसरी कसम' (१९६६) जैसी कलात्मक और पवित्र प्रेम से सराबोर फिल्म बन सके. निश्छल प्रेम की गहराइयों को छूती इस फिल्म को हीरामन और हीरा बाई के मिलन और विछोह को जिस शिद्दत से पेश किया गया है, वह हिंदी फिल्म के इतिहास में लम्बे समय तक रेखांकित होता रहेगा. फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास 'मारे गए गुलफाम' के कथानक पर आधारित इस फिल्म को देखकर उसे महसूस करने का सुख अनुपम है.
हीरामन (राजकपूर) एक गाड़ीवान है जिसकी गाड़ी में कालाबाजारी का अनाज लदा हुआ है और वह इस बात से अनजान अपनी मस्ती में एक गीत गाता हुआ जा रहा है, 'सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है, वहां हाथी है न घोड़ा है, वहां पैदल ही जाना है...', पुलिस के हत्थे चढ़ जाता है. पुलिस के हत्थे पड़ने और जेल जाने से बचने के लिए वह अपनी बैलगाड़ी से अपने दोनों बैलों को खोल कर भाग निकलता है और अपने घर पहुँच कर सांस लेता है. वह अपनी भौजी के सामने कसम खाता है कि अब वह कालाबाजारी का सामान अपनी गाड़ी में कभी नहीं लादेगा. यह उसकी पहली कसम थी.
इस घटना के बाद एक दिन वह अपनी गाड़ी में लम्बे बांस लाद कर ले जा रहा था तब एक तांगे के साथ दुर्घटना हो जाती है, उसकी बहुत पिटाई होती है, तब वह दूसरी कसम खाता है कि अब वह अपनी गाड़ी में कभी बांस नहीं लादेगा.
इसके बाद उसकी गाड़ी में नौटंकी में काम करने वाली एक नर्तकी हीराबाई (वहीदा रहमान) को बैठा लेता है. तीस घंटे की लम्बी यात्रा के दौरान दोनों के मन में एक-दूसरे के प्रति लगाव उत्पन्न हो जाता है. मेले की नौटंकी में बहुत सी घटनाएं होती हैं, परिणामस्वरूप हीराबाई नौटंकी का काम छोड़कर शहर जाने का निर्णय ले लेती है. वह ट्रेन पकड़ने के लिए रेलवे स्टेशन पहुँचती है. हीरामन हीराबाई से मिलने के लिए अपनी गाड़ी को दौड़ाकर स्टेशन पहुंचता है. ट्रेन आ जाती है. हीराबाई उसे उसकी वह अमानत वापस करती है जिसे हीरामन ने संभालकर रखने के लिए दिया था और दुखी भाव से विदा लेकर ट्रेन में बैठ जाती है. हीरामन को हीराबाई का इस तरह जाना अखर जाता है. वह अपनी गाड़ी में वापस आकर बैठता है और गुस्से में बैलों को मारने के लिए अपना चाबुक उठाता है, अचानक उसके कानों में हीराबाई की कही गयी आवाज़ गूंजती है, 'मारो मत', वह ठिठक जाता है और अपने बैलों से कहता है, 'उलट-उलट कर क्या देखते हो, खाओ कसम. कभी किसी नौटंकी वाली बाई को गाड़ी में नहीं बैठाएंगे.' यह हीरामन की तीसरी कसम थी.
जितनी मार्मिक कहानी फणीश्वरनाथ रेणु ने लिखी थी, उतना ही मार्मिक चित्रण फिल्म 'तीसरी कसम' में निर्देशक बासु भट्टाचार्य ने किया है. चर्चा है कि बासु भट्टाचार्य ने पूरी फिल्म नहीं की इसलिए निर्देशन का शेष काम बी.आर. इशारा और कमल सहगल ने किया. निर्माता शैलेन्द्र से राजकपूर से पुरानी और गाढ़ी दोस्ती थी इसलिए नायक हीरामन का रोल उन्होंने किया और शैलेन्द्र से कोई पारिश्रमिक नहीं लिया. पूरी फिल्म में राजकपूर कहीं नज़र नहीं आए, हर फ्रेम में गाड़ीवान हीरामन ही दिखाई पड़ा, यह राजकपूर के उत्कृष्ट अभिनेता होने का प्रमाण है. हीराबाई के साथ बातचीत में 'हिस्स्स्स' करके हंसना, उसके ग्रामीण परिवेश को उभार कर दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत करने में सफल रहा है. हीरामन का भोलापन और उसकी बातों की मिठास को राजकपूर ने जिस अदा से प्रस्तुत किया है, वह दर्शनीय है. यही बात वहीदा रहमान के लिए भी कही जा सकती है. नौटंकी वाली बाई की भूमिका को एकदम साकार कर दिया है वहीदा ने. जितने भी दृश्य वहीदा और राजकपूर के फिल्माए गए, दोनों अभिनेता एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते नज़र आए और दोनों ने एक-दूसरे को पराजित किया. ख़ास तौर से बैलगाड़ी में दोनों के साथ-साथ तीस घंटे बिताने के दृश्य और संवाद इतने प्रभावशाली बन पड़े हैं कि फिल्म के पूर्वार्द्ध को नयी उंचाई देने में सक्षम रहे हैं. हीरामन हीराबाई से पूछता है, 'कौन-कौन हैं तुम्हारे घर में' तो हीराबाई जवाब देती है 'पूरा संसार मेरा घर है लेकिन जिसका पूरा संसार होता है, उसका कोई नहीं होता.' संवाद लेखक का हाथ चूमने का मन करता है. गाड़ी में हीरामन एक लोकगीत गुनगुनाता है, 'सजनवा बैरी हो गए हमार, चिठिया हो तो हर कोई बांचे, भाग न बांचे कोय, बलमवा बैरी हो गए हमार,' मुकेश जी के गाये इस गीत को राजकपूर पर इस तरह चित्रित किया गया है कि श्रोता की आँखें सहज ही सजल हो जाती हैं.
बैलगाड़ी की उस यात्रा के दौरान रास्ते में कजरी नदी आती है, वहां विश्राम के लिए वे रुकते हैं. हीराबाई कहती है, 'मैं यहाँ नहा लेती हूँ.' तो हीरामन मना करता है, 'यहाँ मत नहाइए क्योंकि कुंवारी लड़कियां यहाँ नहीं नहाती,' हीरा बाई पूछती है, 'क्यों,' तो जवाब आता है, 'यह महुआ घटवारिन का घाट है.' उसके बाद वह महुआ घटवारिन की दर्द भरी दास्ताँ सुनाता है, एक गीत के रूप में, 'दुनिया बनाने वाले, काहे को दुनिया बनाई, तूने काहे को दुनिया बनाई...' शैलेन्द्र के लिखे और शंकर जयकिशन के द्वारा संगीतबद्ध इस गीत को जितनी बार सुनो, जी नहीं भरता.
मध्यांतर तक तो फिल्म रोचक है लेकिन उसके बाद के दृश्यों का सम्पादन जी.जी.मयेकर ने ठीक से नहीं किया. पटकथा लेखक नवेंदु घोष ने भी कथानक के बोझिल हो जाने का ध्यान नहीं रखा. बिहार की परम्परा को प्रदर्शित करने के फेर में कुछ ऐसे दृश्य डाले गए हैं जो दर्शकों को उबाऊ लगे. बैलगाड़ी के पीछे गाते हुए बच्चों का गीत 'लाली लाली डोली में लाली रे दुल्हनिया, पिया की पियारी भोलीभाली रे दुल्हनिया...' और दूसरा किस्सा-ए-लैला मजनू पर आधारित गीत 'किस्सा शुरू होता है...' यदि सम्पादन के दौरान हटा दिया गया होता तो संभवतः यह फिल्म असफल न हुई होती. ऐसी ही गलती राजकपूर की फिल्म 'मेरा नाम जोकर' में भी हुई थी, फिल्म के तीसरे भाग में एक कव्वाली थी, 'कहीं दाग न लग जाए...' जिसने फिल्म को बोझिल बना दिया और एक शानदार फिल्म असफल हो गयी. सफल फिल्म 'शोले' के लिए भी एक कव्वाली रिकार्ड की गयी थी जिसे संपादन के दौरान हटा दिया गया था. तो, फिल्म में सम्पादन का काम बेहद महत्वपूर्ण होता है लेकिन कई बार पटकथा लेखक और निर्देशक के दबाव में सम्पादक कुछ नहीं कर पाता, शायद 'तीसरी कसम' के निर्माण के दौरान ऐसा हुआ हो.
फिल्म का सबसे दमदार पक्ष है, इसके गीत और शंकर जयकिशन का संगीत. केवल एक गाना हसरत जयपुरी ने लिखा था, 'मारे गए गुलफाम...' और शेष सभी गीत निर्माता शैलेन्द्र ने स्वयं लिखे थे. 'आ आ आ भी जा...', 'चलत मुसाफिर मोह लिया रे पिंजरे वाली चिड़िया...', 'पान खाए सैंया हमारो, सांवली सूरतिया होंठ लाल लाल...' और 'हाय गज़ब कहीं तारा टूटा...' भी मधुरता लिए हुए है और कथानक को आगे बढाने में बल देते हैं. छायाकार सुब्रत मित्र ने शानदार फोटोग्राफी की है. लच्छू महाराज के निर्देशन में वहीदा रहमान ने आकर्षक नृत्य प्रस्तुत किए हैं.
राजकपूर और वहीदा रहमान के प्रभावशाली अभिनय के आगे शेष कलाकार फीके पड़ गए लेकिन गाँव के जमींदार की भूमिका में इफ़्तेख़ार, हीरामन की भाभी के रूप में दुलारी ने अच्छा काम किया है.
सन १९६६ की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रपति स्वर्ण पदक और १९६७ का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाने वाली यह फिल्म आज भी हिंदी सिनेमा की श्रेष्ठ फिल्मों में से एक है. साहित्यिक रचनाओं पर हिंदी में कम फ़िल्में बनी हैं लेकिन जितनी भी बनी हैं उनमें रचना का सबसे बढ़िया प्रस्तुतीकरण 'तीसरी कसम' है इसलिए यह फिल्म क्लासिक फिल्मों की श्रेणी में विराजमान है.
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