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क्लासिक फिल्म : बैजू बावरा

बैजू बावरा :

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सोलहवीं शताब्दी के महान गायक पंडित बैजनाथ का जन्म मध्यप्रान्त के चंदेरी ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में सन १५४२ की शरद पूर्णिमा की रात को हुआ था. उन्हें बचपन में लोग प्यार से बैजू कहकर पुकारते थे. जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ी, वे शास्त्रीय गायन में निपुण होते गए. युवावस्था में उन्हें कलावती से प्यार हो गया, वे उसके दीवाने हो गए थे, इस कारण लोग उन्हें बैजू बावरा के नाम से जानने लगे थे. कलावती उनकी प्रेयसी होने के साथ-साथ संगीत के क्षेत्र में उनकी मार्गदर्शक भी थी.  बैजनाथ ने वृन्दावन के गुरु हरिदास स्वामी से ध्रुपद गायन की विधिवत शिक्षा ली थी. ग्वालियर के जयविलास महल में संरक्षित इतिहास के अनुसार पंडित बैजनाथ राग दीपक गाकर दीप जला सकते थे, राग मेघ-मल्हार गाकर वर्षा करवा सकते थे, राग बहार गाकर फूल उगा सकते थे और राग मालकौंस गाकर पत्थर पिघला सकते थे. शास्त्रीय संगीत के इस प्रकांड पंडित बैजनाथ की ७१ वर्ष की आयु में उनके जन्मस्थान चंदेरी में सन १६१३ की बसंत पंचमी के दिन हो गया. 

सन १९५२ में प्रकाश भट्ट, जो कि एक स्टेशन मास्टर थे, ने एक फिल्म का निर्माण किया, 'बैजू बावरा'. इस फिल्म की सफलता ने उन्हें बम्बई के फिल्म उद्योग में फिल्म निर्माता-निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया. उन दिनों ऐतिहासिक विषयों पर बनी फिल्मों को दर्शक पसंद करते थे इसलिए इस विषय को प्रकाश भट्ट ने चुना. ज्ञात इतिहास को एक फ़िल्मी कहानी का परिवर्तित रूप दिया हरीश चन्द्र ठाकुर और आर.एस.चौधरी ने. फिल्म में संगीत के लिए उन्होंने उस समय के उभरते संगीतकार नौशाद अली को चुना और गीत लिखने के लिए शकील बदायूँनी को. नौशाद और शकील बदायूँनी की जोड़ी ने ऐसे मधुर गीत तैयार किये कि वे जन-जन की जुबान पर चढ़ गए, दर्शक उन गीतों को बार-बार सुनने और देखने को मजबूर हो गए, इस कारण फिल्म सुपर हिट हो गयी.

फिल्म में कहानी इस प्रकार है, बैजू के बचपन की घटना है, उस समय अकबर का शासनकाल था. उनके नवरत्नों में से एक संगीत सम्राट मियाँ तानसेन थे जो शास्त्रीय गायक थे, उनके गायन में व्यवधान न हो इसलिए उनके महल के आसपास किसी और को गाने की मनाही थी. बैजू के पिता वहां गाने लगे, बालक बैजू ने उन्हें गाने से रोका लेकिन वे नहीं माने. इस बीच सिपाहियों ने उन पर तलवार से हमला कर दिया. मरणासन्न अवस्था में उन्होंने बैजू से इस घटना का बदला लेने का वायदा लिया और मर गए. तब से बैजू बदले की आग में जलता हुआ, संगीत की शरण में जा पहुंचा और गायक बैजू (भारत भूषण) बन गया. युवावस्था में उसे एक मल्लाह की बेटी गौरी (मीना कुमारी का फ़िल्मी नाम) से प्रेम हो गया. संगीत की दुनिया में दोनों एक-दूसरे के प्रेरक बन गए. गौरी के प्रेम में बैजू अपने पिता को दिया वायदा भूल जाता है तब ही गाँव में डकैती की एक घटना के सन्दर्भ में उसे अपने वायदे की याद आती है. वह तलवार लेकर तानसेन के महल में उनकी हत्या के इरादे से पहुँच जाता है. तानसेन उस समय संगीत की साधना कर रहे थे. तानसेन की आलाप सुनकर बैजू की हाथ से तलवार छूट जाती है. वह तलवार को जमीन से उठाकर तानपूरे पर वार करता और उसे तोड़ देता है. आश्चर्यचकित होकर तानसेन पूछते हैं, 'तुमने तानपूरे पर तलवार चलाई, मुझ पर क्यों नहीं?' बैजू कहता है, 'इस तानपूरे के सुर मुझे ऐसा करना से रोक रहे थे.' तब तानसेन को यह जानकार कि बैजू संगीत का जानकार है. वे उससे कहते हैं, 'मैं किसी तलवार से मरने वाला नहीं, तुम कोई सुरीली तान छेड़ो, तानसेन खुद-ब-खुद मर जाएगा.' 

तानसेन की बात सुनकर वह संगीत की शिक्षा लेने के लिए स्वामी हरिदास की शरण में जाता है. स्वामी हरिदास से संगीत की शिक्षा लेकर वह अकबर के दरबार में आकर तानसेन को गायन की चुनौती देता है. दोनों के बीच मुकाबला होता है, अनिर्णीत हो जाता है, तब अकबर एक तजवीज पेश करते हैं कि जो संगमरमर के पत्थर को पिघला देगा, उसे विजेता घोषित किया जाएगा. बैजू अपने गायन से पत्थर को पिघला देता है और मुकाबला जीत जाता है. 

उधर गाँव में गौरी के किसी अन्य व्यक्ति से विवाह की खबर बैजू को मिलती है. वह गाँव पहुँचना चाहता था लेकिन नदी में बाढ़ आई हुई थी. मल्लाह उस बाढ़ में नाव से ले जाने के लिए मना कर देता है तो बैजू खुद नाव को लेकर नदी पार करने की कोशिश करता है. यह देखकर गौरी, जिसे तैरना आता है, वह बैजू को बचाने के लिए नदी में कूद जाती है. तब ही बैजू की नाव पलट जाती है. गौरी बैजू को बचाने की कोशिश करती है लेकिन पानी के तेज बहाव में बैजू को बचाना मुश्किल था. बैजू गौरी से वापस लौट जाने के लिए कहता है लेकिन गौरी वापस जाने से इन्कार कर देती है और दोनों प्रेमी जल समाधि ले लेते हैं.   

नौशाद और शकील की जुगलबंदी से सजी हुई इस संगीतमय दुखांत प्रेम कहानी को देखने के लिए सिने-दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ी. चूँकि फिल्म की कहानी शास्त्रीय संगीत से जुडी हुई थी इसलिए नौशाद ने हर एक गीत को शास्त्रीय रागों में निबद्ध किया था. इस फिल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत, 'तू गंगा की मौज मैं जमना का धारा, हो रहेगा मिलन, हो हमारा तुम्हारा रहेगा मिलन' मोहम्मद रफ़ी के द्वारा राग भैरवी में गाया गया था. इसी प्रकार 'ओ, दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले', राग दरबारी; 'मन तड़पत हरी दर्शन को आज', राग मालकौंस; 'इंसान बनो कर लो भलाई का कोई काम', राग तोड़ी में मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में रिकार्ड किए गए थे. रफ़ी और लता का एक बेहद खूबसूरत युगल गीत 'झूले में पवन के आई बाहर, नयनों में नया रंग लायी बहार, प्यार छलके' राग पीलू पर आधारित था. इसी प्रकार लता और शमशाद बेगम की आवाज़ में 'दूर कोई गाये, धुन ये सुनाए, तेरे बिन छलिया रे, बाजे न मुरलिया रे' (राग देस) में नायिका मीनाकुमारी ने प्रेम में पड़ी शर्माती हुई गौरी का अविस्मरणीय अभिनय किया है. लता मंगेशकर की मधुर आवाज़ में 'मोहे भूल गए सांवरिया, आवन कह गए अबहु न आये, लीन्ही न मोरी खबरिया' (कलिंगड़ा के साथ राग भैरव) और 'बचपन की मोहब्बत को दिल से न भुला देना, जब याद मेरी आये मिलने की दुआ करना' (राग मंद), ये दोनों दर्द भरे गीत श्रोताओं के मन को आज भी छू रहे हैं. इनके अतिरिक्त शुद्ध रागों पर आधारित चार गायन उस्ताद आमीर खान और डी.वी.पलुस्कर की आवाज में हैं जो मुगल सम्राट अकबर के महल में या सभागार में चित्रांकित किये गए हैं. कुल मिलाकर नवयुवक, नवागंतुक, नवोन्मेषी संगीतकार नौशाद ने फिल्म 'बैजू बावरा' ने अपने हुनर का ऐसा इस्तेमाल किया कि फिल्म की कहानी को अनदेखा करके दर्शक सुर की लहरियों में खो गए.

बैजू के रोल में भारत भूषण और गौरी के रोल में मीनाकुमारी ने कमाल का अभिनय किया. उन पात्रों को सजीव करने के लिए जिस भोलेपन की अभिव्यक्ति आवश्यक थी, वह मुलायमियत दोनों के चेहरे में अनवरत बनी रही. 'तू गंगा की मौज मैं जमना का धारा', नदी के किनारे खड़े होकर गा रहे इस गीत को नाव पर बैठी गौरी के साथ चित्रांकित किया गया है. गीत के अंतिम हिस्से में गौरी किनारे पर खड़े होकर मुग्ध ग्रामवासियों की भीड़ को  देखकर गौरी शर्म के मारे दोनों गदेलियों से अपना चेहरा छुपा लेती है, इस दृश्य को मीनाकुमारी ने इतनी शिद्दत से निभाया है कि वह सालों-साल दर्शकों की स्मृतियों में कैद रहेगा. अकबर की भूमिका में बिपिन गुप्ता, तानसेन के रूप में सुरेन्द्र ने ठीक-ठाक अभिनय किया है, वहीं पर हास्य अभिनेता राधाकिशन ने छोटे-छोटे तीन-चार दृश्यों में अपनी जबरदस्त उपस्थिति दर्ज की है. 

फिल्म फेयर पुरस्कार (१९५४) सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री मीनाकुमारी और सर्वश्रेष्ठ संगीतकार नौशाद को प्राप्त हुआ था. इस पुरस्कार से बढ़कर पुरस्कार दर्शकों ने दिया इस फिल्म को बहुत बड़ी संख्या में देखकर. निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट की इस फिल्म का छायांकन वी.एन.रेड्डी तथा संवाद लेखन ज़िया सरहदी ने किया था. 

कथानक की दृष्टि से लचर लेकिन गीत-संगीत के लिए उत्कृष्ट इस फिल्म को हिंदी फिल्मों के इतिहास में सदा याद रखा जाएगा. मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में ध्वन्यांकित किए गए गीत 'अब तो नीर बहा ले, ओ दुनिया के रखवाले' को गायन की जिस ऊँचाई पर गवाया गया है, वह रफ़ी और नौशाद का अभूतपूर्व कारनामा था, निःसंदेह.

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