क्लासिक फिल्म : शोले :
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'शोले' हिंदी फिल्म के इतिहास की सर्वाधिक लोकप्रिय फिल्म होने का दावा कर सकती है. १४ अगस्त १९७५ को मुंबई के मिनर्वा सिनेमा गृह में रिलीज हुई फिल्म लगातार पांच साल चली. यद्यपि इससे भी अधिक समय तक 'मुग़ल-ए-आज़म', 'हम आपके कौन हैं' और 'दिल वाले दुल्हनियां ले जाएंगे' के चलने का रिकार्ड है लेकिन आम दर्शक के मन को सबसे अधिक लुभाने वाली फिल्म यही रही है. पूरे देश में जहाँ भी यह फिल्म प्रदर्शित हुई, भरपूर चली. जय और वीरू की जोड़ी, बसंती तांगेवाली, अंग्रेजों के जमाने के जेलर, सूरमा भोपाली, गब्बर सिंह, साम्भा, ठाकुर बलदेव सिंह और मौसी के पात्रों को आज भी दर्शक भूले नहीं हैं जबकि इस फिल्म को बने आधी शताब्दी बीत चुकी है.
जापानी फिल्मकार अकीरा कुरोसोवा की फिल्म 'सेवेन समुराई' की कहानी पर आधारित फिल्म 'शोले' के अतिरिक्त हिंदी भाषा में राज खोसला ने 'मेरा गाँव मेरा देश', नरेन्द्र बेदी ने 'खोटे सिक्के', प्रकाश मेहरा ने 'मेला' और राजकुमार संतोषी ने 'चाइना गेट' का निर्माण किया लेकिन ये फ़िल्में वैसी सफलता प्राप्त न कर सकी, जैसी 'शोले' को मिली. यह कमाल सलीम खान और जावेद अख्तर के लेखन का था जिन्होंने इस कहानी में ऐसे रंग भरे, ऐसे संवाद लिखे कि जिसने देखा, वह फिल्म को बार-बार देखता. प्रदर्शन के शुरुआती हप्ते कमजोर रहे लेकिन उसके बाद जो फिल्म चली तो आज तक हिट है.
सलीम-जावेद ने इस प्रस्तावित फिल्म का संक्षिप्त प्लाट एक-दो अन्य निर्माताओं को सुनाया था लेकिन उनके इन्कार के बाद वे निर्माता जी.पी. सिप्पी के पास पहुंचे, जी.पी. सिप्पी को आयडिया पसंद आया तो उन्होंने अपने बेटे रमेश सिप्पी के पास उन्हें भेज दिया. उसके बाद बैठकों और बातों के कई दौर चले तब जाकर एक फिल्म लांच करने की बात ने अंतिम आकार ले लिया जिसका नाम रखा गया, 'शोले'.
प्रस्तावित फिल्म की मोटे तौर पर पटकथा लिखी गयी. उर्दू लिपि में संवाद लिखे गए जिन्हें बाद में देवनागरी लिपि में परिवर्तित किया गया. पात्रों का नामकरण किया गया, जैसे, जय और वीरू सलीम खान के कालेज के दो दोस्तों के नाम हैं. कलाकारों के चयन के लिए मुख्य भूमिका में धर्मेन्द्र तय हो गए थे उनके दोस्त की भूमिका के लिए शत्रुघ्न सिन्हा का चयन किया जाना था. रमेश सिप्पी ने अपने घर में एक पार्टी दी जिसमें शत्रुघ्न सिन्हा और अमिताभ बच्चन को भी आमंत्रित किया गया था. उस शाम अमिताभ को १०२ डिग्री बुखार थे लेकिन इस फिल्म में काम मिलने की आशा में वे उस हालत में भी पार्टी में पहुंचे. अमिताभ की कई फ़िल्में फ्लॉप हो चुकी थी, उनके सामने काम मिलने की समस्या आ रही थी. फिल्म 'जंजीर' के नायक के रूप में उन्हें काम मिला था लेकिन फिल्म रिलीज नहीं हुई थी. फिल्म जंजीर भी सलीम-जावेद की लिखी कहानी पर बन रही थी. सलीम-जावेद ने जंजीर में अमिताभ के अभिनय को देखा हुआ था, वे अमिताभ की अभिनय प्रतिभा से अत्यधिक प्रभावित थे, फिर, उनकी जबरदस्त सिफारिश पर धर्मेन्द्र के दोस्त का रोल अमिताभ बच्चन को मिल गया. दो नायिकाओं के लिए हेमा मालिनी और जया बच्चन को लिया गया और ठाकुर बलदेव सिंह के पात्र को निभाने के लिए संजीव कुमार को. समस्या फिल्म के खलनायक गब्बर सिंह के लिए उस समय आ गयी जब फिल्म की शूटिंग के दौरान इस रोल के लिए चयनित डैनी डोंग्जोप्पा फिल्म 'महात्मा' की शूटिंग के लिए अफगानिस्तान चले गए तब प्रेम चोपड़ा, रणजीत और प्रेमनाथ के नामों पर विचार किया गया. तब ही अचानक सलीम खान ने अभिनेता जयंत के बेटे अमज़द खान का नाम प्रस्तावित किया. अमज़द खान को दाढ़ी बढ़ाकर स्क्रीन टेस्ट के लिए स्टूडियो बुलाया गया. अमज़द चार दिन की दाढ़ी बढ़ाकार, अपने दांतों को काला करके टेस्ट के लिए पहुंचे. स्क्रीन टेस्ट हुआ और गब्बर के रोल के लिए अमज़द खान को रमेश सिप्पी ने ओके कर दिया.
रामगढ़ गाँव के निवासी ठाकुर बलदेव सिंह (संजीव कुमार), जो कि एक सेवानिवृत पुलिस अधिकारी हैं, ने उन दो चोरों को अपने पास बुलाया जिन्हें कभी उन्होंने चोरी के आरोप में गिरफ्तार किया था. बलदेव सिंह को यकीन था कि ये दोनों चोर जय (अमिताभ बच्चन) और वीरू (धर्मेन्द्र) कुख्यात डकैत गब्बर सिंह (अमज़द खान) को पकड़ने में उनकी मदद कर सकते हैं. ठाकुर उन दोनों चोरों को उनके मुंह मांगी रकम देने का वायदा करते हैं लेकिन वे शर्त रखते हैं कि वे गब्बर को ज़िंदा पकड़ कर ठाकुर को सौंपेंगे.
गब्बर सिंह की तीन डकैत साथी रामगढ़ ग्रामीणों से जबरिया अनाज वसूल करने आते हैं लेकिन ठाकुर द्वारा गब्बर के विरोध में तैनात जय और वीरू के कड़े प्रतिरोध के कारण वे खाली हाथ लौट जाते हैं. गब्बर उन तीनों साथियों को गुस्से में अपनी पिस्तौल की गोलियों से भून देता है. उसके बाद गब्बर अन्य साथियों के साथ रामगढ़ में होली के दिन आक्रमण करता है और लम्बी लड़ाई के बाद जय और वीरू को बंधक बना लेता है. जय और वीरू किसी प्रकार गब्बर के चंगुल से बच निकलते हैं और गाँव छोड़ने का मन बना लेते हैं क्योंकि जब मदद की जरूरत थी तब ठाकुर ने उन्हें बन्दूक उठाकर नहीं दिया था. तब ठाकुर उन्हें बताता है कि किस तरह कुछ समय पहले जब ठाकुर ने पुलिस अधिकारी के रूप में गब्बर को गिरफ्तार किया था, गब्बर जेल से भाग गया और उसके बाद ठाकुर बलदेव सिंह से प्रतिशोध लेने के लिए उसके घर में आकर पूरे परिवार की सामूहिक हत्या कर देता है और ठाकुर के दोनों हाथ काट लेता है. हाथ कटे होने के कारण ठाकुर उसे शाल ओढ़कर छुपा कर रखते थे इसीलिए वे जय और वीरू को बन्दूक उठाकर नहीं दे पाए थे. इस घटना की जानकारी के बाद जय और वीरू का ह्रदय परिवर्तन होता है और वे ठाकुर के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए रामगढ़ में ही रहने का निर्णय लेते हैं और गब्बर के खिलाफ ठाकुर बलदेव सिंह का साथ देते हैं.
इस बीच ठाकुर की विधवा बहू राधा (जया भादुड़ी) से जय को प्यार हो जाता है और तांगा चलने वाली बसंती (हेमा मालिनी) से वीरू को. गब्बर और वीरू के बीच हुई एक और मुठभेड़ में गब्बर के साथी वीरू और बसंती को पकड़ कर अपने अड्डे में ले जाते हैं. जय उनको बचाने वहां पहुंचता है और गोलीबारी के बीच तीनों वहां से बच निकलने की कोशिश करते हैं. इस मुठभेड़ में जय की मौत हो जाती है. जय की मौत से गुस्साया वीरू अकेले गब्बर का मुकाबला करता है, दोनों के बीच जबरदस्त हाथापाई होती है जिसमें वीरू गब्बर को मारने के लिए जैसे ही उद्यत होता है, ठाकुर वहां आकर वीरू को 'गब्बर ज़िंदा सौंपने' का वायदा याद दिलाता है. वीरू गब्बर को ठाकुर को सौंप देता है. ठाकुर अपने जूतों की नुकीले कीलों से गब्बर का हाथ कुचलता है और उसे जान से मारने की कोशिश करता है तब ही वहां अचानक पुलिस आ जाती है और गब्बर को गिरफ्तार कर लेती है.
वीरू रामगढ़ छोड़कर जाने के लिए स्टेशन पहुंचता है जहाँ बसन्ती उसका इंतज़ार करती हुई मिलती है लेकिन राधा एक बार फिर से अकेली ही रह जाती है.
अनेक घटनाओं और कई प्रहसनों के बीच फिल्म 'शोले' दर्शकों में लगातार उत्सुकता बनाए रखने में सफल रही है. हिंसक दृश्यों की तीव्रता को हल्का करने के लिए फिल्म के कथानक में अनेक मनोरंजक घटनाएं पिरोई गयी हैं जो फिल्म के 'मूड' को संतुलित करने का काम करते हैं. जेल में ' हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं' वाले दृश्य अभिनेता असरानी के द्वारा प्रस्तुत प्रकरण निर्मल हास्य को जन्म देता है. लकड़ी बेचने वाले सूरमा भोपाली के रूप में हास्य कलाकर जगदीप ने अविस्मरणीय अभिनय किया है. रेलवे स्टेशन से रामगढ़ जाने के रास्ते के बीच तांगेवाली बसंती और वीरू-जय के मध्य हुए संवाद अत्यंत रोचक सिद्ध हुए हैं. इसी प्रकार जय और मौसी के बीच वीरू के रिश्ते को लेकर हुआ वार्तालाप अमिताभ बच्चन के बहुमुखी अभिनेता होने का परिचय देता है. वीरू के रोल में धर्मेन्द्र ने जांबाज़ योद्धा का जानदार अभिनय किया है साथ ही अपने हास्य कलाकार होने का भी परिचय दिया है. बन्दूक से आम तोड़ने, भगवान की मूर्ति के पीछे खड़े होकर भगवान की आवाज में बसंती से बातचीत, पानी टंकी के ऊपर चढ़कर आत्महत्या करने की धमकी आदि दृश्यों में धर्मेन्द्र ने किसी स्थापित हास्य अभिनेता से बेहतर अभिनय किया है. ये सभी दृश्य विभिन्न देशी-विदेशी फिल्मों से उठाए गए थे लेकिन ये सब सलीम-जावेद के चुस्त संवादों और अभिनेता-अभिनेत्रियों के दुरुस्त अभिनय के चलते मनभावन बन गयी और दर्शकों के स्मृति कोष में स्थायी रूप से से अंकित हो गये.
रमेश सिप्पी इस फिल्म की शूटिंग छः माह में पूरी करने की योजना बना कर शुरू हुए थे लेकिन सात माह बीत जाने के बाद केवल एक तिहाई फिल्म बन पाई. दो माह तो कर्णाटक के रामनगरम को रामगढ़ बनाने में लग गए. दो माह ट्रेन डकैती के फिल्मांकन में लगे. गब्बर सिंह द्वारा ठाकुर के परिवार की हत्या में २३ दिन, 'ये दोस्ती, हम नहीं भूलेंगे' गीत में २१ दिन, जय के माउथऑर्गन बजाने और राधा के दीप जलाने के दृश्य को शूट करने में २० दिन लगे थे. फिल्म के हर एक दृश्य को 'परफेक्ट टच' देने का रमेश सिप्पी का आग्रह फिल्म निर्माण के समय को बढ़ाता गया और ४ घंटे की इस ७० एम.एम.-सिक्स ट्रेक स्टीरियोफ़ोनिक फिल्म को तैयार करने में लगभग डेढ़ साल लगे. फिल्म सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म पर अपनी निर्मम कैंची चलाई और केवल ३ घंटे २० मिनट की फिल्म प्रदर्शन के लिए तैयार हो गयी.
फिल्म के गीत आनंद बक्शी ने लिखे थे तथा संगीत राहुल देव बर्मन ने तैयार किया था. गाने साधारण थे लेकिन फिल्म की सफलता के चलते लोकप्रिय हो गए. एक कव्वाली भी रिकार्ड की गयी थी लेकिन फिल्म की लम्बाई अधिक होने के कारण उसे फिल्म से हटा दिया गया.
फिल्म 'शोले' के संवाद आमजन में इतने लोकप्रिय हो गए कि फिल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' के संवादों के रेकार्ड की तरह इस फिल्म के संवादों का एक एल.पी. रेकार्ड बनाया गया जिसकी रिकार्डतोड़ बिक्री हुई. गली-गली में इस संवादों की गूँज फैलती गयी और फिल्म को बार-बार देखने के लिए दर्शकों को मजबूर करते रही.
सन २००५ में आयोजित पचासवें फिल्म फेयर अवार्ड में इस फिल्म को 'पचास वर्षों में बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म' घोषित किया गया. 'शोले' के सफलता ने सलीम-जावेद की जोड़ी को बालीवुड में सातवें आसमान में चढ़ा दिया. इसी फिल्म की शूटिंग के समय जया बच्चन गर्भवती हुई और उन्होंने अभिषेक बच्चन को जन्म दिया, इसी फिल्म की शूटिंग के दौरान धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी के बीच प्यार हुआ जो पांच वर्ष बाद विवाह के रूप में परिवर्तित हुआ. इसी फिल्म के कारण अमज़द खान जैसा अनजान कलाकार एक दमदार खलनायक के रूप में उभरा और लोगों की नज़र में चढ़ गया. अमज़द खान की संवाद कहने की शैली जन-जन में लोकप्रिय हो गयी, 'कितने आदमी थे...', 'जो डर गया समझ लो मर गया...', 'अपने हाथ दे दे ठाकुर...', 'बहुत याराना लगता है...' आदि संवाद आम हिन्दुस्तानी की बातचीत में शामिल हो गए थे.
फिल्म 'शोले' हिंदी फिल्मों के इतिहास में एक सफल और प्रभावशाली फिल्म के रूप में सदा अंकित रहेगी. यह हिंदी सिनेमा की एक क्लासिक फिल्म थी.
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