फिल्म : मुन्नाभाई एमबीबीएस
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चिकित्सा विज्ञान और मनोविज्ञान के सहसंबंध पर आधारित विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' (२००३) एक ऐसी कामेडी फिल्म है जो दर्शक को गंभीर संदेश भी देती है. राजकुमार हिरानी के निर्देशन पर बनी यह फिल्म सिगमंड फ्रायड के उस सिद्धांत को स्थापित करती है जिसमें उन्होंने शरीर की बीमारियों का कारण मनुष्य की मानसिक पीड़ा को बताया था. ऐसा देखा गया है कि किसी भी मरीज के रोग का आधा इलाज़ डाक्टर की सकारात्मक और हौसला बढ़ाने वाली बातों से हो जाता है और शेष आधा डाक्टर द्वारा उसे दी गयी दवाओं से होता है. रोगी को स्वस्थ करने में डाक्टर की बातों का असर ज्यादा होता है या दवा का, इस बारे में अलग-अलग राय हो सकती है लेकिन इस बात पर सर्वसम्मति होगी कि दोनों विधाओं के साथ-साथ प्रयोग से रोगी को शीघ्र लाभ होता है. फिल्म की कहानी इसी सोच के साथ आगे बढ़ती है कि रोगी को दवा से अधिक असर उसे मिले प्यार से होता है. रोगी को ठीक करने के लिए प्यार जताने वाली 'जादू की झप्पी' का रोचक प्रयोग 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' में बखूबी किया गया है.
मुरली प्रसाद शर्मा उर्फ़ 'मुन्ना' मुंबई की सड़कों में पल रहा एक लफंगा व्यक्ति है जो अपनी दादागिरी के बल पर लोगों पर अत्याचार करता है और अपनी आजीविका चलाता है. उसके पिता हरि प्रसाद शर्मा चाहते थे कि उनका बेटा मुन्ना डाक्टर बने, लेकिन मुन्ना डाक्टर न बनकर टपोरी बन जाता है लेकिन अपने पिता से झूठ बोलता है कि वह शहर में जाकर डाक्टर बन गया है. एक दिन उसके माता-पिता गाँव से मुंबई अपने बेटे से मिलने आते हैं. उस दौरान उनकी मुलाकात अपने पुराने परिचित डा.जगदीश चन्द्र अस्थाना से हो जाती है. वे डा.अस्थाना की बेटी चिंकी से अपने डाक्टर बेटे से विवाह करने का प्रस्ताव देते हैं. आमने-सामने हुई बातचीत के दौरान मुन्ना की असलियत खुल जाती है कि वह डाक्टर नहीं है बल्कि एक मवाली गुंडा है. डा.अस्थाना हरि प्रसाद को बेइज्ज़त कर देते हैं, दुखी होकर हरि प्रसाद अपनी पत्नी पार्वती के साथ गाँव वापस लौट जाते हैं. इस घटना से नाराज़ होकर मुन्ना किसी भी उपाय से डाक्टर बनने का निर्णय लेता है और अपने दोस्त सर्किट की मदद से, एक डाक्टर को डरा-धमका कर उसे प्री-मेडिकल-टेस्ट में अपने बदले बैठा कर, उसी मेडिकल कालेज में प्रवेश प्राप्त कर लेता है, जहाँ के डीन वही डा.अस्थाना होते हैं जिन्होंने उसके पिता को अपमानित किया था.
एक छात्र की हैसियत से ऊपर उठ कर वह मरीजों के परंपरागत इलाज़ से परे उन्हें मनोवैज्ञानिक तरीके से ठीक करने के अनेक प्रयास करता है. बहुत सी कोशिशों में वह सफल होता है लेकिन कैंसर रोगी ज़हीर को ठीक करने में वह असफल हो जाता है इसलिए दुखी होकर मुन्ना मेडिकल कालेज की पढ़ाई छोड़ने का निर्णय लेता है. इस बीच असाध्य रोग से पीड़ित एक मरीज़ आनंद मुन्ना भाई के प्रयोग से ठीक हो जाता है, इससे प्रभावित होकर डॉ.अस्थाना की बेटी चिंकी एक भाषण के द्वारा मुन्ना भाई के प्रयोगों की उपयोगिता स्थापित करती है, डा.अस्थाना को अपनी भूल पर पछतावा होता है. वे अपनी बेटी चिंकी का विवाह मुन्ना भाई से करने का प्रस्ताव देते हैं. मुन्ना भाई के माता-पिता आकर उसे अपना प्यार देते हैं. मुन्ना भाई और चिंकी का विवाह हो जाता है. मुन्नाभाई की डिग्री अपने-आप एमबीबीएस कायम हो जाती है, 'मियां बीबी बच्चे सहित', यद्यपि कि वह डाक्टर नहीं बन पाता. गाँव में जाकर मुन्ना भाई और चिंकी एक अस्पताल खोलते हैं जहाँ पर इसी 'थैरेपी' से मरीजों का उपचार किया जाता है.
मेडिकल कालेज में कई अविश्वसनीय घटनाओं को स्क्रिप्ट में पिरोया गया है जैसे संज्ञाशून्य रोगी आनंद का मेक-अप, डा.रुस्तम के बेहोश पिता के सामने कैरम-बोर्ड का खेल आयोजित करना, जहर खाकर आए मरीज के लिए ड्यूटी पर तैनात डाक्टर का मुन्ना के द्वारा गला दबाकर उसका तुरंत इलाज़ करने के लिए मजबूर करना, एक मरीज के लिए बेड खाली करवाने के निर्णय पर बाहर से एक बड़ा पलंग लाकर वार्ड के बीचो-बीच लगवा देना आदि लेकिन मज़े की बात यह है कि इन फ़िल्मी घटनाओं से दर्शक को कोफ़्त नहीं होती वरन उसे कुछ नवोन्मेषी विचार से समझ में आते हैं। ऐसा लगता है कि अस्पतालों में ऐसे मनोवैज्ञानिक प्रयोग भी किए जाने चाहिए.
एक महत्वपूर्ण दृश्य है, जब डीन डा.अस्थाना सभागृह में छात्रों के समक्ष भाषण दे रहे थे तब एक छात्रा उनसे कहती है, 'अच्छा डाक्टर बनने के लिए मैं पेशेंट के दर्द को खुद महसूस करना चाहती हूँ, उसका दोस्त बन कर इलाज़ करना चाहती हूँ' तब डा.अस्थाना उसे जवाब देते हैं, 'मैं किसी पेशेंट को प्यार नहीं करता. इन हाथों से मैंने कई ऑपरेशन किए हैं, कभी मेरा हाथ नहीं कांपा लेकिन यदि मैं अपनी बेटी का ऑपरेशन करूंगा तो मेरे हाथ काँप जाएगे क्योंकि मैं अपनी बेटी से प्यार करता हूँ. अगले पांच सालों में तुम्हें यह सिखाया जाएगा कि मरीज एक शरीर है, और कुछ नहीं.' यह संवाद गहरे अर्थ लिए हुए है. वह अर्थ जो हर शिक्षा संस्थान में सिखाया जाता है, चिकित्सा का क्षेत्र हो या अन्य कोई क्षेत्र हो. मनुष्य को मनुष्य न समझ कर एक वस्तु समझना ही आज के युग की सच्चाई है, इस दुखद सत्य को इस फिल्म में अत्यंत गहराई से उजागर किया गया है.
मुन्ना भाई के रोल के लिए पहले शाहरुख़ खान का चयन किया गया था लेकिन उनकी कमर में दर्द होने के कारण यह संजय दत्त को मिल गया जो पहले कैंसर पेशेंट जहीर का छोटा सा रोल करने वाले थे. इस रोल ने संजय दत्त को अपनी अभिनय क्षमता को उजागर करने का अनोखा अवसर दिया. सड़कछाप टपोरी और मेडिकल कालेज के छात्र के रूप में उसने संवाद बोलने की बम्बइया शैली का खुलकर उपयोग किया है जो सुनने में अच्छी लगती है. मेडिकल कालेज के डीन डा.अस्थाना के रूप में अभिनेता बोमन ईरानी ने अत्यंत प्रभावशाली अभिनय किया है. 'जब गुस्सा आये तब जोर से हँसना चाहिए' सूत्रवाक्य का पालन करते हुए उन्होंने भावाभिव्यक्ति प्रदर्शित की है वह उन्हें बंगाल के समर्थ अभिनेता उत्पल दत्त के समकक्ष स्थापित कर देती है. संवाद बोलते समय उनकी आवाज़ का उतार-चढ़ाव, अभिनय करते समय उनके शरीर की भाषा, चेहरे की अभिव्यक्ति में परिवर्तन किसी भी अभिनेता के लिए खुली चुनौती हो सकती है. मुन्ना भाई के दोस्त सर्किट के रोल में अरशद वारसी ने कमाल का अभिनय किया. ग्रेसी सिंह, सुनील दत्त, रोहिणी, जिमी शेरगिल, कुरुस देबू, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, यतिन कार्येकर आदि अपने छोटे-छोटे रोल में अच्छे लगे.
फिल्म में संगीत अनु मालिक का है तथा गीत लिखे हैं राहत इन्दौरी और अब्बास टायरवाला ने. गीत-संगीत औसत दर्जे का है लेकिन फिल्म के सफल होने से वह भी हिट हो गया. इस फिल्म में कुल छः गीत थे जिनमें से चार राहत इंदौरी ने लिखे थे और दो अब्बास ने.
मुन्नाभाई एमबीबीएस ने दर्शकों का दिल जीत लिया और साथ में अनेक राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार भी. सन २००४ में 'बेस्ट पापुलर फिल्म' का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हासिल किया. उसी वर्ष के फिल्म फेयर अवार्ड्स और जी साइन अवार्ड्स के चार-चार क्षेत्रों में भी पुरस्कार झटके.
मुन्नाभाई एमबीबीएस हिंदी फिल्मों में 'कुछ हट कर' का प्रयोग करने वाली मजेदार फिल्म के रूप में उभरी. प्रस्तुत कहानी के विषय को एक गंभीर फिल्म का रूप दिया जा सकता था लेकिन निर्माता-निर्देशक ने इसे कामेडी का रूप देकर दर्शकों के लिए विशुद्ध मनोरंजन का उपहार दे दिया जो बेहद सफल सिद्ध हुआ.
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