अंग्रेज कवि तथा चित्रकार विलियम ब्लेक ने कहा था, 'दुश्मन को माफ़ करना आसान है लेकिन दोस्त को माफ़ करना आसान नहीं होता.'
यूँ तो किसी ने हमारे दिल को धोखा दिया हो या तन-मन को हानि पहुंचाई हो, उसे हम आजीवन माफ़ नहीं कर पाते लेकिन दोस्त की दगाबाजी भुलाए नहीं भूलती. अविभाजित भारत में पहले हिन्दू और मुसलमान मिलजुल कर रहते थे, उसके बाद विभाजन का दौर आया, दोनों एक-दूसरे के दुश्मन हो गए. अधिकतर मुसलमान पाकिस्तान चले गए, हिन्दू भारत आ गए लेकिन भारत में एक पेंच फंस गया, कुछ मुसलमान आपनी धरती छोड़कर पाकिस्तान जाने के लिए तैयार नहीं हुए, उन्होंने इसी देश को अपनी धरती माना और यहीं डटे रहे. उन्हें गांधी पर भरोसा था कि वे उन्हें 'अपने' देश में बने रहने देंगे, वैसा हुआ भी. घोर साम्प्रदायिक विद्वेष के बावजूद जो मुसलमान भारत में रहना चाहते थे, उन्हें रहने की सुविधा मिली और धीरे-धीरे साम्प्रदायिक सद्भाव कायम हो गया. पुराने ज़ख्मों को भुलाकर भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बन गया. ध्यान देने वाली बात यह है कि शरीर में जब खुजली होती है तो वह सहलाने से शांत होती है परन्तु खुजलाने से और बढ़ती है, शरीर में पसरने लगती है. आज़ादी के बाद के काल में यह खुजली बनी रही, जब सहलाई गयी तब शांत रही और जब-जब खुजलाई गयी तब बेचैनी बढ़ गयी. दोनों के बीच दंगे होते रहे, दोनों ने एक-दूसरे को मारा काटा और उनकी खुजली तत्क्षण शांत हो गयी लेकिन रोग कायम रहा. हिन्दू और मुसलमानों के बीच दिखावटी नजदीकी बनी रही लेकिन वे मन से एक कभी न हो सके. यह भारत का दुर्भाग्य है कि नजदीकी वास्तविक नजदीकी न बन सकी, दूरी कभी घटती रही, कभी बढ़ती रही. 'दोस्त दोस्त ना रहा, प्यार प्यार ना रहा...'.
काश्मीर हमारे देश के लिए गले की फांस की तरह है जिसका कोई उपाय किसी की समझ के बाहर है. विगत ७५ वर्षों में विभिन्न सरकारों ने अपने-अपने ढंग से विभिन्न प्रयोग कर लिए परन्तु कोई काम न आया. काश्मीर जस का तस है बल्कि और अधिक बर्बाद. फिल्म 'काश्मीर फाइल्स' में काश्मीर की आंतरिक स्थिति को बखूबी दर्शाया गया है कि 'उन्हें' चाहिए आज़ादी और भारत को बचाना है अपना काश्मीर. इसी विचार की परिणिति थी, काश्मीर से वहां के निवासी पंडितों का दुखद निष्कासन जो अत्यंत विषादपूर्ण परिस्थितियों में अपना घर-द्वार छोड़कर अपनी जान बचाने के लिए 'भारत' के विभिन्न हिस्सों में आकर बस गए. उनका अपना घर, अपना व्यापार, अपने खेत-खलिहान, अपनी यादें उसी प्रकार छूट गयी जिस प्रकार विभाजन के दौरान दोनों समुदायों ने अपनी-अपनी जायदादें खोयी थी. पंडितों के साथ की गयी वीभत्स यातनाओं के दृश्य और उन्हें काश्मीर छोड़कर 'बाहर' चले जाने का किस तरह दबाव बनाया गया, उसकी कहानी फिल्म में हृदयविदारक ढंग से बयान की गयी है. वे लोग जो कभी मित्र थे, किसी के शिष्य थे, वे ही जब दुश्मन बन गए तो मनुष्यता पर विश्वास उठ जाना स्वाभाविक है. फिल्म में उन दुखद स्थितियों को कथानक के रूप में भलीभांति पिरोया गया है, विभिन्न पात्रों के माध्यम से, उनके संवादों के माध्यम से और कथानक के माध्यम से.
फिल्म में कोई सिलसिलेवार कथानक नहीं है, घटनाएं बेतरतीब हैं लेकिन सच्ची सी लगती हैं. कथानक में बहुत से झोल हैं लेकिन फिल्म के कथानक पर फिल्म के निर्माता-निर्देशक का सम्पूर्ण अधिकार होता है, उनकी मर्ज़ी. जिस उद्देश्य को लेकर इस फिल्म को गढ़ा गया है, वह स्पष्ट है लेकिन एक बात ध्यान देनी चाहिए कि प्राप्त सफलता सारे दोषों को निगल जाती है. काश्मीर के मुद्दे पर इस दशक में चार-पांच फ़िल्में बनी हैं लेकिन किसी को इतनी सफलता नहीं मिली जितनी कि 'काश्मीर फाइल्स' को मिली. दर्शकों की भीड़ इस तथ्य को इंगित कर रही है कि वे फिल्म में प्रदर्शित भावना के समर्थन में हैं. दुल्हन वही जो पिया मन भाए.
अभिनय के मामले में सबसे अधिक प्रभावित किया पल्लवी जोशी ने प्रोफ़ेसर राधिका मेनन की भूमिका में. पल्लवी ने अपने पात्र को बखूबी निभाया है. उसकी भावाभिव्यक्ति और प्रभावी भाषण कला मुग्धकारी है. फिल्म में जब वे काश्मीर की आज़ादी के पक्ष में छात्रों के समक्ष अपने तर्क प्रस्तुत कर रही थी तब बगल में बैठी मेरी पत्नी माधुरी ने मुझसे पूछा, 'उनके पक्ष में इतना भाषण दे रही है तो साड़ी क्यों पहनी हुई है, अपने माथे में बिंदी क्यों लगाईं हुई है?'
मैंने कोई उत्तर नहीं दिया लेकिन मुझे मालूम था कि उसे किस वास्कीतविक पात्र की वेशभूषा की अनुकृति में उतारा गया है.
इसके बाद उल्लेखनीय है मिथुन चक्रवर्ती का ज़िक्र, उन्होंने काश्मीर में पदस्थ उच्चाधिकारी का पात्र सजीवता से निभाया है. चिन्मय मंडलेकर जिन्होंने फारूक अहमद डार उर्फ बिट्टा का अभिनय किया है, सच में खलनायक लगे. उनके चेहरे के क्रूर भाव दर्शनीय है. पंडित पुष्करनाथ के रूप में अनुपम खेर सामान्य लगे, हमने उन्हें कई पूर्ववर्ती फिल्मों में बेहतर अभिनय करते हुए देखा है. सबसे ज्यादा निराश हुआ दर्शन कुमार से कृष्णा के रोल में. उन्हें अभी अभिनय और संवाद अदायगी के क्षेत्र में बहुत कुछ सीखना शेष है. शेष कलाकार ठीक-ठाक हैं.
एक गीत है फिल्म में, 'हम देखेंगे...' इसका संगीत अच्छा तैयार किया गया है लेकिन फिल्म का पार्श्वसंगीत बहुत कमजोर है. फिल्म में इतने मर्मान्तक दृश्य हैं लेकिन रोहित शर्मा का पार्श्वसंगीत उन्हें उभार पाने में असमर्थ रह गया. याद कीजिए फिल्म 'शोले' का वह सीने को चीर देने वाला पार्श्वसंगीत जब गब्बर सिंह अपनी पिस्तौल की गोलियों से ठाकुर के परिवार को भून देता है. इस फिल्म में चौदह लोगों को भून देने के बावजूद पार्श्वसंगीत का वह प्रभाव उत्पन्न न हो सका. १७० मिनट की इस फिल्म की उत्तम फोटोग्राफी की है उदयसिंह मोहिते ने. निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने फिल्म को प्रभावी बनाने में अपने सामर्थ्य का भरपूर उपयोग किया है.
फिल्म 'काश्मीर फाइल्स' के निर्माण और उसकी सफलता ने देश में और भी कई फाइलों के खुलने और उन पर फिल्म बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है, उम्मीद है कि इससे भी बेहतर और 'मार्गदर्शक' फ़िल्में दर्शकों को देखने को मिलेंगी.
कुल मिलाकर फिल्म देखने योग्य है.
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