अंग्रेज कवि तथा चित्रकार विलियम ब्लेक ने कहा था, 'दुश्मन को माफ़ करना आसान है लेकिन दोस्त को माफ़ करना आसान नहीं होता.' यूँ तो किसी ने हमारे दिल को धोखा दिया हो या तन-मन को हानि पहुंचाई हो, उसे हम आजीवन माफ़ नहीं कर पाते लेकिन दोस्त की दगाबाजी भुलाए नहीं भूलती. अविभाजित भारत में पहले हिन्दू और मुसलमान मिलजुल कर रहते थे, उसके बाद विभाजन का दौर आया, दोनों एक-दूसरे के दुश्मन हो गए. अधिकतर मुसलमान पाकिस्तान चले गए, हिन्दू भारत आ गए लेकिन भारत में एक पेंच फंस गया, कुछ मुसलमान आपनी धरती छोड़कर पाकिस्तान जाने के लिए तैयार नहीं हुए, उन्होंने इसी देश को अपनी धरती माना और यहीं डटे रहे. उन्हें गांधी पर भरोसा था कि वे उन्हें 'अपने' देश में बने रहने देंगे, वैसा हुआ भी. घोर साम्प्रदायिक विद्वेष के बावजूद जो मुसलमान भारत में रहना चाहते थे, उन्हें रहने की सुविधा मिली और धीरे-धीरे साम्प्रदायिक सद्भाव कायम हो गया. पुराने ज़ख्मों को भुलाकर भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बन गया. ध्यान देने वाली बात यह है कि शरीर में जब खुजली होती है तो वह सहलाने से शांत होती है परन्तु खुजलाने से और बढ़ती है, शरीर मे...
सिनेमची : दिल की बात : =============== फिल्म देखना सरल है लेकिन उसे बनाना बेहद कठिन होता है. फिल्म बनाना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कुछ दिमाग लगते हैं, कुछ कार्यकुशल लगते हैं, कुछ श्रमिक लगते हैं लेकिन उसे देखने के लिए बहुत बड़ी संख्या में दर्शक लगते हैं. दरअसल फ़िल्म दर्शकों के देखने के लिए बनाई जाती है. जो फ़िल्में रिलीज हो जाती हैं, वे तो दर्शकों तक पहुँच जाती हैं लेकिन जो अधूरी रह गयी या जिन्हें वितरक नहीं मिले, वे फ़िल्में डिब्बों में बंद होकर आंसू बहाती रह जाती हैं. अनेक रिलीज फिल्मों को दर्शक नसीब नहीं होते, कुछ ही फ़िल्में हैं जो दर्शकों को पसंद आती हैं और वे ही चर्चित होती हैं. भारत में बनी हिंदी फिल्मों की यह स्थिति वर्षों से चली आ रही है और इसी तरह से चलती रहेगी. भारत में फिल्म का आगमन यहाँ प्रचलित नाटक, राम एवं कृष्णलीला का सफ़ेद परदे पर अवतरण जैसा था. पहले मूक और बाद में सवाक. पहले धार्मिक फ़िल्में बनी, उसके बाद स्टंट और फिर समाजिक सरोकार की बनने लगी. सिनेमा ने आम जनता पर जादू किया और अपने आगोश में ले लिया. सिनेमाघरों में भीड़ उमड़ने लगी और जन-जन में सिनेमा की चर्चा होने...